जिंदगी-मौत का संघर्ष
2020 ऐसे साल के तौर पर याद किया जाएगा जब भारत की स्वास्थ्य सेवा को कड़े इम्तिहान से गुजरना पड़ा और किस तरह उसने इस अभूतपूर्व चुनौती का बेहतरीन मुकाबला किया.

सुर्खियों के सरताज
कोविड-19: स्वास्थ्य
-सोनाली आचार्जी
अपने देश में कोविड-19 का पहला मामला 30 जनवरी को मिला था. वह कोरोना वायरस के मूल स्थान वुहान में पढ़ रहा एक भारतीय छात्र था जो अपने घर केरल लौटा था. अगले दो हफ्तों में राज्य में तीन और मामले दर्ज हुए और केरल का स्वास्थ्य महकमा हाइ अलर्ट पर आ गया. साथ ही वायरस पर काबू पाने के लिए राज्य की सीमाएं बंद कर दी गईं. इसके मुकाबले भारत के बाकी हिस्सों में अब भी थोड़ी निश्चिंतता थी.
दिल्ली के लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज और अस्पताल के डायरेक्टर डॉ. एन.एन. माथुर कहते हैं, ‘‘शुरुआत में दुनिया भर में किसी ने नहीं सोचा था कि महामारी इतनी तेजी से फैलेगी इसीलिए तकरीबन मार्च तक सीमाएं खुली रहीं. हाल की याद में ऐसी घटना पहले नहीं हुई और किसी को भनक तक नहीं थी कि कुछ ही महीनों में पूरी दुनिया में लॉकडाउन हो जाएगा.’’ लेडी हार्डिंग को शुरुआत में बिस्तरों का इंतजाम करने और तैयार रहने के लिए कहा गया जबकि दिल्ली और झज्जर के एम्स और दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल को बड़े कोविड अस्पताल के तौर पर नामजद किया गया.
25 मार्च को जब देश में लॉकडाउन लगाया गया, राजधानी में 1,000 के करीब बिस्तर मौजूद थे. मगर ज्यों ही वायरस चिंताजनक रफ्तार से फैला, देश के कई दूसरे अस्पतालों की तरह लेडी हार्डिंग में भी बिस्तरों की संख्या दोगुनी करनी पड़ी. आज दिल्ली में कोविड के मरीजों के लिए अलग रखे गए करीब 18,000 बिस्तर हैं. देश भर में पूरी तरह कोविड मरीजों के इलाज के लिए दस लाख से ज्यादा बिस्तर हैं. डॉ. माथुर कहते हैं, ‘‘गर्मियां आते-आते हमें आसपास के गेस्टहाउस और हमारे साथ के क्लिनिक भी अस्थायी अस्पतालों में बदलने पड़े क्योंकि मरीजों का तांता लगा था.’’
वाकई, महामारी जब चरम पर थी, भारत में रोज करीब 1,00,000 कोविड केस आ रहे थे. वायरस न केवल फैल रहा था बल्कि जानें भी ले रहा था. अगस्त में 24 घंटों के भीतर कोविड से 900 लोगों की मौत हुई. एम्स दिल्ली के डायरेक्टर डॉ. रणदीप गुलेरिया कहते हैं, ‘‘हमारा मुकाबला ऐसी बीमारी से था जिसका कोई इलाज पता नहीं था और जिसके लक्षणों को कोई अनुमान नहीं लगाया जा सकता था.
हमारी स्वास्थ्य सेवा का ढांचा इसके लिए तैयार नहीं था. कुछ हफ्तों के भीतर बिस्तर, दवा, टीके और रिसर्च के लिए राष्ट्रीय समितियां बना दी गईं. अस्पतालों के कर्मचारियों को अपनी हिफाजत करना सीखना पड़ा और जो भी मौजूदा था उससे काम चलाना पड़ा. देश के विशाल आकार के मद्देनजर अस्पतालों और डॉक्टरों ने जिस तेजी से अपने को कोविड के हिसाब से ढाला और इस आकस्मिक चुनौती से जिस तरह निपटे, वह सचमुच असाधारण है.’’
मरीजों का इलाज करना ही चुनौती नहीं था. टेस्ट, अलग रखने के इंतजाम, संपर्क में आने वालों का पता लगाना और लोगों को शिक्षित करना भी विशाल पैमाने पर किया जा रहा था. देश ने इस संकट को कैसे संभाला, इसका शानदार उदाहरण आरटी-पीसीआर किट मुहैया करवाने में देखा जा सकता है. मार्च में हमें आरटी-पीसीआर किट के लिए दो हफ्ते इंतजार करना पड़ा था; आज ये किट देश में ही बन रही हैं और 24 दिसंबर तक भारत में करीब 17 करोड़ टेस्ट हो चुके थे.
ये चीन, दक्षिण कोरिया, ब्रिटेन और जर्मनी में किए गए टेस्ट से ज्यादा हैं. भारत में बना और बिक्री के लिए मंजूर पहला टेस्ट विकसित करने वाली मायलैब्स के मैनेजिंग डायरेक्टर हसमुख रावल कहते हैं, ‘‘जब हमने देखा कि भरोसेमंद और स्वदेशी कोविड टेस्ट किट की जरूरत है, हमने फौरन अपनी रिसर्च टीम को इसे विकसित करने के काम में लगा दिया. शुरुआत में मैन्युफैक्चरिंग थोड़ी धीमी थी, मगर मई आते-आते हम एक दिन में 2,00,000 ऐसे टेस्ट किट बना रहे थे.’’ कई दूसरे स्टार्ट-अप और कंपनियां भी मेडिकल इन्फ्रास्ट्रक्चर खड़ा करने में भूमिका निभाने लगीं.
महिंद्रा ऐंड महिंद्रा ने स्वदेशी वेंटिलेटर बनाए, स्वच्छ हवा के समाधान देने वाली कंपनी निर्वाण बीइंग ने स्वदेशी एन95 और एन99 मास्क बनाए, कपड़ा मंत्रालय की देखरेख में पीपीई किट भारत में ही बनाई गईं और रेलवे ने कोविड आइसोलेशन बेड के लिए ट्रेनों के कोच खोल दिए. दिल्ली के सबसे बड़े कोविड अस्पताल एलएनजेपी के पूर्व मेडिकल डायरेक्ट डॉ. जे.सी. पासी कहते हैं, ‘‘लोग जैसे-जैसे मदद के लिए आगे आते गए, भारत वैसे-वैसे आत्मनिर्भर होता गया.
मास्क सिलने और हैंड सैनिटाइजर बनाने से लेकर अपने गृहनगर लौटने में लोगों की मदद करने तक हर कोई कुछ न कुछ योगदान देना चाहता था. और यही देश की ताकत है कि समस्या हल करने के लिए जो भी करना पड़े, हम करते हैं.’’
महामारी ने बेशक अप्रत्याशित चुनौतियां पैदा कीं. लॉकडाउन के ऐलान के बाद जब सार्वजनिक यातायात के सारे साधन बंद हो गए तो करोड़ों लाचार प्रवासी मजदूर अपने घरों के लिए पैदल निकल पड़े. इससे उनके गृहराज्यों को उन्हें अलग-थलग रखने की पर्याप्त सुविधाएं तैयार करनी पड़ीं, ताकि उनमें से कोई संक्रमित हो तो उसे गांवों में वायरस फैलाने जाने से रोका जा सके.
पूर्व स्वास्थ्य सचिव सुजाता राव कहती हैं, ‘‘दूरदराज के इलाकों में कोविड (का पहुंचना) तबाही होता. प्राथमिक स्तर पर हमारे यहां वैसा का इन्फ्रास्ट्रक्चर नहीं है.’’ उत्तर प्रदेश सरीखे राज्यों ने 1,00,000 आइसोलेशन बिस्तरों का इंतजाम किया और विशेष बसों तथा रेलगाडिय़ों से 8,00,000 से ज्यादा प्रवासियों को वापस लाने में कामयाब रहा.
अंतत: जब लॉकडाउन चरणबद्ध तरीके से हटाया गया, केंद्र और राज्य सरकारों को यह पक्का करने में जुटना पड़ा कि लोग आपस में दूरी का पालन करें और मास्क पहनें. राज्यों ने हर इलाके में मरीजों की संख्या के आधार पर जोन बनाने शुरू किए और जहां मामलों की तादाद कम थी, वहां पाबंदियों में ढील के साथ हालात दूसरे इलाकों के मुकाबले जल्दी सामान्य होने लगे. नीति आयोग के सदस्य डॉ. वी.के. पॉल कहते हैं, ‘‘हमें स्वास्थ्य की चिंताओं के साथ आर्थिक और सामाजिक तकाजों का संतुलन बिठाना पड़ा.
हम लॉकडाउन हमेशा लगाए नहीं रख सकते थे, लेकिन हमें यह पक्का करना पड़ा कि वायरस को रोकें और लोग जिम्मेदारी के एहसास के साथ सार्वजनिक जगहों पर लौटें.’’ लॉकडाउन हटाने के बाद कई राज्यों में संक्रमण बढ़ गया. केरल में, जहां मई में संक्रमण में दिख रहा था, त्योहारों में रोज 10,000 मामले आने लगे. केरल के स्वास्थ्य विभाग के नोडल अफसर डॉ. अमर फेटल कहते हैं, ‘‘लोगों को जागरूक करना और गलत जानकारियों से लडऩा प्राथमिकता थी, ताकि संक्रमण की रोकथाम हो सके. लोग जब समझेंगे कि क्या करना है और क्यों करना है, तभी वे करेंगे.’’
महामारी के बढ़ने के साथ डॉक्टरों और नर्सों के सामने मौजूद चुनौतियां जबरदस्त बनी रहीं. 1:1,456 डॉक्टर-मरीज अनुपात के साथ (डब्ल्यूएचओ का मानक 1:1,000) कोविड से निपटना आसान नहीं होने जा रहा था. स्वास्थ्यकर्मियों ने लगातार कई घंटों तक काम किया और अपनी जिंदगियां जोखिम में डालीं, हफ्तों परिवारों को देखे-मिले बगैर काम करते रहे. भोपाल के चिरायु अस्पताल के चेयरमैन डॉ. अजय गोयनका कहते हैं, ‘‘डॉक्टर होने के नाते हम मुश्किलों के आदी हैं.
हमारी प्रतिबद्धता मरीजों और उनकी सेहत के प्रति होती है. कोविड मुश्किल दौर था, खासकर इसलिए कि इसका कोई इलाज नहीं था. हमारे पास जो कुछ था, हमने आजमाया और हर मामले के साथ इस बीमारी के बारे में हम ज्यादा जानते गए. वक्त बीतने के साथ इलाज आसान और कारगर होता गया.’’
अब भी कोविड का कोई गारंटीशुदा इलाज नहीं है और वैक्सीन आने में अभी हफ्तों लगेंगे, ऐसे में आंकड़े इशारा करते हैं कि बदतरीन दौर शायद बीत चुका है. 24 दिसंबर को देश में महज 24,000 मामले सामने आए. अमेरिका में 3,32,475 लाख से ज्यादा लोग मारे गए हैं, भारत में 1,46,791 मौतों के साथ मृत्यु दर महज 1.4 फीसद है.
मामलों के दोगुना होने की दर अब करीब 90 दिन है, जो शुरुआत में 3.4 दिन थी. हमने भले ही बहुत कम जानकारियों और कमजोर स्वास्थ्य ढांचे के साथ शुरू किया हो, लेकिन महामारी के खिलाफ खुद को ढालना और जिंदा रहना हमने सीख लिया है.
बेहतरी की खातिर
›अपना फर्ज निभाने के पक्के इरादे से हीबा हसन स्टाफ हॉस्टल में ही बनी रहीं और दो महीने तक परिवार से दूर रहीं. आज हीबा गर्व से कहती हैं कि महामारी में उन्होंने सेवा की.