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सोसाइटीज रजिस्ट्रेशन ऐक्ट 1867 के तहत पंजीकृत आइआइएमसी सोसाइटी इस संस्थान का संचालन करती है. 17 अगस्त, 1965 को उदघाटन होने के बाद संस्थान ने यूनेस्को के दो सलाहकारों समेत बहुत सीमित कर्मचारियों के साथ काम शुरू किया था.

कैमरा और करियर आइआइएमसी दिल्ली के स्टुडेंट महानिदेशक के. गणेशन के साथ
कैमरा और करियर आइआइएमसी दिल्ली के स्टुडेंट महानिदेशक के. गणेशन के साथ

इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मास कम्युनिकेशन (आइआइएमसी) से एडवर्टाइजिंग ऐंड पब्लिक रिलेशंस (ऐड ऐंड पीआर) में नौ महीने का कोर्स पूरा कर चुके विजय शील नायकर को अभी डिप्लोमा मिलना बाकी है लेकिन उन्हें पहले ही आयुष मंत्रालय से नौकरी का प्रस्ताव मिल चुका है. हालांकि नायकर इंडिया टुडे समूह में काम करना चाहते हैं लेकिन उनके बैच के सभी छात्रों को जब तक कहीं नौकरी नहीं मिल जाती है, वे किसी दूसरी कंपनी में आवेदन नहीं कर सकते. आइआइएमसी, दिल्ली के अब तक 85 प्रतिशत छात्र कहीं न कहीं नौकरी पा चुके हैं.

छात्रों को संस्थान की ओर से इसी तरह का सहयोग मिलता है. मीडिया में जाने को इच्छुक छात्रों के लिए यह सबसे पसंदीदा संस्थान है. नायकर वैसे तो एडवर्टाइजिंग के छात्र रहे हैं लेकिन वे किसी समाचार समूह में भी नौकरी पाने की उम्मीद कर सकते हैं क्योंकि यहां छात्रों को मीडिया से संबंधित सभी विषयों की ट्रेनिंग दी जाती है. कम्युनिकेशन रिसर्च विभाग की प्रमुख और डीन (एकेडेमिक्स) और अध्यक्ष गीता बामज़ई कहती हैं, ''हमारे छात्रों को मीडिया के सभी प्लेटफॉर्म—प्रिंट रेडियो, टीवी और डिजिटल—पर काम करने के काबिल बनाया जाता है. उन्हें जन संचार के सभी क्षेत्रों में काम करने का प्रशिक्षण दिया जाता है.'' पिछले साल आइआइएमसी से कोर्स कर चुके छात्रों को औसतन सालाना 13 लाख रु. के पैकेज का प्रस्ताव मिला था.

बहरहाल, आइआइएमसी में कोर्स की अवधि जल्दी ही बदल सकती है क्योंकि मानव संसाधन मंत्रालय आइआइएमसी को एक डीम्ड यूनिवर्सिटी घोषित करने का आशय पत्र जारी कर चुका है. जब यह संस्थान विश्वविद्यालय का दर्जा पा जाएगा तो यह डिप्लोमा की जगह डिग्री की उपाधि देगा. इस समय आइआइएमसी सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के तहत काम करता है.

सोसाइटीज रजिस्ट्रेशन ऐक्ट 1867 के तहत पंजीकृत आइआइएमसी सोसाइटी इस संस्थान का संचालन करती है. 17 अगस्त, 1965 को उदघाटन होने के बाद संस्थान ने यूनेस्को के दो सलाहकारों समेत बहुत सीमित कर्मचारियों के साथ काम शुरू किया था. शुरू के वर्षों में संस्थान केंद्रीय सूचना सेवा के अधिकारियों को प्रशिक्षण देने का काम करता था. इसके अलावा यह छोटे स्तर पर शोधपूर्ण अध्ययन कराता था.

1969 में इसने अफ्रीकी-एशियाई देशों के मध्यम स्तर के पत्रकारों के लिए अंतरराष्ट्रीय प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू किया. इसके बाद इसने अल्प अवधि के कई विशेष कोर्स शुरू किए. ये कोर्स एक सप्ताह से लेकर तीन महीने तक के होते थे जिनका उद्देश्य सरकारी और सार्वजनिक क्षेत्र में संचार से जुड़े कर्मचारियों को प्रशिक्षण देना होता था. आइआइएमसी अब ऐड ऐंड पीआर के साथ ही विभिन्न भाषाओं में प्रिंट, रेडियो और टीवी पत्रकारिता में पोस्टग्रेजुएट डिप्लोमा देता है.

समय बीतने के साथ आइआइएमसी ने संचार से संबंधित अध्यापन, प्रशिक्षण और रिसर्च के क्षेत्र में उत्कृष्टता के केंद्र के तौर पर विशेष प्रतिष्ठा प्राप्त कर ली है. इसने अपने बुनियादी ढांचे का विस्तार किया है—अब दिल्ली, ढेंकानाल, आइजोल, कोट्टायम, अमरावती और जम्मू में इसके छह सेंटर हैं. इसने अकादमिक गतिविधियों को भी बढ़ाया है जिसमें तेजी से फैलते मीडिया और संचार उद्योग को ध्यान में रखकर कई तरह के विशिष्ट कोर्स भी शामिल हैं.

यहां सिलेबस की सालाना समीक्षा होती है ताकि वे समसामयिक बने रहें. न्यू मीडिया विभाग की अध्यक्ष अनुभूति यादव कहती हैं, ''हमारा जोर इस बात पर होता है कि इस क्षेत्र के विशेषज्ञों को अध्यापन के लिए नियुक्त किया जाए. उदाहरण के लिए ऐड ऐंड पीआर विभाग में 70 प्रतिशत ट्रेनिंग उद्योग के विशेषज्ञ देते हैं.

संस्थान में पढ़ाई के साथ ही कड़ी मेहनत कराई जाती है और छात्रों को मीडिया से संबंधित क्षेत्रों में भी ले जाया जाता है ताकि उन्हें व्यावहारिक जानकारी भी मिल सके.

यादव के मुताबिक, ''यही बात इस संस्थान को बाकी संस्थानों से अलग बनाती है. उदाहरण के लिए इस साल छात्रों ने रेल मंत्रालय और फेसबुक के लाइव कैंपेन में हिस्सा लिया.'' 2018 में आइआइएमसी के एक छात्र ने फील्डवर्क में औसतन 200 घंटे बिताए थे.

आइआइएमसी ने अब क्षेत्रीय भाषाओं में भी पत्रकारिता पर जोर देना शुरू किया है. ज्यादातर डिजिटल प्लेटफॉर्म अंग्रेजी भाषा तक सीमित होते हैं लेकिन आगे अब क्षेत्रीय भाषाओं में भी इसकी काफी संभावनाएं देखी जा रही हैं.

इसीलिए इस संस्थान ने अभी से इस मामले में बढ़त हासिल कर ली है. बामज़ई के मुताबिक, ''अंग्रेजी और हिंदी के अलावा हम ओडिय़ा, मलयालम, मराठी और उर्दू में भी कोर्स करा रहे हैं.'' संस्थान ने संस्कृत में पत्रकारिता के लिए श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विद्यापीठ से भी अनुंबंध कर लिया है.

भारतीय संप्रेषण सिद्धांतों पर इसने हाल ही में नया कोर्स शुरू किया है जिसमें भरत मुनि का नाट्य शास्त्र भी शामिल है. इसका उद्देश्य छात्रों को भारत के प्राचीन अतीत, सामयिक इतिहास और लोकतंत्र में उसके परिवर्तित होने से परिचित कराना है. सूचना-प्रौद्योगिकी की क्रांति ने न केवल पत्रकारिता के क्षेत्र को व्यापक बनाया है बल्कि इसके ढांचे को भी बदला है.

वीडियो और सोशल मीडिया ने अगर पत्रकारिता की संभावनाओं को बढ़ाया है तो फर्जी खबरों के खतरे को भी जन्म दिया है. एक प्रतिष्ठित मीडिया संस्थान के रूप में आइआइएमसी को इस का एहसास है.

इसीलिए उसने कई कार्यशालाएं आयोजित की हैं जहां यह सिखाया गया है कि फर्जी खबरों के बढ़ते खतरे से कैसे निपटा जाए. बामज़ई कहती हैं, ''हमारे यहां प्रशिक्षण का उद्देश्य यह भी होता है कि छात्रों में जिम्मेदारी की भावना पैदा की जाए ताकि वे एक बहुभाषी, बहु-धार्मिक और बहु-सांस्कृतिक समाज में किस तरह रचनात्मक भूमिका निभा सकते हैं. इसी से आइआइएमसी के छात्र दूसरे संस्थानों के छात्रों से अलग होते हैं.'' इस तरह की सोच आइआइएमसी को उसके दर्शन के अनुरूप बनाती है जिसका उद्देश्य है कि समाज में बदलाव और विकास लाने के लिए संचार किस तरह माध्यम बन सकता है.

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