बेबस भारतीयः भीतर का शत्रु

आरएसएस के प्रमुख हमें बता रहे हैं कि कहीं भी कोई लिंचिंग नहीं हो रही है और 'लिंचिंग' पश्चिमी अवधारणा है, मानो भीड़ द्वारा की गई हिंसा की घटनाओं की बाल की खाल निकालकर उसे झूठा साबित कर दिया जाएगा.

मीडिया
मीडिया

त्रासदी और बेहूदगी आज हमारे मीडिया फलक के सूरज और चांद हैं. गांधी की 150वीं जयंती पर, भारत के सबसे अधिक बिकने वाले अंग्रेजी अखबार ने पहले पन्ने पर नेटफ्लिक्स पर उपलब्ध एक रक्तरंजित प्रतिशोध को दर्शाने वाली वॉर फिल्म बार्ड ऑफ ब्लड का एक फुलपेज विज्ञापन छापा. इसने बहुत कम लोगों को हतप्रभ किया. हमारे कुछ शीर्ष शिक्षाविदों, कलाकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, वकीलों, मानवाधिकार और नागरिक स्वतंत्रता कार्यकर्ताओं और वरिष्ठ विपक्षी नेताओं पर सरकार के खिलाफ बोलने की वजह से राजद्रोह के मुकदमे दर्ज किए गए हैं. कई अब भी सलाखों के पीछे हैं और उनकी जमानत याचिका कई बार खारिज हो चुकी है. वहीं हिंसक भीड़ का अंग होने के आरोपों में जेल भेजे गए कई लोगों और रसूखदार नेताओं के करीबी बलात्कारियों को जमानत दे दी गई और शिकायतकर्ताओं को जेल में डाल दिया गया है. 

हम दिन—प्रतिदिन अधिक से अधिक असुरक्षित होते जा रहे हैं क्योंकि संसद में बहुसंख्यक दल होने का आनंद ले रही एक पार्टी इतिहास की प्राचीन तलवार को प्राचीन मिथकों के पत्थर पर बार-बार घिसकर अनुमति दे रही है कि धार तेज हो और देश के भूभागों में कतर-ब्योंत करके देश के लोगों को 'अपने' और 'उनके' लोगों में बांट रही है. 'लोगों को प्रताडि़तों और उनका उत्पीडऩ करने वालों में बांट दिया गया था. मनुष्य के अंदर बसने वाला जंगली जानवर तब तक बाहर आकर उत्पात मचाने की हिम्मत नहीं करता जब तक कि कानून और परंपराओं की बाधाएं बनी रहती हैं. वे अड़चनें दूर हो गईं तो जानवर आजाद हैं... ' यूगोस्लाविया के नोबेल विजेता लेखक इवो एंड्रिक के द ब्रिज ओवर द ड्रिना में करीब आधी सदी पहले लिखे ये शब्द अब भी प्रतिध्वनित होते हैं. 

भारत के सर्वोच्च न्यायालय में भी, मिथक के उसी पत्थर का उपयोग वैसे ही विभाजनकारी हिस्से में किया गया है. एक शिशु देवता (रामलला) के अधिकारों के स्वयंभू हिंदू अभिभावक मुस्लिम समुदाय के उस जमीन पर दावे को चुनौती दे रहे हैं, जहां एक पुरानी मस्जिद 1992 तक खड़ी थी. रामलला के वकील ने कथित तौर पर तर्क दिया कि कोई मस्जिद हमेशा मस्जिद नहीं रहती, लेकिन मंदिर हमेशा मंदिर रहता है. बंगाल राज्य, जहां चुनाव करीब आ रहे हैं, में असम की तर्ज पर एक एनआरसी तैयार करके उन सभी अवांछितों को पहचानने और उन्हें बाहर खदेडऩे की बात की जा रही है जो हिंदू, सिख, पारसी या ईसाई नहीं हैं. हालांकि असम का एनआरसी व्यर्थ रहा लेकिन इसने कई लोगों को आत्महत्या के लिए विवश कर दिया.

हां, हम खुद को खतरे से घिरा महसूस कर रहे हैं क्योंकि हमारे बीच का शिकारी जानवर एक बार फिर बाहर आ गया है. जैसा 1947 के अगस्त में हमारे माता-पिता के साथ हुआ था, उसी तरह आज हम अनजाने में फंस गए हैं और अपने ही लोगों के खिलाफ तैयार युद्ध के मसौदे को लेकर आगे बढ़ रहे हैं. एक मिश्रित समाज और कई भाषाएं और एक उदार संविधान वाला देश, आह, कितना अशक्त हो गया है. बहरहाल, अर्थव्यवस्था मंदी की चपेट में है. इस साल अर्थशास्त्र के लिए नोबेल पुरस्कार जीतने वाले अभिजीत बनर्जी का कहना है कि भारतीय अर्थव्यवस्था अनियंत्रित गिरावट की ओर बढ़ रही है. नोबेल पुरस्कार विजेता अमत्र्य सेन और कई अन्य बुद्धिजीवियों ने अल्पसंख्यकों के अधिकारों को सोची-समझी साजिश के तहत कुचलने, सम्मानित विश्वविद्यालयों का कद कम करने और भीड़ द्वारा सार्वजनिक रूप से हिंसा के विरोध में आवाज उठाई है. लेकिन आरएसएस (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ) के प्रमुख हमें बता रहे हैं कि कहीं भी कोई लिंचिंग नहीं हो रही है और 'लिंचिंग' पश्चिमी अवधारणा है और अगर मीडिया इस बारे में बातें करना बंद कर दे, तो हिंसा भी रुक जाएगी. इसी तरह राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार का कहना है कि अगर मीडिया आतंकवाद की घटनाओं की रिपोर्टिंग बंद कर दे तो आतंकवाद भी बंद हो जाएगा. दोनों बार-बार अवतार पुरुष की वंदना करते हैं और संघ का तो दावा है कि उसने वर्षों की कड़ी मेहनत से भारत के लिए इस महानायक को तैयार किया है. लकदक कपड़ों में सजे और एकदम चुस्त-दुरुस्त दिखते नायक की छवि बिलबोर्ड और टीवी स्क्रीन पर हर जगह मंडराती रहती है. चलिए मान लिया, वे विजेता हैं. उनके नेतृत्व में, उनकी पार्टी ने एक के बाद एक राज्यों में चुनावी मैदान मार लिया, यहां तक कि उन राज्यों में भी जहां उन्होंने चुनावों में मुख्यमंत्री का कोई चेहरा नहीं पेश किया था. लेकिन हम अब भी असुरक्षित क्यों महसूस करते हैं? 

शक्तिशाली नेता को अक्सर राष्ट्र के अभिभावक के रूप में देखा जाता है. इस सिद्धांत के साथ सहूलत यह है कि यह आम जनता को शिशुवत् मान लेता है जिनको बड़े आराम से बड़ों और गायों का सम्मान करने, या स्वच्छता बनाए रखने, या खुले में शौच न करने या प्लास्टिक का उपयोग न करने, या सभी महिलाओं को माताओं या बहनों के रूप में देखने और इसी तरह के दूसरे उपदेश दिए जा सकते हैं—जबकि जमीनी हकीकत यह बताकर इसकी चुगली कर देती है कि हम प्रशासनिक मुद्दों पर लगातार पिछड़ रहे हैं. उदाहरण के लिए, कार्यबल में महिलाओं की भागीदारी कम होती जा रही है, आय में असमानताएं बढ़ रही हैं, बैंक (जहां हजारों लोगों की जीवनभर की बचत है) डूब रहे हैं, मीडिया की स्वतंत्रता कम हो रही है, और महानगरों में कचरे और प्लास्टिक से भरे गटर हर ओर दिखाई देते हैं. 

और मीडिया का क्या? कभी जहां एक स्वतंत्र और निडर रिपोर्टर सार्वजनिक दायरे में सभी खबरें लिखता था, अब वह बहुत हद तक कुछ दर्जनभर कुलीन और वैश्विक मीडिया दिग्गजों के नियंत्रण में है. देशद्रोह और आपराधिक मानहानि मुकदमों का बार-बार भय दिखाकर और मीडिया के संरक्षक निकायों की कमर तोड़कर पत्रकारों के मन में जोखिम उठाने की सहज इच्छा और जुनून का गला घोंट दिया गया है. हमारी मुख्यधारा के मीडिया का बड़ा हिस्सा नेता की हिमालय की यात्रा या हाथ से बनाई गई डोंगी में बैठकर एक पहाड़ी नदी में नौकायन या फिर दक्षिण में समुद्र तट से कूड़ा उठाते दिखाने या फिर चुनाव की पूर्व संध्या पर अत्यधिक टेलीजेनिक सर्जिकल स्ट्राइक को दिखाकर गद्गद है.

टेलीविजन स्टुडियो में, सेना के सेवानिवृत्त जनरल जो संभवत: मुख्य सैन्य कार्रवाई का हिस्सा भी नहीं थे, और सुरक्षाबलों के प्रमुख नागरिकों को बार-बार यह आश्वासन देते हैं कि सरहद पर बिछी कांटेदार बाड़ों के दूसरी तरफ घूमते भेडिय़ों को उनकी औकात में रखा जा रहा है और 'भारत माता' सुरक्षित है. और एक अरेंज मैरिज के पार्टनर की तरह, हमसे इन वैकल्पिक-वस्तुस्थिति विमर्श (ऑल्टरनेटिव रियैलिटी डिबेट्स) में लगातार खुद को 'एडजस्ट' करने की उम्मीद रखी जाती है. डिजिटल मीडिया का इस्तेमाल जनमानस को एक निश्चित दिशा में मोडऩे और अपने झूठ को स्थापित करने के लिए किया जा रहा है ताकि उस झूठ को चुनौती देने वाली पुरानी यादों को या तो मिटा दिया जाए या उनके तथ्यों को तोड़-मरोड़ दिया जाए, उसे देखकर अचंभा होता है. एल्गोरिदम ने यह भांप लिया है कि जनता झुंड की भेड़ों की तरह चलती है इसलिए युवा मन को तेजी से हांककर अपने पसंदीदा बाड़े में पहुंचा दिया जा रहा है. 

फिर बॉलीवुड का छात्र संस्करण भी तो है. चूंकि प्रिंट और डिजिटल न्यूज पोर्टलों को नियंत्रित करने वाले हमारे मल्टी-मीडिया के धुरंधर ही टीवी के मनोरंजन चैनलों और बॉलीवुड को भी नियंत्रित करते हैं, इसलिए यह प्रवासी भारतीयों सहित सभी भारतीयों के लिए तेजी से एक बहुत अच्छे से तैयार किया गया साफ-सुथरा आश्रयस्थल बन रहा है. अभिनेता, नेता के साथ सेल्फी लेते हैं, चुनावों में प्रचार करते हैं, पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ते हैं और नेताओं के बायोपिक्स बनाते हैं. बॉक्स ऑफिस पर उनकी शानदार कमाई को देखते हुए, एक कैबिनेट मंत्री ने हाल ही में पूछा: वह देश गरीब कैसे कहा जा सकता है जहां रिलीज हुई तीन हालिया फिल्में एक सप्ताह में ही करोड़ों की कमाई कर लेती हैं? 

आज भारत में जो कुछ भी हो रहा है वह केवल कश्मीर या बिहार, यूपी या महाराष्ट्र में होने वाला एक सनकभरा प्रदर्शन भर नहीं है, बल्कि लोकतंत्र के ज्ञात राजनैतिक सिद्धांतों और संस्थानों का चरमरा जाना है. शायद हमारे माता-पिता ने लोगों के उसी भय और घृणा को महसूस किया था जिसने लगभग छह शताब्दियों तक साथ-साथ रहने के बाद, 1940 के आसपास लोगों के मन पर यह दावा करते हुए कब्जा जमाना शुरू कर दिया कि उनकी तो भाषा अलग है, उपासना की विधियां अलग हैं. इसके बारे में निडर होकर और खुलकर बात न करने के लिए उन्हें माफ करना मुश्किल होता है.

दूसरी तरफ एक महिला के रूप में, एक हिंदी पत्रकार के रूप में, मैं खुद को मूल ग्रीक परिभाषा की श्रेणी का ईडियट पाती हूं. उस जुबान में ईडियट का मतलब है, वह व्यक्ति जिसकी सूचनाओं तक समान पहुंच नहीं है. वे भारत के इतिहास को अंग्रेजी और हिंदी में अलग-अलग तरीके से बोल रहे हैं, लेकिन दोनों पक्षों में से कोई भी पक्ष उनके बीच की कडिय़ों को जोड़कर हमें पूरी तस्वीर नहीं दे रहा है. दोनों पक्षों के सभी नेता रक्तपात से बचने, किसी को सही और गलत ठहराने से बचने की बात कर रहे हैं. फिर हम अब भी इतना असुरक्षित क्यों महसूस करते हैं? इतना कम प्रेम और दूसरे पक्ष के नजरिए से चीजों को देखने और चर्चा करने की इच्छा खत्म क्यों हो रही है?

मृणाल पांडे लेखिका और प्रख्यात पत्रकार हैं. वे हिंदी दैनिक हिन्दुस्तान की संपादक और प्रसार भारती की अध्यक्ष भी रही हैं.

***

Read more!