आवरण कथाः डर, थकान और अकेलापन
इंडिया टुडे में काम करने वाले कुछ योद्धा जिन्होंने कोविड को मात दी; संक्रमण होने और उससे लड़कर उबरने तथा उसके बाद के अपने अनुभवों को साझा करते हुए.

सुहानी सिंह, सीनियर एडिटर
कोविड पॉजिटिव: 22 मार्च
स्थिति: 7 अप्रैल को जांच में निगेटिव
जगह: मुंबई
करीब ग्यारह महीने तक मैंने खुद को कोविड-19 से बचाकर रखा था. फिर एक दिन यह एक धमाके की तरह आया. मैं हाइपरटेंशन की मरीज अपनी 64 वर्षीय कोविड-संक्रमित मां की देखभाल के लिए अपने माता-पिता के घर दो हफ्ते के लिए चली गई थी. मेरी मां आइसोलेशन में रहीं और ठीक हो गईं. मेरी तीन बार जांच हुई और तीनों बार मैं संक्रमणमुक्त पाई गई थी. पर एक हफ्ते बाद जांच में मैं संक्रमित पाई गई.
तो बीमारी की शुरुआत मां को यह आश्वस्त करने की जिम्मेदारी से हुई कि मेरे संक्रमित होने के लिए वे खुद को दोषी न मानें क्योंकि मैंने ऑफिस के बाहर निकलना शुरू कर दिया था. उसके बाद उन लोगों तक पहुंचने की चुनौती थी, जिन्हें मैंने अनजाने में वायरस पहुंचाया हो सकता है. मेरे संपर्क में आई एक महिला के 90 वर्षीय पिता थे; एक की मधुमेह पीड़ित मां. हालांकि बुखार और शरीर में दर्द से मुझे ज्यादा दिक्कत नहीं हो रही थी, लेकिन उस अपराध बोध ने मेरी तकलीफ बढ़ा दी.
एक साल से अधिक समय तक कोविड से जुड़े लेखों की एक अच्छी खुराक मुझे मिली थी और डर झलक रहा था, खासकर शुरुआती दिनों में. मैं अपने एक बेडरूम वाले अपार्टमेंट में अकेली क्वारंटीन में थी और इस बात ने घबराहट और बढ़ाई थी. लोग दरवाजे के बाहर खाना रखकर चले जाते थे. 18 दिनों तक मैंने जिस एकमात्र इंसान को देखा वह लेबोरेट्री वाला लड़का साईंनाथ था जो आरटी-पीसीआर और खून की जांच के नमूने लेने के लिए आया था.
मुझे पता है कि इस भीड़भाड़ वाले शहर में एक एकांत जगह उपलब्ध होना भी एक लग्जरी है, लेकिन अकेलेपन ने बीमारी से लड़ने की प्रक्रिया को थकाऊ बना दिया. मेरे अंदर किताबों या नेटफिलिक्स में सुकून ढूंढऩे की ऊर्जा नहीं है. इसके बजाय, अनुलोम विलोम और सांस के दूसरे व्यायामों में मुझे सुकून मिला. जब दवाओं की खुराक कम हो गई, मैंने कोरियाई क्राइम ड्रामे (50 ऑवर्स ऑफ स्ट्रेंजर और सिग्नल) देखना शुरू किया.
लेकिन जैसे-जैसे मेरी थकान कम होती गई, मेरी व्यग्रता बढ़ती जा रही थी. इसकी एक वजह वह जागरूकता थी कि वायरस म्यूटेट कर रहा है. मैं डर गई कि इस सूक्ष्म घुसपैठिए ने मेरे शरीर में क्या कर दिया है जो अभी भी अपने कोविड पूर्व स्थिति में लौटने की कोशिश कर रहा है. मैं बिना थकान महसूस किए अपने पालतू कुत्ते आइशा के साथ टहलने में सक्षम होना चाहती हूं.
मैं आवारा कुत्तों को फिर से खिलाना और अपनी कथक क्लास में फिर से जाना शुरू करना चाहती हूं. मैं फिर से संक्रमित होने के बारे में चिंता किए बिना बाहर निकलना चाहती हूं, जो कि मेरे पड़ोस की लगभग हर इमारत के बाहर लटकती बीएमसी की नोटिस की तादाद को देखते हुए कठिन लगता है. मैं अपने मस्तिष्क को उतना रचनात्मक रखना चाहती हूं जिसे ऐसे पासवर्ड न सूझें जो महामारी से संबंधित हों.
एक वैश्विक आंकड़े का हिस्सा होना, एक ‘सर्वाइवर’ कहा जाना कुछ अजीब-सा लगता है. एक दशक से कुछ पहले पीलिया से जूझने का मेरा अनुभव बहुत खराब रहा था, लेकिन कोविड के साथ मेरा यह संघर्ष शारीरिक से अधिक भावनात्मक रहा है.
एक दोस्त ने बताया कि उसकी मां वेंटिलेटर पर हैं; एक अन्य दोस्त जिसकी मां कैंसर से उबर कर आई हैं, को अपनी मां की जिंदगी की चिंता सता रही है; एक और सहेली जो अपने बीमार पति की तीमारदारी कर रही है, उसमें भी लक्षण दिखने शुरू हो गए हैं. कोरोना वायरस ने भले ही मेरा शरीर छोड़ दिया हो, लेकिन असल में मेरे दिमाग पर अब भी उसका कब्जा है.