आवरण कथाः डाटा की बादशाहत
बोस्टन यूनिवर्सिटी से अर्थशास्त्र में मास्टर्स की डिग्री लेने के बाद मुखर्या ने हार्वर्ड और एमआइटी में बतौर रिसर्च एसोसिएट और फिर बाद में सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च में काम किया.

नौजवान और खासी पढ़ी-लिखी प्रेरणा मुखर्या ने काफी समय हिंदुस्तान के कई गांवों की खाक छानते और उनका सर्वे करती बिताती हैं. वे और उनकी टीम सवालों की लंबी फेहरिस्त लिए बड़ी मेहनत से दिन-दिन भर जानकारियां इकट्ठा करती हैं. इनमें किसी योजना या उत्पाद की खूबियों और असर की थाह लेने वाले सवाल होते हैं. बाद में इसी डाटा की छानबीन और विश्लेषण करके गहरी बातें पता लगाई जाती हैं कि हिंदुस्तान के गांव-देहातों में आखिर क्या कारगर होता है.
अपने विचार और मकसद को लेकर बिल्कुल साफ मुखर्या बेबाकी से कहती हैं, ''असरदार सामाजिक योजनाएं बनाने के लिए उम्दा डाटा की दरकार होती है. रिसर्च हमेशा आंकड़े ही नहीं है. आपको गुणात्मक रिसर्च की जरूरत होती है. मिसाल के लिए, अगर आप गांव में पानी का इंतजाम कर रहे हैं, तो आपको यह समझने की जरूरत होती है कि वह कौन-सी जगह होगी जहां से विभिन्न जातियों और मजहबों के लोगों को पानी मिल सकेगा. यह वह गुणात्मक रिसर्च है जो हम कर रहे हैं."
उनका काम उस एहसास से निकला जो उन्हें देश लौटने पर हुआ और वह यह था विकास के क्षेत्र में उम्दा डाटा का अभाव है. इसी से प्रेरित होकर उन्होंने एक संगठन बनाया जो विकास के क्षेत्र में जानकारियों को मानवीय रूप देता है. उन्होंने अपनी 26वीं सालगिरह पर डोमेन नाम खरीदा और अपने इस पहले और अब कामयाब सोशल बिजनेस में बचत के 1 लाख रुपए से कुछ ज्यादा की रकम लगा दी.
आउटलाइन इंडिया 24 राज्यों के 3,000 गांवों का दौरा कर चुका है. इसके ग्राहकों में हिंदुस्तान, अमेरिका और ब्रिटेन के थिंक-टैंक और गैर-मुनाफाई संगठन शामिल हैं. मुखर्या कहती हैं, पांच साल के भीतर आउटलाइन इंडिया मुनाफा देने की हालत में है.
प्रेरणा मुखर्या, 31 वर्ष, संस्थापक, आउटनलाइन इंडिया
समाधान की तलाश
ग्रामीण क्षेत्र के अच्छे, गुणवत्ता से भरपूर डाटा की कमी
शानदार समाधान
ग्रामीण इलाकों से उम्दा डाटा की मदद से बेहतर सामाजिक योजनाएं बनाना मुमकिन
मिली खुशी
समाजिक मूल्यों की रचना, अनौपचारिक क्षेत्र में रोजगार पैदा करना और अपने भतीजे के साथ रविवार का दिन गुजारना


