आलेखः विराट विध्वंसक

भारतीय अर्थव्यवस्था को जबरदस्त धक्का लगा. पहली तिमाही में जीडीपी ग्रोथ शून्य से 23 फीसद नीचे के अभूतपूर्व रसातल में जा धंसी.

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2020 सुर्खियों का सरताज: कोविड-19 आलेख

एक अदना-से वायरस ने दुनिया को एकाएक पूरी तरह से पंगु बनाकर रख दिया, जिंदगी उलट-पुलट कर डाली. कोविड-19 ने अकेले अपने दम पर 2020 को एक ऐसे साल में तब्दील कर दिया, जिसके बारे में कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था


मारे ऊपर कहर बनकर टूटने से पहले 2020 एक गुनगुनाती-सी अनुगूंज के साथ शुरू हुआ था. इस सदी के दूसरे दशक का यह आखिरी साल भविष्य की दूरदृष्टि का, परवान चढ़ती अभिलाषाओं का प्रतीक था. अब हम इसे न केवल डर के साल के रूप में बल्कि भारी उथल-पुथल मचाने वाले साल के तौर पर भी याद रखेंगे. इसने जिस तरह की उथल-पुथल मचाई है, उस लिहाज से कोविड-19 दूसरे विश्व युद्ध और ताजा संदर्भ में कहें तो 9/11 सरीखा आमूलचूल बदलाव ला देने वाली महाविपत्तियों के समकक्ष है.

इसे निर्णायक मोड़ कहना उस सबको बहुत कम करके आंकना होगा जो इस महामारी ने हम पर बरपाया है. क्योंकि हमारे पीछे वह अतीत है जहां हम अब कभी नहीं लौट सकते. इसमें कोई शक नहीं कि इस वायरस ने हमारी जानी-पहचानी दुनिया को हमेशा के लिए इस कदर बदल दिया है कि यह अब वही नहीं रही. हम सब मुंह बांधे दस्युओं की तरह घूमते हैं और अब इसके बारे में हमने सोचना भी बंद कर दिया है. 2020 दरअसल कोविड-19 युग की पौ फटने का साल है.

नहीं रही. हम सब मुंह बांधे दस्युओं की तरह घूमते हैं और अब इसके बारे में हमने सोचना भी बंद कर दिया है. 2020 दरअसल कोविड-19 युग की पौ फटने का साल है.

कई लोग कहेंगे कि वैक्सीन आ ही रही है, ऐसे में इस वायरस के खतरे का घटते जाना तय है; कि कोविड कोई युग नहीं, छोटा पर भद्दा-सा अंतराल भर है और इसके बाद व्यवस्था और विवेक फिर बहाल हो जाएंगे. लेकिन आप जरा विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) में मुख्य वैज्ञानिक डॉ. सौम्या स्वामीनाथन से पूछिए, हैं तो वे आपको दोटूक बताएंगी, ''2021 में यह कहीं दूर नहीं जा रहा. हमें यह तक पता नहीं कि हम इस वायरस को अंतत: जड़ से मिटा सकते भी हैं या नहीं.’’

इतना ही नहीं, वे मानती हैं कि मानवजाति पर  कोविड-19 सरीखी एक और महामारी का हमला ‘‘बिल्कुल असल संभावना है’’. चूंकि कोविड-19 का संक्रमण पशुजन्य (जानवर से इन्सान को लगने वाला) है, इसलिए उनके सरीखे कई वैज्ञानिक मानते हैं कि हाल के दशकों में मानवजाति ने प्रकृति का जो बेलगाम दोहन किया है, उसने हमारी जिंदगियों में कहर बरपाने के लिए ऐसे कई और खतरनाक वायरसों के लिए दरवाजे खोल दिए हो सकते हैं.

इन पुरजोर बातों का प्रतिवाद करने वालों को बस उस अपूर्व तबाही पर नजर डालनी चाहिए जो कोविड-19 ने बरपाई है. इस अदना-से वायरस ने दुनिया की एकमात्र महाशक्ति को महीनों के भीतर घुटनों पर ला दिया और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दुबारा चुनकर आने की कोशिश को जबरदस्त धक्का पहुंचाया. अमेरिका में 2 करोड़ के करीब मामले हैं और 3,64,000 मौतें हो चुकी हैं, जो अब तक किसी भी दूसरे देश से ज्यादा हैं. भारत 1.02 करोड़ मामलों के साथ दूसरे और मौतों (1,49,000) के मामले में (अमेरिका और ब्राजील के बाद) तीसरे नंबर पर है.

दुनिया भर में महामारी ने 8.1 करोड़ लोगों को संक्रमित किया और 18 लाख की जानें ले लीं. आप तर्क कर सकते हैं कि 1918 का स्पैनिश फ्लू कहीं ज्यादा मारक था, जिसने दुनिया की एक-तिहाई आबादी को संक्रमित किया और 5 करोड़ लोगों को मार डाला था. मगर फिर 100 बरस से ज्यादा उम्र के इने-गिने लोगों को छोड़ दें तो हममें से किसी ने उस किस्म की उथल-पुथल अनुभव नहीं की थी जो कोविड-19 ने हमारी जिंदगियों में बरपा की है.

भारत में तो बेशक किसी ने भी नहीं. न उन चार युद्धों में जो देश ने लड़े, न आपातकाल के दौरान, न 1984 के दंगों और न ही बाबरी मस्जिद ढहा दिए जाने के बाद फूटी चौतरफा हिंसा के वक्त देश ने कभी जिंदगी को इस तरह अचानक और एकदम ठहरते नहीं देखा. 1947 के बंटवारे के बाद से तो नहीं ही. सेंटर फॉर मॉनीटिरंग इंडियन इकॉनोमी के आंकड़ों के मुताबिक, लॉकडाउन में 12.2 करोड़ से ज्यादा लोग अपनी नौकरियां गंवा बैठे.

यही उन भीतर तक विचलित कर देने वाले दृश्यों की वजह थी जिनमें अपनी जड़ों से उखड़े प्रवासी मजदूर सैकड़ों किलोमीटर पैदल चलकर अपने घरों की तरफ लौटते दिखाई दिए. केवल अप्रैल और मई में तकरीबन 1 करोड़ लोग रास्ते में किसी राहत की उम्मीद के बगैर विभिन्न राज्यों के लिए निकल पड़े थे. उन महीनों में अमीर और गरीब के बीच की खाई और चौड़ी हो गई. भारतीय अर्थव्यवस्था को जबरदस्त धक्का लगा. पहली तिमाही में जीडीपी ग्रोथ शून्य से 23 फीसद नीचे के अभूतपूर्व रसातल में जा धंसी. हालांकि उसके बाद हालात में कुछ सुधार आया है, हाल के इतिहास में भारत पहली बार नकारात्मक वृद्धि दर्ज करेगा.

कोविड-19 ने इस बात का भी भांडा फोड़ दिया कि इस पैमाने पर आने वाली आपातस्थिति के आगे हमारा स्वास्थ्य का बुनियादी ढांचा किस कदर नाकाफी है. मसलन, जब वायरस ने धावा बोला, हमारे यहां टेस्ट करने वाली केवल एक मान्यता प्राप्त प्रयोगशाला थी. गंभीर रूप से संक्रमित लोगों के लिए आइसीयू के अलावा पर्सनल प्रोटेक्शन इक्विपमेंट (पीपीई) की भीषण कमी थी. यही उन प्रमुखों कारणों में से एक था, जिसने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को 24 मार्च को जहान (आजीविका) के बजाय जान (जिंदगी) चुनने और जबरदस्त लॉकडाउन का फरमान देने को प्रेरित किया.

उसके बाद सैकड़ों हजारों परिवारों ने अपना एक प्रियजन खो दिया है और यही कोई 4 करोड़ परिवारों का एक सदस्य इस बीमारी से संक्रमित हुआ है. इस वायरस के साथ जुड़े लांछन और डर की वजह से कइयों ने मानवीय व्यवहार से भी समझौता करते हुए संक्रमितों का बहिष्कार किया और उन्हें तकलीफदेह और खौफनाक अलगाव में रहने को मजबूर कर दिया. हाल के समय में किसी महामारी ने ऐसी मायूसी और बेकसी नहीं बरपाई. आजादी के फौरन बाद पोलियो महामारी का प्रकोप हुआ था मगर इसने वैसी कोई उथल-पुथल और दहशत नहीं मचाई जैसी कोविड-19 ने मचाई है.

बहरहाल, कोरोना महामारी अगर हमारे भीतर का बदतर सामने लाई, तो इसके कई अच्छे नतीजे भी हुए. देखिए पीपीई और टेस्टिंग किट बनाने में भारत ने कैसी शानदार कामयाबी हासिल की है. जो देश इन्हें दूसरी जगहों से आयात करने को हाथ-पैर मारता था, वहीं अब हम न सिर्फ आत्मनिर्भर बन गए बल्कि इनका निर्यात करने लगे हैं. टेक्नोलॉजी नास्तिकों से हम आस्तिक बन गए और डिजिटल संचार सुविधाओं का इस्तेमाल करते हुए वर्क फ्रॉम होम को उत्साह से गले लगाया.

ई-कॉमर्स कंपनियां फलीं-फूलीं और डिजिटल भुगतान अपूर्व स्तरों पर पहुंच गया. यह कुछ ऐसा है जो नोटबंदी का प्रयोग भी हासिल नहीं कर पाया था. जब हम अपने-अपने घरों में आइसोलेशन में रह रहे दफ्तर के साथियों और परिवार के सदस्यों के साथ संवाद के बिल्कुल नए-नए तरीके खोज रहे थे, जूम हमारी शब्दावली का हिस्सा बन गया. शिक्षा में पढ़ाई-लिखाई ऑनलाइन होने लगी. वायरस ने हमारी जिंदगी के ढुलमुलपन और बेसहारापन को भी उघाड़कर रख दिया, परिवारों को एक दूसरे के साथ पहले के मुकाबले और ज्यादा घनिष्ठता से बांध दिया.

(जहां तक मेरी बात है, मैंने परिवार के साथ इतने लंच और डिनर किए जितने अपनी कामकाजी जिंदगी में पहले कभी नहीं किए थे.) दुखद खबरें थीं, खाने-पीने या किताबों की पसंदीदा दुकानों के बंद होने की. मगर अपना कामकाज जारी रखने के लिए बिल्कुल नए-नए तरीके खोजने वाली कंपनियों की दिलखुश मिसालें भी थी. लचीलापन अव्वल गुण बन गया.

शुरुआत में जहां हर देश अपने में बंद था, मगर जल्द ही दुनिया को महामारी से लडऩे में सहयोग और साथ मिलकर काम करने की अहमियत का एहसास हुआ. मुट्ठी भर वैक्सीन लेकर आने के लिए राष्ट्र अपने बेहतरीन दिमाग और टेक्नोलॉजी एक साथ लाए. जिसे विकसित करने में आम तौर पर सालों लगते हैं, उसे छह महीने से कुछ ज्यादा वक्त में हासिल कर लिया गया. डब्ल्यूएचओ सरीखे कई संगठनों के तालमेल की कोशिशों के साथ वैक्सीन के परीक्षणों के लिए साझा नियम-कायदे तय किए गए और नतीजे आपस में बांटे गए ताकि मंजूरी की प्रक्रिया तेजी से पूरा की जा सके.

नतीजा यह है कि 2020 को हमारे अलविदा कहने से पहले ही अमेरिका सहित कई देशों ने टीके लगाने का बड़ा अभियान छेड़ दिया है. भारत के लिए उत्साह बढ़ाने वाली बात यह है कि कम से कम इस बार वह न केवल टीकों का आपूर्तिकर्ता है बल्कि उन्हें देश में ही विकसित करने वाला बड़ा खिलाड़ी भी है.

कोविड-19 की वजह से अंतरराष्ट्रीय संबंध भी नाटकीय बदलावों से गुजरे. एक के बाद एक लॉकडाउन के दौरान जब वैश्विक आपूर्ति शृंखलाएं गड़बड़ा गईं, आत्मनिर्भरता लोकप्रिय शब्द बन गया. भारत में प्रधानमंत्री मोदी ने आत्मनिर्भर भारत अभियान छेड़ दिया और तमाम प्रमुख क्षेत्रों में बड़े सुधारों का सूत्रपात किया. वैश्वीकरण को उलटने की प्रक्रिया ने और ज्यादा तेज रफ्तार पकड़ ली क्योंकि महामारी से ट्रंप के खराब ढंग से निबटने की कीमत अमेरिका को अपनी सर्वोपरिता से चुकानी पड़ी.

विरोधाभासी बात यह है कि अपने वुहान प्रांत में तेजी से फैली महामारी के ब्योरे देरी होने से पहले उजागर न करने के कारण दुनिया भर के गुस्से का सामना करने के बावजूद चीन महामारी से ज्यादा ताकतवर होकर उभरा मालूम देता है—और ज्यादा आक्रामक, जैसा कि भारत ने सीधे-सीधे अनुभव किया है. अमेरिका के निर्वाचित राष्ट्रपति जो बाइडन चीन का मुकाबला करने के लिए पहले ही ''समानधर्मा राष्ट्रों का गठबंधन’’ बनाने की बात कर रहे हैं. कोविड-19 के प्रभाव तले एक नई बेधड़क विश्व व्यवस्था उभरती मालूम देती है.

ऐसा नहीं है कि जब वायरस उत्पात मचा रहा था, तब भारत में जिंदगी मानो बिल्कुल ठहर गई हो. सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) विपक्ष-मुक्त भारत की अपनी महत्वाकांक्षा की राह पर बेखौफ चलती रही. यहां तक कि उसने बाज दफे अनैतिक तौर-तरीकों का सहारा लेने से भी गुरेज नहीं किया. उसने मध्य प्रदेश में दलबदल करवाकर कमल नाथ की अगुआई वाली कांग्रेस सरकार को गिराने में सफलता पाई. मगर राजस्थान में चालाक अशोक गहलोत को गद्दी से उतारने में नाकाम रही. पार्टी ने दिल्ली फतह करने के लिए कोई कौर-कसर नहीं छोड़ी, लेकिन अरविंद केजरीवाल ज्यादा माहिर साबित हुए और जीत का सेहरा बांधकर उभरे.

यह सब उन सबसे भयंकर दंगों की पूर्वपीठिका था जो राष्ट्रीय राजधानी ने नागरिकता (संशोधन) कानून के खिलाफ लंबे चले धरनों—और जघन्य तथा सांप्रदायिक बना दिए गए चुनावी मुकाबले—के बाद झेले. बिहार में नीतीश कुमार को कमल का ताज पहनना पड़ा क्योंकि उनके गठबंधन के भागीदार ने उनकी पार्टी से ज्यादा सीटें जीतीं और राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन को लालू के बेटे तेजस्वी यादव से महज नाक बराबर आगे रखने में मदद की; तेजस्वी ने आश्चर्यजनक ढंग से अच्छी टक्कर दी. इस बीच चीन ने लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा पर अपनी बेलगाम आक्रामकता से भारत को हैरत में डाल दिया.

इसका नतीजा सरहद पर 45 साल में पहली बार अच्छी-खासी मौतों में सामने आया. बॉलीवुड ने असल जिंदगी में तमाशा देखा जब उभरते सितारे सुशांत सिंह राजपूत रहस्यमयी परिस्थितियों में मरे पाए गए. और भारत का दूसरा धर्म समझे जाने वाले क्रिकेट ने भगवान और दूसरी कठिनाइयों को धता बताते हुए सालाना प्रीमियर लीग टूर्नामेंट का सफलतापूर्वक आयोजन किया. अलबत्ता सुई की नोक से भी हजार गुना छोटा वायरस ही था जो सबसे बड़ा उथल-पुथलकारी साबित हुआ. यही वजह है कि इंडिया टुडे के संपादकों ने कोविड-19 को अपना 2020 का सुर्खियों का सरताज बनाने का फैसला किया है.

भारत इस बार न केवल टीकों का सप्लायर बल्कि देश के भीतर उन्हें विकसित करने वाला अग्रणी खिलाड़ी भी है

इतिहास का एक निर्णायक मोड़ होने से कहीं ज्यादा कोविड-19 आमूलचूल बदलाव लाने वाली दूसरे विश्व युद्ध सरीखी महाविपत्तियों के समकक्ष एक युग है.

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