अब हमारे पेशे की ज्यादा इज्जत होती है
बेहतरी की खातिर अपना फर्ज निभाने के पक्के इरादे से हीबा हसन स्टाफ हॉस्टल में ही बनी रहीं और दो महीने तक परिवार से दूर रहीं. आज हीबा गर्व से कहती हैं कि महामारी में उन्होंने सेवा की

केस स्टडी
हीबा हसन, 25 वर्ष
स्टाफ नर्स,
अपोलो अस्पताल, दिल्ली
दिल्ली में अक्तूबर के महीने में जब कोविड की दूसरी लहर शुरू हुई, तो हिबा हसन के परिजनों ने उनकी हिफाजत को लेकर अपनी चिंताओं पर एक बार फिर जोर दिया. उन्होंने कहा कि कोविड के मरीजों की स्वास्थ्य देखभाल करते हुए खुद अपनी जिंदगी जोखिम में डालने के बजाए उनका नौकरी छोड़ देना उन्हें मंजूर था. मगर हीबा ने तो ठान लिया था. वे कहती हैं, ''मैं दो महीने स्टाफ होस्टल में रही और मरीजों की देखभाल करने के लिए पालियों में काम किया. मैं अपने परिवार से नहीं मिली ताकि वे महफूज रहें. मगर मेरे इरादा साफ था कि मैं अपना काम जारी रखूंगी क्योंकि नर्सिंग ही मेरा पेशा है.’’
हीबा कम उम्र से ही चिकित्सा के क्षेत्र में जाना चाहती थीं. आखिरकार जब उन्होंने नर्सिंग में जाने का फैसला लिया, तब उनका परिवार और दोस्त ज्यादा उत्साहित नहीं थे. वे कहती हैं, ''ज्यादातर लोग पूछते थे कि ‘तुम केवल मरीजों का टेंप्रेचर लेना और उन्हें पट्टियां बांधना ही क्यों चाहती हो?’ वे यह नहीं समझते थे कि नर्स से वार्ड की अहमियत कितनी बढ़ जाती है. अलबत्ता कोविड ने सब कुछ बदल दिया. न सिर्फ यह कि महामारी के दौरान सेवा करके वे भीतर ही भीतर गर्व महसूस करती हैं, बल्कि नर्सों के बारे में लोगों की धारणा में उन्होंने बदलाव भी देखा.
वे कहती हैं, ‘‘मैं महसूस करती हूं कि लोग अब ज्यादा इज्जत से पेश आते हैं और वे हमारी अहमियत स्वीकार करते हैं. नर्सें सारा वक्त मरीज के साथ होती हैं और अक्सर डॉक्टर और मरीज के बीच कड़ी का काम करती हैं. लेकिन हमें हमेशा श्रेय नहीं दिया जाता.’’ कोविड वार्ड में डर, बेचैनी और अवसाद की भावनाएं छाई रहती थीं और इस सबके बीच हीबा अपने मरीजों के साथ डटी रहीं. वे यह भी कहती हैं, ‘‘मैं दिन के छह घंटे अपने मरीजों के साथ होती थी और मैंने अलगाव से बुरी तरह परेशान कई लोगों को आराम भी दिया.’’
खुद हीबा ने भी अलगाव का दंश झेला. कई दिनों तक उन्होंने अपने होस्टल रूम और अस्पताल के वार्ड के अलावा कुछ नहीं देखा. इस युवा लड़की के लिए यह अनिश्चितता और अकेलापन का दौर था. अपने काम और मरीजों की जरूरतों पर ध्यान देकर उन्हें अपनी भावनाओं पर काबू पाने में मदद मिली. उन्हें उन बहुत-सी नर्सों से भी प्रेरणा मिली जो घर पर अपने छोटे-छोटे बच्चों को छोड़कर काम पर आती थीं. वे कहती हैं, ''हमें अपने मैनेजमेंट का भी बहुत सपोर्ट मिला.
उन्होंने हमारी पूरी बात सुनी और हमें प्रोत्साहन भी देते रहे.’’ आज उनका परिवार और दोस्त कोविड की ताजातरीन जानकारी के लिए उन्हें फोन करते हैं और महफूज रहने की सलाह देते हैं. हसन कहती हैं, ''वे जब मुझ तक पहुंचते हैं तो मुझे गर्व महसूस होता है. कोविड ने मुझे संक्रामक रोग वार्ड में काम करने के बारे में बहुत कुछ सिखाया है. मैं कई लक्षणों को पहचान सकती हूं. निजी तौर पर इसने मुझे समझाया कि मुश्किल वक्त के दौरान की गई कड़ी मेहनत आखिर में हमेशा काम आती है.’’
—सोनाली आचार्जी
भविष्य के लिए सबक
● स्वास्थ्य सेवाओं के बुनियादी ढांचे में निवेश करें, खासकर प्राथमिक और द्वितीयक स्तर पर
● देश भर में डॉक्टर-मरीज अनुपात और मरीज-बिस्तर अनुपात बढ़ाएं
●भविष्य में महामारियों की रोकथाम के लिए ज्यादा अनुसंधान करने की जरूरत है. वायरस वैज्ञानिकों और महामारी वैज्ञानिकों के लिए फंडिंग और रिसर्च इन्फ्रास्ट्रक्चर में सुधार लाएं जिससे आरंभिक चेतावनी और प्रतिक्रिया प्रणाली स्थापित की जा सके
●स्वास्थ्य जानकारियों के प्रचार-प्रसार के लिए विशेष सार्वजनिक व्यवस्था बनाएं ताकि फर्जी सूचनाएं रोकी जा सकें
●रोग प्रतिरोधक क्षमता के निर्माण और लंबे वक्त की स्वास्थ्य की जरूरतों को सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यक्रमों का हिस्सा बनाएं
● भविष्य के लिए सीमा नियंत्रण तंत्रों में सुधार लाने और महामारियों के लिए प्रोटोकॉल कायम करने की जरूरत है
●भविष्य में जोखिम वाले वर्गों—बुजुर्ग, सहरुग्णता और अगली कतार के कर्मियों—के लिए दिशानिर्देश बनाएं
● स्वदेशी चिकित्सा उपकरणों, दवाइयों और टीकों की मैन्युफैक्चरिंग में मजबूती लाएं
● भावी लॉकडाउन की स्थिति में गरीबी की रेखा के नीचे रहने वाले समूहों के लिए यातायात और राशन के पर्याप्त इतंजाम करें