उम्मीद और मायूसी

महामारी से अर्थव्यवस्था तहस-नहस हो गई और हर तरफ वजूद बचाने का संघर्ष जारी, लेकिन कुछ ने इस संकट में अपने लिए मौका पाया और उस पर टूट पड़े, एक मोटा आकलन कि इस तबाही में कौन ढहा और कौन बचा

आशा और हताशा
आशा और हताशा

भारत जैसे 203 लाख करोड़ रुपए की विशाल अर्थव्यवस्था वाले देश में जब दुनिया में सबसे सख्त लॉकडाउन लगता है, जैसा कि छह महीने पहले किया गया, तो गहरे नकारात्मक असर की ही उम्मीद की जा सकती है. असर ठीक-ठीक कितना गहरा था, यह केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय के 31 अगस्त के आंकड़ों से सामने आया. भारतीय अर्थव्यवस्था वित्त वर्ष 21 की पहली तिमाही में जबरदस्त 23.9 फीसद सिकुड़ गई और दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में सबसे खस्ताहाल अर्थव्यवस्थाओं में आ गई.

देश की संपदा और खुशहाली में सबसे ज्यादा योगदान और करोड़ों लोगों को रोजगार देने वाले बहुत सारे सेक्टर वित्तीय संकट की गिरफ्त में आ गए, जिससे उनके उबरने की कोई सूरत इस वित्त वर्ष में तो नजर नहीं आती. जीडीपी में 16 फीसद की हिस्सेदारी रखने वाला मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र कमजोर मांग के कारण घिसट रहा है. इसका नतीजा निवेशों में गिरावट और कर्जों के उठाव में कमी की शक्ल में सामने आया, वह भी तब जब बैंकों के पास पैसा ही पैसा है. सबसे बुरी मार सेवा क्षेत्र पर पड़ी, जो सकल मूल्य संवर्धन में 55 फीसद का योगदान और 31 फीसद कार्यबल को नौकरियां देता है. ट्रैवल, हॉस्पिटैलिटी और रिटेल सेक्टर उस चीज की चपेट में आ गए जिसे विशेषज्ञ अंग्रेजी में 'डिमांड डिस्ट्रक्शन' यानी मांग के खत्म होने से पैदा तबाही कह रहे हैं. लोगों ने यात्रा की योजनाएं, बाहर खाने के मंसूबे या महत्वाकांक्षी सामान की खरीद स्थगित क्या की कि मांग मानो हमेशा के लिए गायब हो गई.


अलबत्ता कुछ क्षेत्र हैं जो संकट में भी अवसर खोजने में कामयाब रहे. मसलन, महामारी और लॉकडाउन से दवा उद्योग, ई-कॉमर्स और एजुटेक यानी शैक्षणिक टेक्नोलॉजी क्षेत्रों को फायदा हुआ. तमाम दूसरे क्षेत्र खुद को नए सिरे से ईजाद करके और टेक्नोलॉजी का फायदा उठाकर, या फलते-फूलते वर्चुअल विस्तार में ऊपर चढ़ सकने और टिके रह सकने वाले कारोबारों का निर्माण करके गर्त से निकलने की कोशिश कर रहे हैं.

कोविड-19 से तार-तार
जब कोविड-19 ने देश को अपनी चपेट में लिया और 24 मार्च को देशव्यापी लॉकडाउन का ऐलान कर दिया गया, तब भारतीय अर्थव्यवस्था पिछली लगातार चार तिमाहियों से पहले ही मंदी की हालत से गुजर रही थी. फैक्टरियों के बंद होने और दिहाड़ी के कामों के खत्म होने का नतीजा सबसे पहले प्रवासियों की कूच के रूप में सामने आया, और फिर जब लॉकडाउन की पाबंदियों में ढील दी गई तो मजदूरों और कामगारों की कमी पड़ गई. सोशल डिस्टेंसिंग के नियम-कायदों ने उत्पादन को और भी चोट पहुंचाई. तमाम क्षेत्रों और ओहदों की नौकरियों की तनख्वाहों में कटौतियों और लाखों नौकरियों के खत्म होने से खपत में गिरावट आई और मांग मंद पड़ गई. इससे मैन्युफैक्चरिंग बुरी तरह लड़खड़ा गई.


एमएसएमई (कुटीर, लघु और मझोले उद्यम), जिनकी संख्या सरकारी आंकड़ों में 6.33 करोड़ है और जो 15 करोड़ से ज्यादा लोगों को रोजगार देते हैं, मरणासन्न हालत में हैं. वे अपना कामकाज या तो घटा रहे हैं या पूरी तरह समेट रहे हैं. सरकार ने 20 लाख करोड़ रुपए के जिस राहत पैकेज का ऐलान किया, जिसमें एमएसएमई को जमानत-मुक्त और सरकार-समर्थित कर्जों के लिए 3 लाख करोड़ रुपए भी शामिल हैं, उससे भी कुछ खास मदद नहीं मिल सकी. एमएसएमई और ज्यादा कर्ज की नहीं बल्कि प्रत्यक्ष नकद सहायता, तयशुदा शुल्कों में माफी और कर्ज पर मोरेटोरियम बढ़ाने की मांग कर रहे हैं. बहरहाल, यह इधर कुआं, उधर खाई वाली स्थिति है, क्योंकि बैंक 'जोखिम भरे' कर्ज देने में डर रहे हैं.


ऑटोमोबाइल क्षेत्र में कुल बिक्री में उठाव आना अभी बाकी है, बावजूद इसके कि डीलरशिप फिर खुल रही हैं और वाहन निर्माता त्योहारी सीजन की छूट और तोहफों से ग्राहकों को लुभा रहे हैं. परिधानों, उपभोक्ता सामान और ज्यादातर इलेक्ट्रॉनिक सामान की बिक्री सुस्त बनी हुई है.


नोटबंदी, रेरा (रियल एस्टेट नियामक प्राधिकरण) के अनुपालनों और गैर-बैंकिंग वित्त कंपनियों के संकट से पहले ही तहस-नहस रियल एस्टेट क्षेत्र अब भी ऊहापोह में है. महामारी ने उड्डयन क्षेत्र को तबाह कर दिया, क्योंकि घरेलू और अंतरराष्ट्रीय उड़ानें लॉकडाउन के दौरान बंद रहीं और विमान कंपनियां घाटे के नीचे दब गईं.

...और जिन्हें इससे फायदा हुआ
अलबत्ता विभिन्न उद्योगों में छाई इस मायूसी के बीच कुछ क्षेत्र हैं जिन्होंने इस रुझान को उलट दिया. ई-कॉमर्स ऐसा ही एक क्षेत्र है. यह बढ़कर 30 अरब डॉलर का कारोबार हो गया है और अगले चार साल में इसका 100 अरब डॉलर पर पहुंच जाना तय है. लॉकडाउन में ढील के बावजूद कई लोग अपने घरों की सुख-सुविधा में रहते हुए खरीदारी करने के अभ्यस्त हो गए. इससे वे भीड़-भाड़ से बच जाते हैं और सामान दरवाजे पर आ जाता है. एफएमसीजी कंपनियों ने भी अच्छा कारोबार किया, क्योंकि साबुन, क्लीनिंग लिक्विड और सैनिटाइजर सरीखे निजी साफ-सफाई के उत्पादों की बिक्री में उछाल आया. उधर अच्छी फसल और बेहतर मजदूरी ने ग्रामीण भारत में मांग को उकसाने में मदद की. शुरुआती गिरावट के बाद छोटी कार और दोपहिया वाहनों की बिक्री की संभावनाएं बेहतर नजर आती हैं, क्योंकि जो साधन-संपन्न हैं, वे आने-जाने के लिए सार्वजनिक के बजाए निजी वाहन को तरजीह देते हैं.


इसी तरह, लॉकडाउन ने वर्चुअल शिक्षा के क्षेत्र के लिए वरदान का काम किया है. शैक्षणिक टेक्नोलॉजी से जुड़ी स्टार्ट-अप कंपनियों ने शिक्षण सामग्री की मांग में तेज उछाल आते देखा. संकट से जूझ रहे हॉस्पिटैलिटी सेक्टर में भी कुछ उत्साहवर्धक रुझान दिखाई दे रहे हैं. उद्योग के अनुमानों के हिसाब से शहरों के ज्यादातर होटलों में कमरों के भरे होने की दर 15-20 फीसद बनी हुई है, जबकि केवल दिन में मौज-मस्ती की सुविधा मुहैया करने वाली स्टेकेशन संपत्तियां और वीकेंड होटल सप्ताहांत में 85 फीसद और सप्ताह के दिनों में 65 फीसद भरे रहने लगे हैं.


सेहत सबसे अव्वल प्राथमिकता हो गई और ऐसे में हेल्थकेयर क्षेत्र के लिए अवसर बढ़ गए हैं. कई भारतीय कंपनियां कोविड-19 की वैक्सीन की तलाश में जुटी हैं. उन डायग्नोस्टिक चेन में उछाल आया है जो कोविड की जांच की सुविधा प्रदान कर रही हैं. ऐसा ही उछाल पीपीई और हाइजीन तथा सैनिटेशन उत्पादों वाले कारोबारों में भी आया है.


इस बीच महामारी ने ऑटोमेशन की प्रक्रिया को तेज कर दिया है. शॉप फ्लोर, रिटेल शोरूम, ई-कॉमर्स स्थल और हॉस्पिटैलिटी उद्योग सभी कामगारों पर निर्भरता कम करने और दक्षता तथा प्रतिस्पर्धा की क्षमता बढ़ाने के लिए तेजी से इंटरनेट ऑफ थिंग्ज (आइओटी) और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआइ) पर आधारित समाधान अपना रहे हैं. अलबत्ता यह केवल उन्हीं कंपनियों के बारे में सच है जिनके पास पर्याप्त नकदी है; दूसरी कंपनियां नकदी का संकट झेल रही हैं और बुनियादी कामकाज को पटरी पर लाने की जद्दोजहद में लगी हैं.

एक आर्थिक खुराक
मई में सरकार के 20 लाख करोड़ रु. के पैकेज में यह भी शामिल था कि बैंकिंग प्रणाली में अधिक नकदी डालने के आरबीआइ के कई उपाय शामिल थे. हालांकि, कई क्षेत्रों में संकट के पैमाने को देखते हुए ये उपाय अपर्याप्त थे. उद्योग और अर्थशास्त्री दोनों ही सरकार से अपनी जेब थोड़ी ढीली करने और अपने राजकोषीय घाटे के लक्ष्य को मौजूदा 3 प्रतिशत से बढ़ाकर 4 प्रतिशत करने का आग्रह कर रहे हैं. जरूरी है कि सरकार जरूरतमंद परिवारों को नकद सहायता दे और संकटग्रस्त व्यवसायों के लिए धन का प्रबंध करे. उद्योग कर्ज पर मोरेटोरियम की अवधि बढ़ाने और ब्याज में छूट की गुहार लगा रहा है.  


बैंकिंग क्षेत्र पर भी सरकार को तत्काल ध्यान देने की जरूरत है. इस महीने केंद्र ने चालू वित्त वर्ष के लिए सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में 20,000 करोड़ रु. की पूंजी डालने का फैसला किया. लेकिन, कोटक महिंद्रा बैंक के वाइस प्रेसिडेंट और एमडी उदय कोटक का अनुमान है कि बैंकों को संकट से उबारने के लिए कम से कम 2-3 लाख करोड़ रु. की जरूरत होगी.


इतना बुरा संकट इससे पहले कभी नहीं देखा गया. फिलहाल इसका कोई अंत नजर नहीं आता. शायद साल के अंत तक टीका मिल पाएगा और हो सकता है तब सुधार का मार्ग तैयार हो. इस बीच, उद्यमी लडख़ड़ाते पांव को संभालने और वजूद बचाए रखने की जद्दोजहद में हैं. ऐसे इंडिया टुडे ने व्यवसायों की एक मोटी-मोटी समीक्षा करके यह समझने का प्रयास किया कि आज वे कहां खड़े हैं.

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