सुर्खियों के सरताजः संकटमोचन
आखिरकार, आर्थिक मामलों के विभाग में सचिव के रूप में, दास नोटबंदी के मुद्दे पर अपने तत्कालीन बॉस पूर्व वित्त मंत्री अरुण जेटली के बचाव में सार्वजनिक रूप से आकर सफाई दिया करते थे. लेकिन भारतीय अर्थव्यवस्था को बचाए रखना एक अधिक विकट चुनौती साबित हुआ है.

शक्तिकांत दास, 62 वर्ष
गवर्नर, भारतीय रिजर्व बैंक
शक्तिकांत दास ने भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआइ) के 25वें गवर्नर के रूप में तब पदभार संभाला, जब यह केंद्रीय बैंक बहुत गलत कारणों से चर्चा में था. पिछले गवर्नर उर्जित पटेल की केंद्र सरकार के साथ नहीं बन रही थी और आरबीआइ की स्वायत्तता को लेकर उनमें ठन गई थी. दिसंबर, 2018 में पटेल की विदाई के बाद दास को कई ऐसे काम स्पष्ट दिख रहे थे जिन्हें अंजाम तक पहुंचाने की अपेक्षा की जा रही थी. इतना ही नहीं, उन्हें न केवल केंद्र के साथ आरबीआइ के संबंधों को सुधारना था बल्कि उन्हें अर्थव्यवस्था में जान फूंकने के लिए हरसंभव प्रयास भी जल्द से जल्द करने थे.
पहला कार्य उतना मुश्किल नहीं था जितना कि दूसरा. आखिरकार, आर्थिक मामलों के विभाग में सचिव के रूप में, दास नोटबंदी के मुद्दे पर अपने तत्कालीन बॉस पूर्व वित्त मंत्री अरुण जेटली के बचाव में सार्वजनिक रूप से आकर सफाई दिया करते थे. लेकिन भारतीय अर्थव्यवस्था को बचाए रखना एक अधिक विकट चुनौती साबित हुआ है. विकास की गति लडख़ड़ा गई थी, और नोटबंदी तथा खराब तरीके से लागू माल और सेवा कर (जीएसटी) भी अर्थव्यवस्था की जड़ें खोद रहे थे.
ऐसे में कोई आश्चर्यचकित नहीं हुआ कि आरबीआइ की मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) की साल 2019 की लगातार बैठकों में ब्याज दरों में बार-बार कटौती की सिफारिशें होती रहीं और दिसंबर की शुरुआत तक ब्याज दरों में कुल 135 आधार अंकों तक की कमी हो चुकी थी. पर इन कदमों से बहुत मदद नहीं मिली है. 2019-20 की दूसरी तिमाही में अन्य कारकों के साथ खपत में गिरावट की वजह से जीडीपी की वृद्धि दर छह साल के निचले स्तर 4.5 प्रतिशत पर आ गई. बढ़ती महंगाई के बीच अब दास के सामने एक नई चुनौती है. नवंबर, 2019 में खुदरा मुद्रास्फीति तीन साल के उच्च स्तर 5.5 प्रतिशत पर पहुंच गई, जिससे खाद्य कीमतों, विशेष रूप से प्याज की कीमत में वृद्धि हुई है.
एमपीसी ने दिसंबर की शुरुआत में अपनी बैठक में दरों पर यथास्थिति बनाए रखी और वह फिर से ऐसा करती है, तो यह विकास को प्रभावित कर सकता है. दास इस वर्ष भी सरकार के संकटमोचन बने. आरबीआइ के पूर्व गवर्नर बिमल जालान के नेतृत्व वाले पैनल की सिफारिशों के अनुसार, उन्होंने आरबीआइ के पास मौजूद 1.76 लाख करोड़ रुपये सरकार को दिए, जिसमें 2018-19 के लिए 1.23 लाख करोड़ रुपये का अधिशेष भी था. कर्ज में सुधार करने के लिए, दास ने कुछ सरकारी बैंकों को शीघ्र सुधारात्मक कार्रवाई ढांचे से बाहर निकालने का फैसला लिया है. पर गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों की सेहत सुधारने के साथ-साथ सरकारी बैंकों (मार्च 2019 तक लगभग 8 लाख करोड़ रुपये) की गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों के अंबार को खत्म करने के लिए वे जूझते रहेंगे.
सुर्खियों की वजह
उस वक्त आरबीआइ गवर्नर बने जब केंद्र सरकार और आरबीआइ के संबंध बहुत खराब थे
उनके कार्यकाल में आरबीआइ का 1.76 लाख करोड़ सरप्लस सरकार को दे दिया गया, ब्याज दरों में इस साल 135 आधार बिंदु की कटौती की गई.
***