विस्थापित और व्यथित

लॉकडाउन की सबसे करारी चोट देश के 20 करोड़ प्रवासी श्रमिकों पर पड़ी, उनका रोजगार छिन गया और ज्यादातर को पैदल ही सैकड़ों मील लंबा सफर तय करके घर लौटने पर मजबूर होना पड़ा

घर वापसी मई 2020 के लॉकडाउन के दौरान दिल्ली में उत्तर प्रदेश जा रहे ट्रक में चढऩे को आतुर प्रवासी कामगारों की भीड़
घर वापसी मई 2020 के लॉकडाउन के दौरान दिल्ली में उत्तर प्रदेश जा रहे ट्रक में चढऩे को आतुर प्रवासी कामगारों की भीड़

बिहार में मधेपुरा जिले के 38 वर्षीय मुन्ना फिर से बेंगलूरू के लिए निकल पड़े हैं, जहां वे कोविड के लॉकडाउन में घर लौटने से पहले कारपेंटर के तौर पर काम किया करते थे. पटना के दानापुर में 37 वर्षीय निराला कुमार अपनी पत्नी और तीन बच्चों के साथ गुजरात के जामनगर में वापस आ गए हैं, इस उम्मीद में कि लॉकडाउन से पहले उन्हें ब्रास की एक भट्ठी में सहायक के तौर पर जो पैसा मिला करता था, उतना इस बार भी मिल जाएगा. ये लोग उन 20 करोड़ प्रवासी श्रमिकों में से हैं जिन्होंने लॉकडाउन के कारण अपनी आजीविका गवां दी थी. महामारी के कारण अब भी देश की अर्थव्यवस्था जब लडख़ड़ा रही है तो मुन्ना और निराला कुमार जैसे असंख्य श्रमिक उन महानगरों और शहरों में काम पाने की आस लगाए हुए हैं, जहां लॉकडाउन से पहले वे काम छोड़कर घर भाग आए थे या फिर अपने घर पर रहकर ही रोजगार पाने की जद्दोजहद में लगे हैं.

दरअसल, प्रवास देश की गहरी समस्या है और इसकी मुख्य वजह नौकरी या रोजगार है. प्रवासी श्रमिकों के बारे में जानकारी रखने वालों का अनुमान है कि देश में एक से दूसरे राज्य जाने वाले प्रवासी श्रमिकों की संख्या 2020 में करीब 60 करोड़ थी. उनमें से करीब 20 करोड़ श्रमिक ऐसे हैं जो अपने जिलों के भीतर और अपने राज्यों के भीतर काम करते हैं और 14 करोड़ श्रमिक ऐसे हैं जो अपने राज्यों से बाहर जाकर काम करते हैं. उन्हें सबसे ज्यादा कठिनाई का सामना करने वाला माना जाता है. अपने मूल स्थानों पर भरोसेमंद रोजगार या आमदनी का जरिया पाने के लिए संघर्ष करने वाले इन लोगों के पास शहरों की तरफ दोबारा जाने के सिवाय कोई चारा नहीं है, जहां वे नए सिरे से जिंदगी की शुरुआत कर सकें. लॉकडाउन के दौरान देश के विभिन्न हिस्सों में कई जमीनी अध्ययन के बाद पाया गया कि शहरों में बड़ी संख्या में प्रवासी मजदूरों को न ही उनका वेतन मिला और न ही सरकारी योजनाओं के तहत मुफ्त भोजन और राशन मिला. इसके बावजूद वे शहरों की तरफ लौटने को मजबूर हैं. 

प्रवासियों को क्या चाहिए

दर-बदर हो जाने से प्रवासी मजदूरों को सबसे ज्यादा मुश्किलें झेलनी पड़ीं. तिरुवनंतपुरम में सेंटर फॉर डेवलपमेंट स्टडीज में माइग्रेशन एनालिस्ट प्रोफेसर एस. इरुदया राजन कहते हैं, ''सरकार की ओर से घोषित अनेक कार्यक्रमों में से कोई भी इन श्रमिकों की स्थिति बेहतर बनाने में कारगर नहीं हुआ है. प्रवासी मजदूरों के पास खपत के लिए पैसों का अभाव है.'' वे कहते हैं, ''लॉकडाउन के दौरान रोजगार जाने से उन्हें जो नुक्सान हुआ, उसका मुआवजा तक नहीं दिया गया. वे जो काम करते हैं, उसकी वजह से वे शहरी अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं और वे जो पैसा कमाते हैं, वह ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ बनाता है. इस तरह वे शहरी और ग्रामीण इलाकों के बीच पुल का काम करते हैं.''

प्रोफेसर राजन कहते हैं, सरकार ने अगर हर प्रवासी मजदूर को 25,000 रु. का मुआवजा दिया होता तो उनके नुक्सान की भरपाई हो गई होती और मुमकिन है कि इन पैसों से वे अपना ही कोई काम शुरू करके आत्मनिर्भर हो जाते. उनका मानना है कि सरकार ने यह मौका गंवा दिया. प्रोफेसर राजन कहते हैं, ''इस तरह की कोई रकम स्थानीय अर्थव्यवस्था खड़ी करने में मददगार साबित हो सकती थी क्योंकि इससे बड़ी आबादी की क्रयशक्ति बढ़ जाती. इस रकम को पाने के लिए प्रवासी मजदूरों का जब पंजीकरण किया जाता तो सरकार की एजेंसियों को इनकी सही संख्या का डेटा भी मिल जाता—वह महत्वपूर्ण डेटा सरकार के पास नहीं है.'' 

प्रवासियों को क्या चाहिए

घर लौटने वाले प्रवासी मजदूरों को मनरेगा से बहुत मदद मिली जिसके कारण बहुतों को तुरंत राहत मिल सकी. लेकिन घर लौटने वाले कुशल और अर्धकुशल मजदूरों के लिए यह पर्याप्त नहीं था.

केंद्र सरकार के कुछ कार्यक्रमों जैसे केंद्रीकृत राशन कार्ड और सस्ते आवास के लाभ के बारे में आने वाले कुछ महीनों में ही पता चल पाएगा. दिहाड़ी मजदूरी पर निर्भर रहने वाले प्रवासी मजदूरों के लिए ऐसे कार्यक्रमों की जरूरत थी जिसका फायदा उन्हें तत्काल मिल पाता. अगर ऐसा नहीं होता है तो विशेषज्ञों की राय में ग्रामीण भारत में भारी मुसीबत आ सकती है और गरीब लोग कर्जों के जाल में फंस सकते हैं, परिवार के लोग कुपोषण का शिकार हो सकते हैं, समाज में असंतोष पैदा हो सकता है और लोग खुदकशी करने पर विवश हो सकते हैं. मुंबई स्थित माइग्रेशन रिसर्च और एडवोकेसी ग्रुप इंडिया माइग्रेशन नाउ के संस्थापक वरुण अग्रवाल कहते हैं, ''अंतरराज्यीय प्रवासी मजदूरों की समस्याओं का कारण यह है कि उनके गंतव्य राज्यों में उन्हें अपनापन नहीं मिलता है. प्रवासियों पर भरोसेमंद डेटा का न होना भी बड़ी समस्या है.''

विदेशों में रहने वाले हजारों भारतीयों को भी देश वापस लौटने पर मजबूर होना पड़ा लेकिन उनकी मदद के लिए भी केंद्र सरकार ने शायद ही किसी सहायता की घोषणा की. विश्व बैंक के मुताबिक, 2019 में विदेशों में रहने वाले भारतीयों ने 83 अरब डॉलर (6.08 लाख करोड़ रु.) की रकम अपने देश में भेजी थी जो कोविड के कारण 2020 में घटकर 64 अरब डॉलर (4.69 लाख करोड़ रु.) होने के आसार हैं. एक अनुमान के मुताबिक, देश लौटने वाले करीब 10 लाख प्रवासी खाड़ी देशों में नौकरियां गवां चुके हैं. उनकी वापसी से सरकार के सामने बड़ी चुनौती उनके पुनर्वास के साथ समाज में उनके फिर रच-बस पाने की भी है.   
—साथ में अमिताभ श्रीवास्तव

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