आवरण कथाः भारत की सबसे बड़ी मुश्किल
भारत वयस्क लोगों के टीकाकरण के लिए अपने पहले सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यक्रम का ताना-बाना बुन रहा है. ऐसे में 1.4 अरब लोगों के देश को इसके रख-रखाव और वितरण से जुड़ी चुनौतियों से निबटने की तैयारी भी करनी है.

सोनाली आचार्जी
दिग्गज फार्मा कंपनी फाइजर की 9 नवंबर की घोषणा में पहली बार दुनिया ने लंबी और तकलीफदेह सुरंग के आखिरी छोर पर कुछ रोशनी देखी. अपने कोविड के टीके (वैक्सीन) के तीसरे दौर के परीक्षण को सबसे पहले पूरी करने वाली फाइजर ने ‘बीएनटी161बी2’ के 90 फीसद असरदार होने का इशारा किया. फौरन बाद, टीके के तीन अन्य उम्मीदवारों—मॉर्डना, रूस की गमलेया इंस्टीट्यूट और ऐस्ट्राजेनेका-ऑक्सफोर्ड में विकसित किए जा रहे—के अंतरिम नतीजों का ऐलान हुआ और सभी के 90 फीसद से ज्यादा असरदार होने का इशारा किया गया.
इसके साथ ही कोविड की वैक्सीन अचानक दूर का सपना नहीं रह गई बल्कि दुनिया की पकड़ में आ चुकी हकीकत नजर आने लगी. फाइजर की खबर सुनकर 80 वर्षीय प्रथमेश कुमार, जिन्होंने बीते आठ महीनों से दिल्ली में अपने अपार्टमेंट से बाहर कदम तक नहीं रखा, फूट-फूटकर रो पड़े. वे कहते हैं, ‘‘अगर वैक्सीन उपलब्ध करवा दी जाती है तो मैं बिना सोचे इसे ले लूंगा.’’
अपने साथ रह रही नर्स के साथ के अलावा वे न तो अपने परिवार से मिल पाते हैं, न घूमने जा पाते हैं और न ही अपने पड़पोते के पहले जन्मदिन में शामिल हो पाए. वे कहते हैं, ‘‘अपने बच्चों की खातिर मैं घर के भीतर रहा, पर यह आधा जिंदा होने की तरह है.’’ प्रथमेश की तरह, अलग-अलग उम्र, लिंग और पृष्ठभूमि के लाखों लोग बेताबी से कोविड के टीके का इंतजार कर रहे हैं.
लेकिन 1.4 अरब से ज्यादा आबादी को टीका लगाने के भारी काम को देखते हुए कोविड टीका हासिल करने, रखने और दूर-दूर तक पहुंचाने की व्यवस्था भारत के लिए खासी बड़ी चुनौती है. एम्स दिल्ली के डायरेक्टर और कोविड-19 के वैक्सीन एडमिनिस्ट्रेशन के राष्ट्रीय विशेषज्ञ समिति के प्रमुख डॉ. रणदीप गुलेरिया कहते हैं, ‘‘भारत जैसे बड़े देश में कोविड टीके के लिए योजना बनाते वक्त कई चीजों पर ध्यान देना पड़ता है.’’
इस काम का खालिस पैमाना ही इतना विशाल है. वैक्सीन विशेषज्ञ डॉ. गगनदीप कंग कहते हैं कि खासकर नई वैक्सीन टेक्नोलॉजी के मैन्युफैक्चरिंग का काम इतने बड़े पैमाने पर पहले कभी नहीं हुआ और यह देखना बाकी है कि जब कई लाख खुराक सप्लाइ करनी हो तो उत्पादन प्रक्रिया इसे कैसे पूरा करेगी.
टीके की खरीद
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 21 नवंबर को देश की कोविड वैक्सीन रणनीति की समीक्षा के लिए एक बैठक की. इसमें भारत में वैक्सीन के विकास की प्रगति, कोल्ड चेन स्टोरेज, खरीद और कीमत को लेकर चर्चा की गई. वे राज्य स्तर की वितरण योजनाओं पर चर्चा के लिए मुख्यमंत्रियों के साथ वर्चुअल कॉन्फ्रेंस कर चुके हैं.
वे देश के तीन सबसे बड़े वैक्सीन निर्माताओं—जायडस कैडिला, सीरम इंस्टीट्यूट और भारत बायोटेक—के यहां भी गए. केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने 4 अक्तूबर को ऐलान किया कि उसका लक्ष्य जुलाई 2021 तक 25 करोड़ लोगों को टीका लगाना है. पर यह कहना जितना आसान है, कर पाना उतना ही मुश्किल.
दुनिया भर के वैक्सीन निर्माता लाखों टीके बनाने का दावा कर रहे हैं, फिर भी विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने इनकी कमी पडऩे का पूर्वानुमान जाहिर किया है. ऑक्सफैम की एक रिपोर्ट के मुताबिक, वैक्सीन की करीब 51 फीसद संभावित खुराक अमीर देशों यानी अमेरिका, यूरोपीय यूनियन, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और जापान ने अपने लिए सुरक्षित कर ली हैं. सामूहिक रोग प्रतिरोधक क्षमता (हर्ड इम्युनिटी) हासिल करने के लिए भारत को अपनी 60 फीसद आबादी यानी 80 करोड़ लोगों को टीका लगाने की जरूरत है, जिसके लिए उसे दूसरे बूस्टर शॉट की जरूरत को भी ध्यान में रखते हुए 1.6 अरब खुराकें चाहिए होंगी.
यह देश की उस मौजूदा वैक्सीन सप्लाइ से कहीं ज्यादा है जिसमें सीरम इंस्टीट्यूट ने करीब 40 करोड़, भारत बायोटेक ने 30 करोड़ और जायडस कैडिला ने 10 करोड़ खुराक का वादा किया है. इनमें से किसी ने भी अभी तीसरे दौर के परीक्षण पूरे नहीं किए हैं, पर लाखों में उत्पादन शुरू करने वाले हैं. भारत चरण 3 के परीक्षण पूरे कर चुकी फाइजर और मॉर्डना जैसी फर्मों से भी बात कर रहा है, पर किसी आधिकारिक आंकड़े का खुलासा नहीं किया गया है.
किसे मिलेगा टीका?
सीमित संख्या में सप्लाइ के चलते भारत के लिए यह जरूरी हो जाता है कि वह अपना टीकाकरण कार्यक्रम चरणों में पूरा करे. पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन ऑफ इंडिया (पीएचएफआइ) के प्रेसिडेंट डॉ. श्रीनाथ रेड्डी कहते हैं, ‘‘शुरुआत में वैक्सीन शायद सबसे अधिक जरूरत के आधार पर, जैसे कि स्वास्थ्यकर्मियों को दी जाएगी.
अगर वैक्सीन के पात्र लोगों के बारे में पहले से पता हो और उनकी सूची बना ली जाए तो यह ज्यादा आसान हो जाएगा. फिर ज्यादा वैक्सीन की मंजूरी मिलने और सप्लाइ बढऩे के साथ बहुत लंबी-चौड़ी कोशिश करने की जरूरत होगी. वैक्सीन के प्रति विश्वास बढऩे के साथ मांग में भी इजाफा होगा. इसलिए अंतत: हमें उस चरण में पहुंचने की जरूरत होगी जहां कोविड टीकाकरण जन स्वास्थ्य सेवा का नियमित हिस्सा बना जाएगा.’’
केंद्र सरकार, राज्य सरकारों के साथ मिलकर, करीब 30 करोड़ लोगों की पहचान करने की प्रक्रिया में है जो प्राथमिकता लाभार्थी होंगे और जिन्हें आरंभिक चरण में टीके की खुराक दी जाएगी. इसे सबसे कमजोर या संवेदनशील समूहों की चार श्रेणियों में बांटा गया है— 1) 1 करोड़ स्वास्थकर्मी (डॉक्टर, मेडिकल छात्र, नर्सें और स्वास्थ्य कार्यकर्ता); 2) करीब 2 करोड़ अगली पंक्ति के कार्यकर्ता (नगरपालिका-निगमों के कर्मी, पुलिसकर्मी, सशस्त्र बल); 3) 50 साल के ज्यादा उम्र के 26 करोड़ लोग; और 4) विशेष श्रेणी जिसमें 50 से कम उम्र के सह-रुग्णता वाले लोग शामिल हैं. राज्यों से अपनी प्राथमिकता वाली आबादी की सूची जल्द से जल्द बनाने कहा गया है.
मौजूदा योजना के मुताबिक, केंद्र टीके खरीदकर हासिल करेगा और उन्हें राज्यों को देगा, जिसे वे फिर पहले प्राथमिक समूहों के बीच वितरित करेंगे. केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन ने अक्तूबर में कहा था कि कोविड के टीकाकरण की कोशिशें एक साल की अवधि तक चलेंगी, जिसमें चरणबद्ध तरीके से कई समूहों को टीका लगाया जाएगा.
कमजोर समूहों के साथ ही युवाओं को भी वैक्सीन दी जानी चाहिए या नहीं, इसको लेकर विशेषज्ञों की राय बंटी हुई है. स्वास्थ्य मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, वायरस की चपेट में आए लोगों में से करीब 80 फीसद 40 साल से कम उम्र के रहे हैं, पर वायरस की वजह से जान गंवा देने वालों में 90 फीसद लोग 40 से ज्यादा उम्र के हैं. डॉ. रेड्डी कहते हैं, ‘‘युवा लोग कार्यबल का अनिवार्य हिस्सा हैं और उनकी आवाजाही के चलते उनके लिए वायरस की चपेट में आना और फिर इसे अपने परिवार के बुजुर्ग लोगों तक पहुंचा देना आसान हो जाता है.
वैसे, वैक्सीन की सीमित उपलब्धता को देखते हुए शायद उन्हें प्राथमिकता नहीं माना जाएगा.’’ वे यह भी महसूस करते हैं कि सह-रुग्णताओं के बजाए आयु समूह के अनुसार टीके लगाना सबसे ज्यादा व्यवहार्य रास्ता होगा, खासकर इसको देखते हुए कि ग्रामीण इलाकों में जांच-पड़ताल की कमजोर व्यवस्था की वजह से दूसरी बीमारियों से भी ग्रस्त कई सारे लोगों को अपनी हालत के बारे में शायद पता तक न हो.
मंत्रालय के एक सूत्र यह भी कहते हैं कि व्यापक टीकाकरण चरण के दौरान अधिक जनसंख्या घनत्व वाले शहरों को, इन इलाकों में ज्यादा जोखिम को देखते हुए, जिसे सर्दियों की शुरुआत के साथ वायु प्रदूषण ने और भी बदतर बना दिया है, प्राथमिकता दी जाएगी. किसी भी उभरते हॉटस्पॉट को भी प्राथमिकता दी जाएगी.
लोगों तक वैक्सीन पहुंचाना
केंद्र के सार्वभौमिक टीकाकरण कार्यक्रम (यूआइपी) के तहत भारत ने 2014 में पोलियो और 2015 में नवजात टेटनस के उन्मूलन में सफलता पाई थी. अधिकारियों को उम्मीद है कि जब कोविड का टीका लगाया जाना शुरू होगा तब कोविड टीकाकरण कार्यक्रम की कामयाबी पक्की करने के लिए यूआइपी के इसी बुनियादी ढांचे का फायदा लिया जा सकेगा.
देश को टीकों को दूर-दराज के इलाकों तक पहुंचाने का और टीका को लेकर लोगों के मन से डर निकालने का बरसों का तजुर्बा हासिल है, फिर भी यह पहला मौका होगा जब देश वयस्क लोगों को टीका लगाने के जन स्वास्थ्य कार्यक्रम का तानाबाना बुन रहा होगा. वहीं, जहां प्रथमेश कुमार जैसे लोग टीके को लेकर उत्साही हैं, तो राजस्थान में उदयपुर के नजदीक बांसवाड़ा जिले की एक 36 वर्षीय सहायक नर्स दाई (एएनएम) आरती रावल के मुताबिक, ज्यादातर वयस्कों को टीका लगवाने के लिए राजी करना बड़ी चुनौती होगी.
वे कहती हैं, ''जागरूकता अभियानों की बदौलत, ज्यादा परिवार मानते हैं कि बच्चों को टीके लगवाने की जरूरत है, पर एक बार मैंने एक बुजुर्ग पुरुष से पूछा कि क्या वे हेपेटाइटस बी का टीका लगवाएंगे तो उन्होंने मना कर दिया. वे दवाई या इलाज तो चाहते थे पर टीका या बीमारी की रोकथाम नहीं चाहते थे.’’
जन स्वास्थ्य विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर ठीक से संभाला गया तो यह देश में टीकाकरण कार्यक्रमों के लिए नए रास्ते का निर्माण करेगा. हृदय रोग विशेषज्ञ और एम्स दिल्ली में डीन ऑफ एकेडमिक्स डॉ. वी.के. बहल कहते हैं, ‘‘वयस्क टीकाकरण भारत में आम नहीं है. अभी तक यह मोटे तौर पर क्लिनिकों के जरिए किया जाता है और वयस्क टीका लगवाने के लिए उस तरह आगे नहीं आते जैसे पश्चिम में आते हैं.
टीकाकरण और सुरक्षा को लेकर बहुत सारे मिथ भी प्रचलित हैं. यह पहला अवसर होगा जब हम वयस्कों को टीके लगाने का जन स्वास्थ्य अभियान चलाएंगे. इससे जो संवाद उभरेगा वह इस तथ्य के बारे में जागरूकता फैलाने के लिए अहम होगा कि वयस्कों को भी सुरक्षा की जरूरत है.’’ जागरूकता और वितरण दोनों की व्यवस्थाओं को संभालने के लिए राज्यों से कहा गया है कि वे ऐसी विशिष्ट इमारतों की पहचान करें जो टीकाकरण बूथ का काम करेंगी.
डॉ. बहल कहते हैं, ‘‘भरोसेमंद सूचनाएं मिथ और आशंकाओं को दूर करने का अकेला तरीका हैं.’’ एएनएम, आशा और आंगनवाड़ी कार्यकर्ता खासकर पोषण, बाल और मातृ स्वास्थ्य तथा बाल टीकाकरण पर जन स्वास्थ्य शिकायतों को संभालने के लिए पहले से प्रशिक्षित होती हैं, उनके हुनर को ऐसे दुरुस्त करना होगा कि वे वयस्कों के कोविड टीकाकरण को संभाल सकें.
वास्तविक टीका लगाने के बारें में भी पूरी तरह विचार करने की जरूरत है. ज्यादातर प्रमुख टीके मांसपेशी में लगाए जाते हैं और इन्हें प्रशिक्षित स्वास्थ्य कार्यकर्ता ही लगा सकते हैं, जिनकी कमी है. दिल्ली के राजीव गांधी सुपर स्पेशिएलिटी अस्पताल के डायरेक्टर बी.एल. शेरवाल कहते हैं, ‘‘ज्यादातर डॉक्टर कोविड के मरीजों को संभालने में व्यस्त हैं, तो देखना होगा कि टीकाकरण के लिए स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं को कैसे लामबंद किया जाता है. हमने महामारी को संभाल लिया है, टीकाकरण को भी संभाल लेना चाहिए. संसाधनों की कमी के बावजूद स्वास्थ्य व्यवस्था चुनौती पर खरी उतरेगी.’’
स्वास्थ्य मंत्रालय ने राज्यों से जिला स्तरीय समितियां बनाने को कहा है जो शीत शृंखला प्रबंधन, दूर-दराज के इलाकों तक परिवहन और सभी लोगों तक पहुंचने की कोशिशों सरीखी प्रमुख गतिविधियों की समीक्षा और उनका मार्गदर्शन करेंगी. चीफ सेक्रेटरी की अध्यक्षता में एक राज्य संचालन समिति, एडिशनल चीफ सेक्रेटरी या प्रिंसिपल सेक्रेटरी की अगुआई में एक राज्य कार्य बल और जिला मजिस्ट्रेट की अगुआई में एक जिला कार्य बल गठित किया जाएगा.
ई-वीआइएन, या इलेक्ट्रॉनिक वैक्सीन इंटेलिजेंस नेटवर्क के इस्तेमाल को लेकर चर्चाएं चल रही हैं. यह देश में ही विकसित टेक्नोलॉजी प्रणाली है जो लाभार्थियों की पहचान करने और टीकाकरण की तारीखों पर नजर रखने में मदद कर सकती है. ऐसा ही एक डिजिटल प्लेटफॉर्म 2015 से ही यूआइपी के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है और वैक्सीन के स्टॉक और भंडार के तापमान की जानकारी उसी वक्त देता है.
वितरण की चुनौतियां
डॉ. गुलेरिया के मुताबिक, सीरिंज की मैन्युफैक्चरिंग, वैक्सीन की ढुलाई और कोल्ड स्टोरेज के विकल्पों की जांच-पड़ताल सरीखे वितरण प्रक्रिया के कई पहलुओं की पहले से ही पड़ताल की जा रही है.
ढुलाई के लिए, तापमान नियंत्रित क्षेत्र वाली एयरलाइनों और हवाई अड्डों से वैक्सीन की चार्टर्ड उड़ानों की तैयारी करने के लिए कह दिया गया है. छत्रपति शिवाजी महाराज अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट के प्रवक्ता के मुताबिक, ''समर्पित ट्रक डॉक्स, एक्सरे मशीनों, यूएलडी (यूनिट लोड डिवाइस) निर्मित वर्कस्टेशन के साथ चौबीस घंटे के ग्रीन चैनल होंगे और वैक्सीन के कामों की चौबीस घंटे निगरानी’’ के लिए प्रमुख एकाउंट मैनेजर तैनात किए जाएंगे. इंडिगो एयरलाइन और एयर इंडिया के प्रवक्ताओं ने भी वैक्सीन की ढुलाई में मदद देने के लिए अपनी तैयारी की ओर इशारा किया है.
ज्यादा बड़ी मुश्किलें भंडारण से जुड़ी होंगी. भारत के स्वास्थ्य सचिव राजेश भूषण ने नवंबर में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में स्वीकार किया, ‘‘भारत में कोल्ड स्टोरेज की सीमित क्षमता बड़ी अड़चन होगी.’’ क्रेडिट सुइस की एक रिपोर्ट वैक्सीन स्टोरेज के लिए निजी क्षेत्र सहित भारत की कुल कोल्ड चेन क्षमता फिलहाल 85-90 करोड़ खुराकों की है. इसमें यूआइपी के तहत 28,000 से ज्यादा स्थानों के कोल्ड चेन भी शामिल हैं. कितने और की जरूरत होगी इसकी पड़ताल हो रही है.
भारत में कोल्ड चेन के विस्तार की अपनी निश्चित सीमाएं हैं. मिसाल के लिए, इसके लिए जरूरी बहुत-सी टेक्नोलॉजी आयातित है, जिससे इसकी लागत बढ़ जाती है. भारत के कई हिस्सों में बिजली आपूर्ति से जुड़े मुद्दे भी हैं. वैसे, विशेषज्ञों का सोचना है कि यह देश के लिए शीत शृंखलाओं में निवेश करने का मौका है.
मेडिसिन्स सैन्स फ्रंटियर्स या डॉक्टर्स विदआउट बॉर्डर्स की दक्षिण एशिया प्रमुख लीना मेंघानी कहती हैं, ‘‘भारत कुछ अन्य अग्रणी वैक्सीन के लिए कोल्ड चेन के निर्माण की चुनौती को संभाल सकता था. असल में अब वक्त आ गया है कि हम ऐसा करें. पर इस वक्त सोचने की प्रमुख बात यह नहीं है कि हमें ऐसी एक वैक्सीन चुनना चाहिए या नहीं जिसके लिए कोल्ड चेन की जरूरत है, बल्कि यह है कि हम कौन-सी वैक्सीन असल में प्राप्त कर सकते हैं.’’
अमेरिका, यूरोपीय यूनियन, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और जापान ने गरीब देशों को वैक्सीन का वितरण सुनिश्चित करने के लिए गठित डब्ल्यूएचओ के निकाय कोवैक्स को दरकिनार कर दिया है और वैक्सीन के लिए फाइजर और मॉर्डना के साथ सीधे सौदों पर दस्तखत किए हैं. मेंघानी कहती हैं, ‘‘एड्स और इबोला महामारियों के दौरान हम पहले भी ऐसे हालत देख चुके हैं; कोविड कोई अलग नहीं है.’’ दिलचस्प कि डब्ल्यूएचओ ने विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) को दिए गए भारत और दक्षिण अफ्रीका के प्रस्ताव का समर्थन किया है, जिसमें मांग की गई है कि देशों को कोविड की रोकथाम, नियंत्रण और उपचार से जुड़ी कुछ निश्चित किस्म की बौद्धिक संपदा (आइपी) के संरक्षण को निलंबित करने की इजाजत दे दी जाए.
यह निलंबन तब तक जारी रहेगा जब तक दुनिया में टीकाकरण पूरा नहीं हो जाता या वायरस से रोग प्रतिरोधक क्षमता विकसित नहीं हो जाती. मेंघानी कहती हैं, ''चिंता आपूर्ति को लेकर है, जो पेटेंट और आइपी की वजह से सीमित हो जाएगी. अगर इससे निजात पाई जा सके तो दूसरी कंपनियां भी बेहतरीन वैक्सीन का उत्पादन कर सकेंगी और ज्यादा स्टॉक पक्का कर सकेंगी.’’ डब्ल्यूटीओ का फैसला अभी आना है.
जैसा कोविड आरटी-पीसीआर टेस्ट की मैन्युफैक्चरिंग और वितरण में हुआ था, जहां दुनिया को टेस्ट किट के लिए जरूरी अभिकर्मकों, रसायनों की तीव्र कमी का सामना करना पड़ा था, उसी तरह विशेषज्ञ कांच की शीशियों और सीरिंज की उपलब्धता को लेकर खासे चिंतित हैं, जो टीकाकरण कार्यक्रम के लिए बेहद जरूरी हैं.
देश का सबसे बड़ी सीरिंज निर्माता कंपनी हिंदुस्तान सीरिंज ऐंड मेडिकल डिवाइसेज (एचएमडी) अपनी उत्पादन क्षमता जून 2020 में 57 करोड़ इकाई से अगले साल 1 अरब इकाई तक करीब दोगुनी बढ़ाने का मंसूबा बना रही है. मगर कांच की शीशियां लॉजिस्टिक की समस्या पैदा कर सकती हैं, खासकर वैक्सीन शीशी के मॉनिटर को लेकर, जो तापमान की वजह से वैक्सीन को हुए नुक्सान का संकेत करते हैं और यह दुनिया में केवल एक कंपनी पाथ (पीएटीएच) मुद्रित करती है.
कोविड टेस्ट की तरह वैक्सीन की कीमत की ऊपरी सीमा तय की जाएगी या नहीं, यह भी देखना बाकी है. कई विशेषज्ञों का मानना है कि वैक्सीन मुफ्त उपलब्ध करवाई जानी चाहिए. रेड्डी कहते हैं, ‘‘यह सबकी भलाई का काम है. अगर कोई इसलिए संक्रमित हो जाता है क्योंकि वह वैक्सीन का खर्च नहीं उठा सकता, तो कोविड का फैलना जारी रहेगा. वैक्सीन की सुलभता सीमित नहीं होनी चाहिए.’’
हम जल्दबाजी तो नहीं कर रहे हैं?
दुनिया ने वैक्सीन के विकास में इतनी तेजी पहले कभी नहीं देखी. ऐसे में लंबे वक्त की सुरक्षा और परीक्षणों से संबंधित सार्वजनिक डेटा उपलब्ध नहीं होने से चिंता बनी हुई है. विशेषज्ञ चिंतित हैं कि वैक्सीन को लेकर हम कहीं जल्दबाजी तो नहीं कर रहे. ऑल इंडिया ड्रग ऐक्शन नेटवर्क की को-कनवीनर मालिनी ऐसोला कहती हैं, ‘‘ज्यादातर घोषित डेटा अंतरिम हैं, हमें खुशी मनाने के लिए और ज्यादा प्रकाशित और संपूर्ण डेटा की जरूरत है.
अभी तक परीक्षण पूरे नहीं हुए हैं. हम यह तक नहीं जानते कि सुरक्षा या लंबे वक्त का असर कैसा होगा.’’ डॉ. कंग को वैक्सीन के असर में कमी आने की कोई आशंका नहीं है, पर उन्हें लगता है कि यह सुरक्षा पता नहीं कब तक टिकेगी. वे कहती हैं कि लोगों के अलग-अलग समूहों की सुरक्षा की जांच करने की जरूरत होगी, जो परीक्षणों के खत्म होने और डेटा के सार्वजनिक होने के बाद ही किया जा सकता है.
सबसे व्यवहारिक योजना यही है कि और ज्यादा वैक्सीन के परीक्षण पूरे और डेटा प्रकाशित होने के साथ नतीजों के हिसाब से खुद को ढालते रहें. डॉ. गुलेरिया कहते हैं, ‘‘अगर हमारे पास कोई वैक्सीन बाद में आई जो पहली से ज्यादा असरदार है, तो हमें अधबीच सुधार कर पाने की जरूरत होगी. यह भी तय करना होगा कि किसे किस वैक्सीन की जरूरत है. यह देखने के लिए वक्त की जरूरत है कि वैक्सीन बाजार से, क्रलू की वैक्सीन की तरह, कैसे खरीदी और ली जा सकती है. यह असल में आदर्श स्थिति होगी.’’
साल ज्यों-ज्यों अंत के करीब आ रहा है, देश भर में लाखों लोग इस महामारी को खत्म होते देखने को बेताब हैं. वैक्सीन का लगना जहां 2021 से पहले ही शुरू हो सकता है, वहीं यह अब भी रामबाण दवा होने से बहुत दूर है. लॉजिस्टिक्स तो आगे के रास्ते में आने वाली महज एक चुनौती है. अलग-अलग वैक्सीन बाजार में आ सकती हैं. असर, जरूरत और सप्लाइ के आधार पर अलग-अलग समूहों को अलग-अलग वैक्सीन मिल सकती हैं. मौजूदा अनिश्चितता को देखते हुए सबसे अच्छी रणनीति वही होगी जिसे बदलते हुए हालात के हिसाब से बदला और ढाला जा सके.
भारत सरीखे विशाल देश में कोविड वैक्सीन के लिए कोई योजना बनाते हुए बहुत सारी चीजों को ध्यान में रखना होता है’’
डॉ. रणदीप गुलेरिया
डायरेक्टर, एम्स, दिल्ली,
और प्रमुख, कोविड-19 के लिए वैक्सीन एडमिनिस्ट्रेशन की विशेषज्ञ समिति
डॉ. श्रीनाथ रेड्डी
प्रेसिडेंट, पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन ऑफ इंडिया (पीएचएफआइ)
‘‘वैक्सीन सार्वजनिक भलाई की चीज है. अगर कोई व्यक्ति इस वजह से संक्रमित हो जाता है कि वह उसे खरीद नहीं सकता तो कोविड फैलता ही रहेगा. वैन्न्सीन की उपलब्धता सीमित नहीं
होनी चाहिए’’
बहुत ठंड की जरूरत
बेल्जियम के पुर्स में फाइजर बायोएनटेक के एक केंद्र पर उसके कोविड-19 वैक्सीन की शीशियों के लिए फाइजर के कोल्ड स्टोरेज
‘‘अभी सोचने की प्रमुख बात यह नहीं है कि क्या हमें एक ऐसी वैक्सीन को चुनना चाहिए जिसके लिए कोल्ड चेन स्टोरेज की जरूरत है, बल्कि यह है कि हम कौन-सी वैक्सीन असल में प्राप्त कर सकते हैं’’
लीना मेंघानी
दक्षिण एशिया प्रमुख, मेडिसिन्स सैन्स फ्रंटियर्स
मालिनी एसोला
को-कनवीनर,
ऑल इंडिया ड्रग ऐक्शन नेटवर्क
यह देखते हुए कि अधिकतर डेटा अंतरिम हैं, हमें खुशी मनाने के लिए और ज्यादा डेटा की जरूरत है. यहां तक कि अभी तो परीक्षण तक पूरे नहीं हुए हैं’’
—सोनाली आचार्जी