कृषिः बातों की खेती
कृषि को महत्वाकांक्षी भारत से जोड़ने की बात बहुत अच्छी है, लेकिन इसे सुधारों और जरूरी आवंटनों से समर्थन देने की जरूरत.

बजट 2020 में कृषि को 'महत्वाकांक्षी भारत' से जोड़ कर 'कृषि उड़ान', 'किसान रेल' और 'भारत नेट' जैसी नई अवधारणाएं पेश करते हुए वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने निस्सहाय भारतीय किसानों की नियति को बाजार उदारीकरण की चमकदार धारणा से जोडऩे की कोशिश की है. बजट 2020 में कृषि को पुनर्जीवित करने के लिए पेश 16-सूत्रीय कार्य योजना में किसानों के लिए कुछ अच्छी बातें हैं. 2.83 लाख करोड़ रुपए के आवंटन और अनुबंध खेती, पट्टे पर भूमि देने, पशुधन और विपणन पर नए सिरे से ध्यान केंद्रित करने के साथ मत्स्य पालन, दुग्ध उत्पादन, मुर्गी पालन और पशुधन के लिए सरकारी समर्थन की घोषणा करने वाले बजट का लक्ष्य भारतीय किसानों को प्रतिस्पर्धी बनाना है.
फिर भी, आलोचकों का तर्क है कि किसानों के लिए प्रधानमंत्री किसान अनुदान योजना—2019 मंर प्रत्येक किसान को 6,000 रुपए देने की लोकप्रिय चुनावी घोषणा—को आगे न बढ़ाए जाने से कृषि बजट का खोखलापन स्पष्ट दिखाई देता है.
मनरेगा तथा पीएम-आशा (खरीद और न्यूनतम समर्थन मूल्य की कमियों को दूर करने की व्यापक योजना) में कटौती और उर्वरक सब्सिडी में भारी कमी के बाद पांच साल में कृषि आय को दुगुनी करने का बड़ा वादा पूरा होना मुश्किल लगता है. यही नहीं, कृषि के लिए आवंटन में भले वृद्धि हुई हो, आय और ग्रामीण मजदूरी में गिरावट आई है.
सीतारमण ने राज्य सरकारों के अधिकार-क्षेत्र वाले प्रमुख सुधारों के लिए समर्थन की घोषणा करते हुए कहा, ''हम आदर्श कृषि भूमि पट्टा अधिनियम (2016), आदर्श कृषि उत्पादन और पशुधन विपणन अधिनियम (2017) तथा आदर्श खेती और सेवा (संवर्धन और सुविधाओं का विकास) अधिनियम, 2018 आदि कानूनों को लागू करने वाले राज्यों को प्रोत्साहित करेंगे.''
कृषि सचिव तथा कृषि आय द्विगुणीकरण (डीएफआइ) समिति के अध्यक्ष, अशोक दलवई कहते हैं, ''ये सभी घोषणाएं डीएफआइ रिपोर्ट के अनुसार हैं. किसानों की आमदनी के उपायों को फसलों से आगे ले जाना होगा.
कृषि के सभी चार उप-समूहों—बागवानी, पशुधन, मछली पालन और फसलों—को इसमें शामिल किया गया है.''
लेकिन क्या केवल बाजार सुधार ही किसानों की आय बढ़ाने का जरिया बनेंगे? कृषि विशेषज्ञ देविंदर शर्मा कहते हैं, ऐसा होना असंभव है.
वे कहते हैं, ''बजट से उम्मीद थी कि किसानों के हाथों में और अधिक पैसा आएगा जो बदले में अधिक ग्रामीण मांग पैदा करेगा. अधिक ग्रामीण मांग का अर्थ होगा अधिक खपत जिससे सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि होगी. मंदी से बाहर निकलने का यही सबसे सुनिश्चित तरीका था.''
मनरेगा में कटौती (आलोचक बताते हैं कि 2019 की तुलना में 2020 के बजट में यह 13 प्रतिशत कम है) के बारे में एक पूर्व कृषि सचिव कहते हैं, ''आलोचकों ने गलती से इस वर्ष के बजट अनुमानों की तुलना वित्त वर्ष 2019 के संशोधित अनुमानों से की है.
पिछले छह वर्षों का अनुभव बताता है कि संशोधित अनुमान हमेशा बजट अनुमानों से ज्यादा रहते हैं. काम की मांग रहने पर राजग सरकार ने ग्रामीण गरीबों के लिए मनरेगा और अन्य संबंधित कार्यक्रमों पर खर्च को हमेशा बढ़ाया है.''
इस बीच, जल संकट से निबटने के लिए, जल शक्ति अभियान (जल संरक्षण अभियान) के तहत देश में वर्षा पर आश्रित राज्यों के 100 जल-तनावग्रस्त जिलों पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा (तमिलनाडु, राजस्थान, उत्तर प्रदेश तथा कुछ अन्य राज्यों के 313 ब्लॉकों में स्थिति को 'गंभीर' करार दिया गया है, जबकि 1,186 ब्लॉक 'अति-शोषित' श्रेणी में हैं).
2025 तक कृषि आय को दुगुना करने के महत्वपूर्ण मुद्दे पर भारत कृषक समाज के अध्यक्ष, अजय वीर जाखड़ कहते हैं, ''कृषि को आकांक्षाओं से जोडऩा नया लग सकता है, लेकिन सच्चाई यह है कि आज कृषि किसी की आकांक्षा नहीं है.
सभी किसान गैर-कृषि नौकरियों की आकांक्षा रखते हैं.'' उन्होंने कहा कि आवंटन में भी कोई वास्तविक वृद्धि नहीं हुई है, क्योंकि यह उतना ही बढ़ा है जितनी महंगाई.
वे अन्य विरोधाभासों की ओर इशारा करते हुए कहते हैं कि पीएम-कुसुम का विस्तार किया गया है जबकि सौर पैनलों के लिए उपलब्ध धन को बजट में कम कर दिया गया है.
तो क्या कृषि आय के दुगुना होने की कोई संभावना है? इस पर जाखड़ कहते हैं, ''नहीं, बजटीय आवंटन इन इरादों से मेल नहीं खाते. सच्चाई यह है कि नौकरशाही वित्त मंत्रालय को गुमराह कर रही है...कृषि आय को दुगुना करने के लिए आवश्यक कदम इसमें नहीं हैं.''
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