बेबस भारतीयः टैक्स आतंक का तमगा कैसे हटे
बड़े पैमाने पर टैक्स चोरी को जब तक शह मिलती रहेगी, टैक्स आतंकवाद का अनचाहा तमगा भी लटका रहेगा.

मोहन गुरुस्वामी
इस वर्ष 2019 के प्यू रिसर्च के मुताबिक, दो-तिहाई भारतीय भ्रष्टाचार को आतंकवाद और अपराध की तरह ही बड़ी समस्या मानते हैं और उसे बेरोजगारी तथा महंगाई के फौरन बाद सबसे अहम मुद्दा बताते हैं. यह आम धारणा और बहस का मसला भी है. जहां भी और जब भी दो लोग देश के मर्ज पर गंभीर बहस करने बैठते हैं, वे सर्वदा भ्रष्टाचार को हमारी राष्ट्रीय दुर्दशा की मुख्य वजह बताने से नहीं चूकते. विडंबना देखिए कि भ्रष्टाचार की धारणा इस कदर घर कर गई है कि हम अब उसे किसी कलंक की तरह देखते हैं. हालांकि भारतीय लोग दूसरे के छिद्रान्वेषण में कुछ ज्यादा ही रुचि लेते हैं.
हम भ्रष्ट नेताओं को चुनाव में जीत दिलाते जाते हैं और संदिग्ध तौर-तरीकों से संपत्ति जमा करने को अब किसी तरह के सामाजिक कलंक की तरह नहीं देखा जाता. दो क्रिकेट कप्तानों दक्षिण अफ्रीका के हेंसी क्रोनिए और हमारे अपने मोहम्मद अजहरुद्दीन के मामले को देखें. क्रोनिए और अजहरुद्दीन दोनों को उनके अपने क्रिकेट बोर्डों ने मैच-फिक्सिंग का दोषी पाया और 2000 में उन पर आजीवन प्रतिबंध लगा दिया गया.
क्रोनिए को दक्षिण अफ्रीका के महानतम खिलाडिय़ों में गिना जाता था लेकिन पुनर्वास की उनकी अपील ठुकरा दी गई. उनकी 2002 में एक विमान दुर्घटना में मौत हो गई. दूसरी ओर, अजहरुद्दीन 2009 में कांग्रेस के सांसद चुने गए, वह भी अपने गृह नगर हैदराबाद से काफी दूर उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद से. अब उन्हें हाल ही में हैदराबाद क्रिकेट एसोसिएशन का अध्यक्ष चुन लिया गया.
चुनाव प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी सरकार की भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम को दोहराते रहे हैं. लोकसभा चुनाव में उनकी एक पसंदीदा दलील यह थी कि ''पिछले पांच साल में मैं उन्हें जेल के दरवाजे तक ले आया, मुझे पांच साल और दीजिए वे जेल के अंदर होंगे.'' लोगों ने उन्हें वह वक्त दिया और कम से कम इस मामले में लोगों को बड़ी उम्मीद है. रोजगार सृजन या आर्थिक वृद्धि के मामलों में खास उपलब्धि न होने से मोदी ने एक बार फिर अपनी सरकार की ''भ्रष्टाचार'' के खिलाफ कार्रवाइयों को ही अपना राजनैतिक एजेंडा बनाया.
लगभग हमेशा यह धुन बजाई जाने लगी कि वे ''लूटे हुए धन की पाई-पाई वापस लाए बिना चैन नहीं लेंगे.'' उन्होंने बढ़ती गैर-बराबरी के खिलाफ आम असंतोष को भी भुनाने की कोशिश की और कहा कि मध्य वर्ग ने अर्थव्यवस्था में भारी योगदान दिया लेकिन ज्यादातर धन भ्रष्ट नेताओं और अफसरशाहों की मदद से थोड़े-से लोगों की जेब में चला गया.
इधर कुछ महीनों से पी. चिदंबरम, शरद पवार, प्रफुल्ल पटेल, रॉबर्ट वाड्रा, अखिलेश यादव जैसे कई हाइ-प्रोफाइल नेताओं के खिलाफ कथित भ्रष्टाचार के आरोप में चर्चित कार्रवाइयां देखने को मिली हैं. उनका बिना नाम लिए मोदी कटाक्ष करते रहे, ''आज वे सभी लोग जवाबदेह ठहराए गए हैं, जिनके खिलाफ कोई कार्रवाई करने की हिम्मत नहीं करता था. आज हम देख रहे हैं कि दिल्ली से पुणे तक भ्रष्ट कार्रवाई झेल रहे हैं.''
लेकिन मोदी की बातों पर तब ज्यादा यकीन होता, जब उनकी सरकार बी.एस. येदियुरप्पा, शिवराज सिंह चौहान, हेमंत बिस्वा सरमा, बेल्लारी के रेड्डी बंधु, रमेश पोखरियाल, एस.वाइ. चौधरी जैसे अपनी पार्टी के नेताओं के खिलाफ भी उतनी ही तेज कार्रवाई करती, जिनके खिलाफ ऐसे या और भी गंभीर आरोप हैं. राफेल सौदे में भी, अचानक कीमत में भारी वृद्धि और उसमें अनिल अंबानी की विवादास्पद मौजूदगी से बड़े पैमाने पर लेनदेन का संदेह है. लेकिन मोदी सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा और सुप्रीम कोर्ट के एक सीमित आदेश की आड़ में किसी तरह की जांच को ठेंगा दिखा दिया.
भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम में मोदी सरकार की विश्वसनीयता चाहे जो हो और चाहे जैसी चुनिंदा कार्रवाइयां हों, जांच के दायरे में आए लोगों से किसी तरह की सहानुभूति रखना मुश्किल है. चोरी या लूट या धोखाधड़ी करने वालों से कोई सहानुभूति नहीं होनी चाहिए. और इससे भी इनकार नहीं किया जा सकता कि भ्रष्टाचार तो आम है. ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल और कम्युनिटी सोशल मीडिया नेटवर्क लोकलसर्किल्स के 2018 के एक सर्वे के मुताबिक, 54 प्रतिशत भारतीयों ने माना कि उन्होंने पिछले एक साल में प्रत्यक्ष या परोक्ष तरीके से सार्वजनिक सेवाओं के लिए रिश्वत दी है. उसके पिछले साल यह आंकड़ा 45 प्रतिशत था, लेकिन इस बढ़ोतरी से भी चिंताजनक बात यह है कि करीब एक तिहाई लोगों का मानना है कि सरकार में कोई काम कराने के लिए घूस देना एकमात्र तरीका है.
हाल के दिनों में उद्योग जगत के लोग तथाकथित 'टैक्स आतंकवाद' के खिलाफ आवाज उठाते रहे हैं, इसका मतलब सरकार को देय रकम को जुटाने के लिए टैक्स अधिकारियों की तेज मुहिम से है. कई सर्वे के मुताबिक, कर चोरी भी बेहद आम है. मसलन, यह माना जाता है कि 50 लाख रु. से 5 करोड़ रु. तक की आमदनी वाले 10 लोगों में से केवल एक ही असल में टैक्स रिटर्न दाखिल करता है. यह बेशक कर चोरी का साफ-साफ मामला है, लेकिन आमदनी कम दिखाने के मामले इससे भी ज्यादा हैं. सरकार पूंजीगत खर्च में इजाफा करने में असमर्थ है, जिसका सीधा असर रोजगार सृजन पर होता है. और वह टैक्स और जीडीपी का अनुपात बढ़ाने में भी असमर्थ है. इसलिए इस मोर्चे पर अधिक तेजी समझ में आती है. लेकिन क्या यह 'टैक्स आतंकवाद' है?
सरकार अपनी देय राशि को जुटाने के लिए सख्त तरीके अपना रही है. इसलिए आश्चर्य नहीं कि कई लोगों को ऐसा लगता है कि सरकार कुछ ज्यादा ही सख्ती दिखा रही है. अक्सर टैक्स आतंकवाद के लिए कॉफी डे के संस्थापक वी.जी. सिद्धार्थ की आत्महत्या का उदाहरण दिया जाता है. हो सकता है कि लोग सरकार को देय राशि अपने पास रखने के आदी हो गए हों और अक्सर बड़े पैमाने पर कर वंचना करके बच जाते हैं. इसलिए कर अधिकारियों की मौजूदा तेजी को टैक्स आतंकवाद के रूप में देखा जाने लगा है.
लेकिन यह टैक्स आतंकवाद की गलत व्याख्या है. जो दरअसल कर वंचना के लिए अधिक से अधिक दरों पर उगाही के तौर-तरीके को जाहिर करता है. आयकर और जीएसटी के अधिकारी अब लगातार ऐसे नोटिस जारी करने लगे हैं कि संबंधित व्यक्ति संबंधित दफ्तरों में पहुंचे या फिर जुर्माना भरें. लगता है कि ऐसे नोटिस लाखों नहीं तो हजारों में तो जरूर गए हैं. बैंक खाते अब पैन और आधार नंबरों से जुड़ गए हैं, तो अधिकांश आयकर रिटर्न की जांच कंप्यूटर से होनी चाहिए और अधिकारियों के हाथ से विवेकाधिकार खत्म किया जाना चाहिए. दरअसल, कर अधिकारियों को कर वंचना पर फोकस करना चाहिए, जो हमेशा सीधे-सीधे वंचना नहीं होती हैं, बशर्ते हम सर्वे पर यकीन करें. इसके अधिकारियों को कुछ अधिक काम करना पड़ेगा.
इसके बावजूद क्या कर अधिकारियों की कार्रवाई को 'टैक्स आतंकवाद' कहा जा सकता है? जब कर वंचना आम है तो कर अधिकारियों की कार्रवाई में भी तेजी आना तय है. लेकिन जब ऐसी कार्रवाई में पक्षपात दिखता है तो टैक्स आतंकवाद का तमगा चस्पां होने लगता है. दुर्भाग्य से, मोदी सरकार भ्रष्टाचारियों के खिलाफ कार्रवाई की अपनी मुहिम में पक्षपात और भेदभाव के बिना कोशिश की कोई विश्वसनीय मिसाल नहीं कायम कर पाई है.
राजनैतिक पार्टियों की फंडिंग का सबसे बड़ा या शायद एकमात्र स्रोत बड़े उद्योगपतियों, छोटे कारोबारियों और छोटे ठेकेदारों से उगाही है, जो इसके बदले में फायदे या रसूख हासिल करते हैं. बड़े कारोबारियों या नवधनाढ्य वर्ग के बड़े तबके की संपत्ति में इजाफा सरकार से प्राप्त लाभ के जरिए हुआ है, जिसके नियंत्रण में वह सब कुछ है, जिससे कारोबार बढ़ता है. टेलीकॉम से लेकर तेल, कोयला, स्टील, इन्फ्रास्ट्रक्चर परियोजनाएं और एयरलाइन सभी की कामयाबी में सरकार की भूमिका अहम है. इसी वजह से पैसा नेताओं और जनमत तैयार करने वालों की जेब में पहुंचता है.
स्वतंत्र थिंक टैंक सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज (सीएमएस) की 'चुनाव खर्च: 2019 चुनाव' शीर्षक रिपोर्ट के मुताबिक राजनैतिक पार्टियों ने 2019 के लोकसभा चुनाव में 55,000-60,000 करोड़ रु. खर्च किए. यह पिछले 2014 के लोकसभा चुनाव में खर्च किए गए अनुमानित 30,000 करोड़ रु. से दोगुनी राशि बैठती है. इसका मतलब यह हुआ कि 2019 में हर एक वोट के लिए 700 रु. खर्च हुए. 2019 में खर्च हुई कुल रकम में भाजपा ने करीब 45 प्रतिशत खर्च किया, जबकि 1998 में खर्च में उसका हिस्सा महज 20 प्रतिशत था. दूसरी ओर कांग्रेस ने सत्ता में रहते 2009 के चुनाव में कुल चुनावी खर्च का 40 प्रतिशत खर्च किया था जबकि 2019 में उसका खर्च करीब 15-20 प्रतिशत बैठता है.
यह पैसा तो कहीं से आ रहा है और उसकी वजहें भी अच्छी-खासी हैं. राजनीति के लिए पैसा मां के दूध की तरह है. इस तरह टैक्स आतंकवाद भी इस प्रवाह को किसी और के पक्ष में करने और दूसरों से दूर ले जाने का औजार है. लेकिन, जब तक कर चोरी बड़े पैमाने पर होती रहेगी और कर चोरी की भावना बनी रहेगी तब तक टैक्स आतंकवाद की अनचाही धारणा भी कायम रहेगी.
मोहन गुरुस्वामी सेंटर फॉर पॉलिसी अल्टरनेटिव के चेयरमैन और संस्थापक हैं.
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