बेबस भारतीयः वोट पूरा, हक आधा
इस अंतहीन भेदभाव और अन्याय से मुक्ति का मार्ग हमारे राजनैतिक तंत्र और संस्थानों से नहीं निकलेगा, बल्कि अधिक उदार सभ्य समाज से इसका समाधान आएगा.

मार्टिन मैकवान
अप्रैल, 2018 में अनुसूचित जाति-जनजाति (उत्पीड़न निवारण) अधिनियम, 1989 के कुछ प्रावधानों को कमजोर करने वाले सुप्रीम कोर्ट के आदेश का विरोध करने के लिए सड़कों पर उतरे एक दर्जन से अधिक दलितों ने अपनी जान गंवाई. अदालत ने इस धारणा की पुष्टि के लिए कोई शोधपूर्ण विश्वसनीय आंकड़ा न होने के बावजूद अपने अवलोकन में, 'निहित स्वार्थों' द्वारा अधिनियम के 'दुरुपयोग' का उल्लेख किया था. इस तरह 20 मार्च, 2018 के आदेश में इस दुरुपयोग को रोकने के लिए कानून के उस प्रावधान पर प्रतिबंध लगा दिया गया, जो शिकायत पर गिरफ्तारी और आरोपी के लिए अग्रिम जमानत की अनुमति देता है.
दलितों के लिए, यह बड़ा झटका था. उन्होंने देश की सर्वोच्च अदालत से इसकी उम्मीद नहीं की थी, खासकर तब, जब उन्होंने कभी भी अपने मार्गदर्शक डॉ. बी.आर. आंबेडकर के बताए गैर-हिंसक और संवैधानिक तरीकों पर चलते हुए प्रतिरोध का मार्ग कभी नहीं छोड़ा था. इस साल अक्तूबर की शुरुआत में, सुप्रीम कोर्ट ने मार्च 2018 के आदेश को वापस ले लिया और पहले के निर्देशों को हटा दिया लेकिन दलितों और आदिवासियों ने इस महत्वपूर्ण मील के पत्थर का जश्न अपनी जीत के रूप में कभी नहीं मनाया. पहले की अदालती कार्रवाई के घाव गहरे थे और उसके निशान शेष रह गए हैं, जिससे न्यायपालिका पर उसी तरह का विश्वास एक बार फिर स्थापित होना मुश्किल हो गया है.
दलितों के लिए, ऐसे मोड़ कोई नए नहीं हैं. अपने बुनियादी मानव अधिकारों को सुरक्षित करने की अपनी कठिन यात्रा में वे ऐसी परिस्थितियों का कई बार सामना कर चुके हैं. 'अछूत' जाति का बताकर प्रगति के हक से वंचित कर दिए जाने से लेकर समान नागरिक घोषित किए जाने की इस दुष्कर यात्रा में उन्होंने ऐसी न जाने कितनी अड़चनें देखी हैं, हालांकि समान नागरिक की बात अब भी सिर्फ कागजों पर ही ज्यादा है, उनके दुश्मन ज्यादा ताकतवर रहे हैं.
औपनिवेशिक शासन के दौरान, उन्होंने बड़े पैमाने पर समाज के अलावा भेदभावपूर्ण कानूनों की लड़ाई लड़ी. उन्हें जीवन के सभी क्षेत्रों में पूर्वाग्रह का सामना करना पड़ा, फिर धर्म कैसे अछूता रह सकता था, और यहां तक कि कथित पवित्र शास्त्रों में भी वही भेदभाव रहा. उनके पास तो अपनी रक्षा के लिए अत्यंत साधारण रक्षा-कवच, जिसमें शिक्षा, आरक्षण, यहां तक कि गुलामी के लिए मनाही—में से सबसे शक्तिशाली कवच उन्हें संविधान से मिले कानूनी उपकरण थे. लेकिन बड़ी मुश्किल से हासिल वे संवैधानिक गारंटियां भी अब खतरे में हैं. अपनी इस लंबी यात्रा में एक नए मोड़ पर पहुंचकर दलितों को पता चलता है कि उनका अंतिम हथियार, कानूनी सुरक्षा भी खतरे में है.
राजनैतिक मोर्चे पर देखें तो किसी दलित पार्टी, जैसे कि रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया, के साथ डंके की चोट पर खड़े होने के बजाए उन्होंने मुख्यधारा की पार्टियों के साथ जाना बेहतर समझा. आंबेडकर को भगवान की तरह पूजने के बावजूद, वे अलग-थलग पड़ने का जोखिम नहीं उठाना चाहते थे इसलिए मुख्यधारा की राजनैतिक पार्टियों के साथ गए. लेकिन अब राजनैतिक एकीकरण की इस रणनीति को लेकर गंभीर चिंताएं उभरी हैं.
भले ही एनडीए ने 2014 के लोकसभा चुनाव में सबसे अधिक एससी/ एसटी की आरक्षित सीटें जीतीं, जिससे उसे बढ़त मिली लेकिन सरकार के आंकड़े ही बताते हैं कि दलितों और आदिवासियों पर अत्याचार उसके पहले कार्यकाल के दौरान बढ़ा है (देखें: मार्टिन मैकवान द्वारा संपादित भेद-भारत, दलित शक्ति प्रकाशन, 2019). जो बात सबसे ज्यादा परेशान करने वाली है, वह है जातिगत हिंसा से दृढ़ता से निपटने के लिए एक राजनैतिक इच्छाशक्ति की कमी. सीवर लाइनों की हाथों से सफाई करते हुए सफाईकर्मियों के मर जाने को 'अत्याचार' नहीं माना जाता. यह दलित वोटों के अवमूल्यन की ओर इशारा करता है, जो किसी भी राजनैतिक दल के लिए उल्लेखनीय रूप से कभी भी अछूत नहीं था.
दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत के लिए अस्पृश्यता का दाग बेहद शर्मनाक है या होना चाहिए, जो अब विश्व की प्रमुख अर्थव्यवस्था बनने का प्रयास कर रहा है. भारत की अर्थव्यवस्था और देश के विकास को महान स्तर तक लेकर जाने के संकल्प का दम भरने वाली वर्तमान सरकार भी, अपने पूर्ववर्तियों के नक्शेकदम पर चलते हुए, इस वास्तविकता से दूर दिखाई देती है कि भारत खुद को अस्पृश्यता से मुक्त करने में विफल रहा है.
यह ऐसी सामाजिक बुराई है, जिसकी दलितों पर अत्याचार की जड़ें बहुत गहरी हैं. यह स्थिति 'विकास' के मायने पर गंभीर प्रश्न उठाती है. आजादी के बाद, भारत ने अस्पृश्यता के खिलाफ वैसा उत्साहपूर्ण सामाजिक आंदोलन नहीं देखा जैसा आजादी से पहले देखा गया था. इसके विपरीत, सरकार आज इन मुद्दों को उठाने वाले उन स्वैच्छिक संगठनों को डराती है जो अस्पृश्यता के उन्मूलन, सिर पर मैला ढोने की प्रथा खत्म करने, दलितों और आदिवासियों के खिलाफ हिंसा जैसी चिंताओं पर सरकार से संवैधानिक रूप से निर्धारित कार्रवाई की मांग करते हैं.
जून 2016 में कांस्टेबल वीर सिंह के तिरंगे में लिपटे शव के दाह संस्कार को लेकर कड़वाहट को देखना बहुत परेशान करने वाला था. उत्तर प्रदेश के फिरोजाबाद जिले के नगला केवाल गांव के दलित नट समुदाय से ताल्लुक रखने वाले सिंह, पंपोर (जम्मू-कश्मीर) में हुए एक आतंकवादी हमले में शहीद आठ सीआरपीएफ जवानों में से एक थे. सार्वजनिक भूमि पर उनके मृत शरीर के दाह संस्कार की अनुमति देने के लिए सिंह के गांव के शक्तिशाली सवर्णों को मनाने के लिए जिला अधिकारियों को बहुत मशक्कत करनी पड़ी. यह कहानी भी कोई अपवाद नहीं है—सशस्त्र बल के दलित जवानों के परिवारों के खिलाफ उनके अपने ही गांवों में जातिगत उत्पीडऩ की बात कोई नई नहीं है, हालांकि वे शायद ही कभी खबरें बनती हैं.
इससे किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए. आखिर कितने लोगों को यह बात याद है कि कर्नाटक में सत्तारूढ़ भाजपा के एक दलित सांसद को अपने ही निर्वाचन क्षेत्र के एक गांव में पिछले सितंबर में घुसने की अनुमति नहीं दी गई थी? क्या यह राष्ट्रीय स्तर पर हंगामे की वजह बना? क्या यह विरोध का पर्याप्त कारण नहीं था? हालांकि इस पर परदा डालते हुए यह दिखाया गया कि सांसद को सम्मान देने के लिए ग्रामीणों ने सांसद को गांव के बाहर बैठने के लिए एक कुर्सी भेजी थी.
यही नहीं, उन्होंने गर्व के साथ कहा कि वे भेदभाव में कोई भेदभाव नहीं बरतते और उन्होंने सांसद की तरह ही स्थानीय दलित विधायक को भी गांव में प्रवेश की अनुमति नहीं दी थी. यह सब पुलिस की मौजूदगी में हुआ. और सरकार/सरकारें एक मौन चुप्पी साधें रखती हैं. इससे भी बदतर बात तो यह है कि संसद के 88 दलित सदस्यों ने भी इस विषय पर चुप्पी साधे रखी. सांसद स्वयं ही इस घटना के माध्यम से अपने महिमामंडन की कोशिशें करते दिखे और बताया कि उन्होंने स्वयं पुलिस को बल प्रयोग से रोका था क्योंकि वह लोगों की अंतरात्मा को झकझोर कर उनके हृदय परिवर्तन की एक कोशिश करना चाहते थे.
उनकी प्रतिक्रिया इस बात की एक मौन स्वीकृति है कि सामाजिक न्याय के साधन—कानून, वोट (16.5 प्रतिशत, इससे कम नहीं) और दलितों के लिए राजनैतिक-शैक्षणिक आरक्षण वगैरह—अपनी धार खो चुके हैं. यह दिन के उजाले जैसा स्पष्ट प्रतीत होता है कि दलितों को समानता के लिए अपने संघर्ष की रणनीति फिर से तैयार करनी होगी.
संकट और गहरा है क्योंकि दलित आपस में जाति भेद को खत्म करने में बुरी तरह असफल रहे हैं. गुजरात स्थित जमीनी स्तर पर सक्रिय दलित संगठन नवसर्जन ट्रस्ट (लेखक जिसके संस्थापक हैं) द्वारा 2016 में किया गया, अपनी तरह का एक पहला अध्ययन 'अंडरस्टैंडिंग अनटचैब्लिटी (छुआछूत को समझना)', इस तथ्य की पुष्टि करता है कि जैसा जाति आधारित भेदभाव दलितों और गैर-दलितों के बीच दिखता है, ठीक वैसा ही भेदभाव विभिन्न दलित उप-जातियों के बीच भी मौजूद है.
जाहिर है कि खुद दलित ही जातिगत भेदभाव खत्म करने के आंबेडकर के आह्वान से भटक गए हैं. हालांकि छुटभैए नेताओं ने 1932 के पूना समझौते को लेकर गांधी और आंबेडकर के बीच के टकराव का हवाला देते हुए युवा दलितों के दिमाग में गांधी के खिलाफ बहुत जहर भरा है लेकिन तथ्य तो यह है कि इन दोनों महान विचारकों का एक जैसा यह मानना था कि नैतिक बल में कानूनी ताकत या ओहदे की ताकत से कहीं अधिक आकर्षण बल होता है. दोनों ही अपनी-अपनी तरह से इसका हल तलाश रहे थे.
यह बहुत शर्म की बात है कि एक राष्ट्र के रूप में, हमारे पास युद्धक विमानों पर खर्च करने के लिए भरपूर पैसे हैं जो अंतत: किसी को जीतने में मदद नहीं करेंगे, लेकिन हमारे पास कुपोषण के दंश जैसे निरंतर हमले को रोकने या आदिवासी माताओं और बच्चों जैसे सबसे कमजोरों की रक्षा को लक्षित कोई ठोस कार्यक्रम नहीं है. हम इस भ्रम को बनाए रखते हैं कि भेदभाव और अन्याय की समस्याओं का समाधान हमारे राजनैतिक संस्थानों से ही निकलेगा. इस पहेली पर फिर से विचार करने और एक मजबूत नागरिक समाज के मूल्य को समझने का वक्त आ गया है. विडंबना है कि खुद को संगठित करने के आंबेडकर के आह्वान को अमीरों ने समझ लिया और संगठित होने लगे लेकिन जिन दलितों और आदिवासियों, गरीबों और वंचितों के लिए उन्होंने यह आह्वान किया था, वे ही आंबेडकर की बात को नजरअंदाज कर रहे हैं.
मार्टिन मैकवान गुजरात स्थित दलित अधिकार कार्यकर्ता हैं. ह्यूमन राइट वॉच ने 2000 में उन्हें 'उत्कृष्ट मानवाधिकार रक्षक' के रूप में सम्मानित किया था.
***