प्रधान संपादक की कलम से
देश एक साथ अचनाक दो खतरों से मुकाबिल है—कोविड-19 संकट और चीन से सीमा पर झड़प. देश को कूटनीति, सामरिक और अहम आर्थिक मोर्चे पर कुछ कड़े फैसले करने होंगे

इस अपशकुनी संदेश को अमूमन फ्रांसीसी सम्राट नेपोलियन बोनापार्ट का कहा बताया जाता है कि 'चीन को सोने दो, वह जग गया तो दुनिया हिला देगा.' हो सकता है यह किंवदंती हो मगर आज सच जान पड़ता है. लगता है, आखिरकार दो सदी बाद चीन जग गया है. और तय है कि दुनिया पहले जैसी नहीं दिखेगी. मसलन, चीन के गोश्त बाजार से निकले जानलेवा वायरस ने दुनिया भर में ऐसी उथल-पुथल मचाई, जो द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से नहीं देखी गई, अमेरिका से व्यापार युद्ध, हांगकांग में नागरिक अधिकार प्रदर्शनों पर दमन-चक्र, दक्षिण चीन सागर में झगड़ालू तेवर, ताइवान को फौजी ताकत से धमकाना, और भारत की सीमा पर आक्रामक सैन्य तैनाती से 1962 के युद्ध के बाद सबसे बड़ा खूनी टकराव.
राजीव गांधी ने 1988 में जब ऐतिहासिक बीजिंग यात्रा की थी, तो दोनों देशों की अर्थव्यवस्थाएं मोटे तौर पर एक जैसी थीं. उस दौरे के बाद के वर्षों में कई समझौते हुए, ताकि सीमा विवाद ठंडे रहें और आर्थिक रिश्ते बढ़ें. आज चीन की अर्थव्यवस्था हमसे ढाई गुना बड़ी है और उसका सैन्य खर्च चार गुना अधिक. इन तथ्यों के साथ शी जिनपिंग का आगाज होता है, जो चेयरमैन माओ के बाद चीन के पहले आजीवन राष्ट्रपति हैं.
उन्होंने ऐसी चुनौती का संकेत दिया है, जैसी पहले हमारे सामने कभी नहीं थी. हमारे उत्तरी पड़ोसी की इस साल की वारदातें पहले के सभी शांति-सुलह के समझौतों को लांघ गई हैं और इशारा कर रही हैं कि भारत की 32 साल की चीन नीति बेमानी हो गई है. उसे नए सिरे से तैयार करने की जरूरत है—कूटनीति से लेकर सामरिक रणनीति और अर्थव्यवस्था तक में, ताकि ताकत के जोर से सीमा फिर से खींचने पर उतारू युद्धोन्मादी क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वी से निपटा जा सके.
हमें अपनी फौजी ताकत में इजाफा करना होगा क्योंकि जमीन गंवाना राजनैतिक तौर पर सहन नहीं हो पाएगा. हमें व्यापार में भी चीन पर निर्भरता घटाने और आसियान देशों तथा जापान और ऑस्ट्रेलिया जैसे सहमना लोकतांत्रिक देशों से व्यापारिक रिश्ते बढ़ाने की जरूरत है. हमें अमेरिका से रणनीतिक साझेदारी बढ़ाने की जरूरत है जबकि यह भी ध्यान रखना है कि हमारा दूसरा बड़ा साझीदार रूस दूर न हो जाए. हालांकि ये सभी मामले—सामरिक रणनीति, व्यापार और कूटनीति—मजबूत अर्थव्यवस्था में फबते हैं. मजबूत अर्थव्यवस्था के बगैर हमारी हालत उत्तर कोरिया या पाकिस्तान जैसी हो जाने का खतरा है. भारत को कोविड-19 की वजह से जर्जर अर्थव्यवस्था में जान फूंकने के साथ निवेश आकर्षित करने, दुनिया में अपनी पहुंच बढ़ाने और वैश्विक मूल्य शृंखला में अहम खिलाड़ी बनने की राह पर जोर-शोर से बढ़ना होगा.
भारत एक मुश्किल चौराहे पर खड़ा है. ऐसे में, चीन के साथ हमारा नया बर्ताव कैसा हो और बाकी दुनिया के प्रति हमारे लिए क्या जरूरी है? देश के सामने बहुमुखी चुनौतियों से परदा उठाने के लिए हम इस हफ्ते की आवरण कथा 'कैसे निबटें चीन से?' के लिए प्रमुख विशेषज्ञों के पैनल से रू-ब-रू हुए. पत्रकार तथा लेखक बर्टिल लिंटनर की राय है कि हिमालय में टकराव सिर्फ सीमा को लेकर नहीं, बल्कि दबदबे के खातिर है और यह जरूरी है कि भारत चीन को दो-टूक जवाब दे. वे कहते हैं, ''राष्ट्रपति शी खुद को आधुनिक चीन के इतिहास में तीसरे अहम नेता की तरह देखते हैं.
माओ त्से तुंग ने पुरानी व्यवस्था को नेस्तोनाबूद करके चीन को सामंतवाद और शोषण से मुक्त किया. देंग शियाओपिंग ने आधुनिक अर्थव्यवस्था की बुनियाद रखी. और शी चीन को दुनिया की दबंग महाशक्ति बनाना चाहते हैं.'' विद्वान मिनशिन पेई का मानना है कि चीन ने मौजूदा घुसपैठ से अपने ''पैर में कुल्हाड़ी मार ली है.'' उनकी राय में, उसे अपनी गलती का एहसास हो गया है और भारत की जवाबी आर्थिक कार्रवाई के बाद संयम बरत रहा है. पेई का कहना है कि भारत-चीन रिश्ते में यह अहम मोड़ है लेकिन भारत को मौजूदा भू-राजनैतिक माहौल पक्ष में होने के बावजूद सतर्क रहना चाहिए. चीन के अपने पूर्वी छोर पर रणनीतिक फोकस बढ़ने से भारत को अपने उत्तरी पड़ोसी से पेश सुरक्षा खतरे में कमी में मदद मिलेगी.
पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार शिवशंकर मेनन का मानना है कि गैर-सरहदी क्षेत्र जैसे अर्थव्यवस्था में चीन के असंतुलित रिश्ते पर भारत को शुल्क में इजाफे की जरूरत के अलावा कोई चारा नहीं है. उनकी राय में सबसे अधिक संभावना यही है कि ''न युद्ध-न शांति जैसा माहौल बने, जिसमें दोनों पक्ष सरहद और आर्थिक, दोनों ही मोर्चों पर अपने सुरक्षित पठार पर विरोधी की तरह डटे रहें.''
पूर्व नौसेना प्रमुख एडमिरल अरुण प्रकाश की सलाह है कि नौसैनिक ताकत पर जोर दिया जाए क्योंकि टैंक या लड़ाकू विमान नहीं, बल्कि नौसैनिक ताकत के जरिए हिंद-प्रशांत क्षेत्र में दूर तक पहुंच की क्षमता ही हमें अमेरिका या क्वाड्रिलेटरल और आसियान संधि वाले देशों के लिए आकर्षक साझेदार बनाएगी. सैन्य शक्ति निर्माण के लिए आर्थिक ताकत की जरूरत है. और उसके लिए, नीति आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष, अर्थशास्त्री अरविंद पानगड़िया की सिफारिश है कि भारत को अगर अपनी मझोली और बड़ी कंपनियों को दो अंकों की वृद्धि की ओर ले जाना है और चीन को सबसे बड़ी क्षेत्रीय तथा वैश्विक महाशक्ति बनने से रोकना है तो उसे भूमि, श्रम, पूंजी बाजार और व्यापार नीति में बड़े सुधार करने होंगे. ब्रुकिंग्स इंस्टीट्यूशन की वरिष्ठ फेलो तन्वी मदान कहती हैं कि दिल्ली के हुक्मरानों को थोड़ी कम रक्षात्मक मुद्रा में सोचना चाहिए.
यह सोचने के बदले कि अमेरिकी साझेदारी का मतलब भारत के लिए क्या हो सकता है, यह सवाल करना चाहिए कि इस साझेदारी से भारत को क्या हासिल हो सकता है. सिंगापुर के पूर्व राजनयिक तथा विद्वान किशोर महबूबानी की दलील है कि भारत इतना बड़ा है कि वह भू-राजनैतिक उथल-पुथल वाली दुनिया में स्वतंत्र धुरी और आम समझ मुहैया करा सकता है.
पिछले तीन महीनों में हमने पाया है कि देश एक साथ अचनाक दो खतरों से मुकाबिल है—कोविड-19 संकट और चीन से सीमा पर झड़प.
हमारे विशेषज्ञों के इन लेखों को पढ़कर आपको एहसास होगा कि देश को कूटनीति, सामरिक और सबसे अहम आर्थिक मोर्चे पर कुछ कड़े फैसले करने होंगे. आर्थिक ताकत से ही आपकी कूटनीति में दम आएगा और हमारी सेना की मजबूती के लिए रकम मुहैया हो पाएगी. अब इधर-उधर देखने का वक्त नहीं है. अर्थव्यवस्था बुनियादी सुधार की मांग करती है, ताकि उसकी अकूत क्षमता उजागर हो सके और हमारे लोगों की महान उद्यमशीलता का इजहार हो सके. मुझे उम्मीद है कि सत्ता में बैठे लोग खतरे की घंटी सुन रहे होंगे.