अशोक गहलोतः मुश्किलों में मजबूत
भाजपा की उन्हें गद्दी से हटाने की चाल को उन्होंने एक अंदरूनी सूत्र का इस्तेमाल करके ठोस प्रयासों के जरिए नाकाम किया

मार्च, 2020 में 25 विधायकों के कांग्रेस से इस्तीफा देकर भाजपा खेमे में चले जाने के बाद मध्य प्रदेश में कांग्रेस सरकार गिर गई थी. मात्र आठ महीने पहले 'ऑपरेशन लोटस' ने कर्नाटक को कांग्रेस के हाथों से खिसकते हुए देखा था. अगली बारी राजस्थान की थी, पर मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने भाजपा के बाजीगरों को अपने दांव से चित कर दिया.
गहलोत को जुलाई में अपने उप-मुख्यमंत्री सचिन पायलट की खुली बगावत का सामना करना पड़ा, जिन्होंने 18 कांग्रेस के और तीन निर्दलीय विधायकों के साथ भाजपा शासित हरियाणा के गुरुग्राम में डेरा डाला और मुख्यमंत्री पद की मांग की. गहलोत ने उनकी नब्ज पकड़ ली और असंतुष्टों को थका डाला. गहलोत के समर्थन में 102 विधायक थे और किसी नुकसान से बचने के लिए उन्होंने उन विधायकों को एक महीने तक जयपुर और जैसलमेर के होटलों में रखा.
राज्य की तीन राज्यसभा सीटों में से दो पर कांग्रेस की जीत ने साबित कर दिया कि पार्टी के भीतर और बाहर विधायकों पर उनकी पकड़ मजबूत है. गहलोत ने न केवल सरकार बचाई, बल्कि पायलट को उप-मुख्यमंत्री और प्रदेश कांग्रेस प्रमुख पद से भी हटा दिया. गहलोत ने भाजपा पर निशाना साधते हुए केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत और कांग्रेस के कुछ बागियों के खिलाफ अपनी सरकार गिराने की साजिश के आरोप में पुलिस में मामला भी दर्ज करा दिया.
प्रशासन पर मजबूत नियंत्रण के लिए गहलोत ने नौकरशाही में बड़ा फेरबदल किया और निरंजन आर्य को प्रमुख सचिव बनाया. उनके नेतृत्व में कांग्रेस को 50 स्थानीय निकाय चुनावों में 2018 के विधानसभा चुनाव में उन वार्डों में मिले वोट के मुकाबले 2.5 फीसद ज्यादा वोट मिले. राष्ट्रीय स्तर पर भले कांग्रेस की नैया डगमगा रही हो, गहलोत के नेतृत्व में राजस्थान उसका गढ़ बना हुआ है.