प्रधान संपादक की कलम से
कोविड-19 महामारी का फसाना डर पैदा करता है--संक्रमण का डर, मौत का डर. पढ़िए इंडिया टुडे के प्रधान संपादक अरुण पुरी की कलम से

इन दिनों हम लोगों पर लगातार दुनिया भर और भारत से तमाम तरह के मायूसी भरे आंकड़ों की बारिश हो रही है. कोविड-19 महामारी का फसाना डर पैदा करता है—संक्रमण का डर, मौत का डर. यह कोई बेतुका नहीं है. महामारी पूरी दुनिया में घुमड़ रही है, करीब 75 लाख लोग संक्रमण की चपेट में आ चुके हैं और 4,19,000 जिंदगियां काल के गाल में समा गईं. अब तक इसका कोई इलाज या टीका ईजाद करने की दुनिया भर में कोशिशें परवान नहीं चढ़ पाई हैं.
6 जून को भारत कोविड संक्रमण से ग्रस्त लोगों की संख्या के मामले में स्पेन से आगे निकल गया और दुनिया में सबसे अधिक संक्रमण के पुष्ट मामलों की फेहरिस्त में पांचवें स्थान पर पहुंच गया. हम 70 दिनों के देशव्यापी लॉकडाउन से धीरे-धीरे जैसे बाहर निकल रहे हैं, संक्रमण के मामले भी बढ़ते जा रहे हैं. बड़ी चिंता यह है कि हमारे दो सबसे बड़े महानगर—दिल्ली और मुंबई—संक्रमण के तेज फैलाव के केंद्र बने हुए हैं और दोनों शहरों में अस्पताल नए मामलों से बेकाबू होने का खतरा झेल रहे हैं. इस हफ्ते दिल्ली के मुख्यमंत्री ने वायरस के फैलने का डरावना अनुमान पेश किया. उन्होंने कहा कि जुलाई के अंत तक दिल्ली में ही 5,50,000 मामले हो जाएंगे. मुंबई में हालात इससे भी शायद बदतर होंगे. शायद ज्यादा वक्त नहीं है, जब हम कुल संक्रमण में दुनिया में सबसे ऊपर हों.ï
अभी सामुदायिक फैलाव का भले आधिकारिक ऐलान न हुआ हो, मगर यह साफ है कि हम महामारी से छुटकारा या उस पर काबू पाने से काफी दूर हैं. चिंता की बात यह है कि अर्थव्यवस्था को पूरी तरह ठप होने से बचाने के लिए देशव्यापी लॉकडाउन जब खोला जा रहा है, संक्रमण अभी अपने चरम पर नहीं पहुंचा है. फिलहाल देश में जांच किए हर 100 आदमी में तकरीबन 5 संक्रमण से ग्रस्त हैं. यह दर अमेरिका के 9.4 फीसद से तो कम है लेकिन दक्षिण कोरिया (2.3 फीसद) से दोगुनी है. हालांकि स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं कि संक्रमण की बढ़ोतरी चिंता का विषय नहीं होनी चाहिए, बल्कि जब तक हर्ड इम्यूनिटी या सामूदायिक प्रतिरोध क्षमता विकसित नहीं हो जाती या कोई इलाज या टीका तलाश नहीं लिया जाता, हमें मौत के आंकड़ों को कमतर रखने की कोशिश करनी चाहिए.
हमारे देश में महामारी में गनीमत यही है कि मृत्यु दर कम है. कोविड-19 से 11 जून तक देश में महज 8,102 लोगों की ही मृत्यु हुई है, जबकि इटली में 34,114 लोग मारे जा चुके हैं. भारत में संक्रमण मृत्यु दर महज 2.8 फीसद है जबकि इटली में 7.2 फीसद और वैश्विक औसत 5.8 फीसद है. 11 जून तक 2,86,578 लोग हमारे देश में संक्रमण से ग्रस्त हुए, 1,41,028 ठीक हो गए यानी ठीक होने की दर 49.2 फीसद है. इससे ज्यादा लोग दूसरी आम बीमारियों टीबी, मलेरिया और डायरिया से मौत के शिकार हो जाते हैं.
कोविड-19 के मामलों में भारत में कमतर मृत्यु दर की वजहों की अभी पूरी जानकारी नहीं है, लेकिन कई तरह की अपुष्ट अवधारणाएं चर्चा में हैं. इनमें यह है कि हमारा साबका कई तरह के वायरस से लगातार पड़ता रहा है, जिससे हममें प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो गई है, यह भी कि हमारी बड़ी आबादी में दूसरी बीमारियों के लिए टीकाकरण हुआ है. सबसे विश्वसनीय तो यही है कि हमारी आधी से अधिक आबादी 25 साल से कम उम्र की है. भारत में 2020 में अनुमानित औसत आयु महज 28 साल है जबकि चीन और अमेरिका में 38 साल है. उम्मीद की दूसरी किरण यह है कि पहली दफा ठीक हुए मामलों की तादाद (1,41,028) सक्रिय संक्रमण के मामलों (1,37,448) से अधिक होनी शुरू हो गई है.
इसलिए हमारे देश में कोविड-19 की दास्तान उम्मीद और जीत की है. हमारी आवरण कथा ‘कोविड विजेता’ इसी पहलू पर गौर करती है. यह महामारी पर लगातार 13वीं आवरण कथा है. देश भर में हमारे ब्यूरो ने उन लोगों की कुछ लाजवाब कहानियां जुटाई हैं, जो महामारी के मोर्चे से लौटे हैं. उन सभी का यादगार निजी सफर है क्योंकि इस दौरान वे अपनी आंतरिक शक्ति के दम पर अपने परिवार के सहारे बीमारी, स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी और सामाजिक बहिष्कार से भी जूझते रहे. मसलन, मुंबई के डॉक्टर जब ड्यूटी के दौरान संक्रमण के शिकार हो गए तो उनके परिवार को व्हाट्सऐप पर उत्पीडऩ झेलना पड़ा, कोलकाता की नर्स को वायरस लग गया क्योंकि अस्पताल के पास पर्याप्त पीपीई किट नहीं थे, राजस्थान की उस गृहिणी की दास्तान दिल दहला देने वाली है, जब उन्हें पता चला कि उनका नवजात शिशु भी कोविड पॉजिटिव है.
इन कहानियों में हम सबके लिए सबक है कि हम सतर्क रहें मगर मुगालते में रहने का जोखिम नहीं उठा सकते. जान पर जोखिम के अनुभव से गुजरे महाराष्ट्र के एक कैबिनेट मंत्री कबूल करते हैं कि वे लापरवाह थे. कोविड-19 संक्रमण से ग्रस्त पाए गए एक एनआरआइ तथा टेक स्टार्ट-अप उद्यमी ने हमें बताया, ‘‘संकट हमें बनाता नहीं है, बल्कि बताता है कि हम किस मिट्टी के बने हैं.’’ उनकी ब्रिटेन स्थित फर्म ने कोविड के लक्षणों को जानने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित चैट बॉट लॉन्च किया है और उनका खुद का हैदाराबाद में इलाज चल रहा है. कई कहानियां बीमारी और खस्ताहाल स्वास्थ्य व्यवस्था पर जीत की हैं मगर कुछ त्याग और बलिदान की भी हैं.
महामारी का घेरा बढ़ रहा है, सबसे ज्यादा राय यही है कि हमें इस बीमारी के साए में ही जीना पड़ेगा. जैसा कि 1930 के दशक में महामंदी के दौरान महान अमेरिकी राष्ट्रपति फ्रैंकलिन डी. रूजवेल्ट ने कहा था, ‘‘हमें किसी से नहीं, बल्कि डर से ही डर है.’’ तो, डर को हावी न होने दें. सतर्क रहें. सुरक्षित रहें. इन कहानियों से उम्मीद की प्रेरणा लें.