आधुनिक भारत के प्रतीक
अंग्रेजी राज की एक जेल की जगह खडग़पुर में बने भारतीय तकनीक संस्थान (आइआइटी) के 1956 में पहले दीक्षांत समारोह में पंडित नेहरू ने कहा, ''मेरी पीढ़ी के लोग देश को आजाद करने में जुटे थे."

जवाहरलाल नेहरू की दूरदर्शिता को कम करने आंकना आजकल चलन बन गया है, पर उनकी तकरीरों को सुनने का थोड़ा-सा वक्त निकालें तो हमारे गणतंत्र के महान संस्थापकों में एक की आस्था में भरोसा बहाल हो सकता है. अंग्रेजी राज की एक जेल की जगह खडग़पुर में बने भारतीय तकनीक संस्थान (आइआइटी) के 1956 में पहले दीक्षांत समारोह में पंडित नेहरू ने कहा, ''मेरी पीढ़ी के लोग देश को आजाद करने में जुटे थे.
हम उस महान कार्य में सहभागी थे इसलिए उसका कुछ बोझ हमारे कंधों पर भी आ पड़ा है." फिर, उन्होंने युवा इंजीनियरिंग ग्रेजुएटों का आह्वान किया कि ''जीवन में वाकई कुछ बड़ा करने का साहस दिखाओ" क्योंकि जितना ऊंचा सोचोगे, जितना अव्वल दर्जे का काम करोगे, तुम्हारा उद्यम उतना ही महान होगा. देश के पहले प्रधानमंत्री वाकई संस्थाओं के महान निर्माता थे, जो उनकी बेटी इंदिरा नहीं थीं.
लेकिन भारत की शानदार संस्थाओं की कहानी उन लोगों की कहानी भी है जिन्होंने इन संस्थाओं का निर्माण किया और यह पक्का किया कि ये संस्थाएं उनके बाद भी कायम रहें. इनमें विक्रम साराभाई थे, जिन्होंने भारतीय प्रबंधन संस्थान, अहमदाबाद और भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन की पूर्वज संस्था अंतरिक्ष अनुसंधान केंद्र के साथ ही कई अन्य संस्थाओं की स्थापना की थी. इनमें राजकुमारी अमृत कौर थीं, जिन्होंने अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान की स्थापना की अगुआई की और जी-जान लगाकर इसकी स्वायत्तता की हिफाजत की.
इनमें पुपुल जयकर थीं, जिन्होंने राष्ट्रीय हस्तशिल्प संग्रहालय से लेकर भारतीय राष्ट्रीय कला और सांस्कृतिक विरासत न्यास तक एक के बाद एक अनेक सांस्कृतिक संस्थाओं के निर्माण के बाद राष्ट्रीय फैशन टेक्नोलॉजी संस्थान की स्थापना की. साथ ही इनमें ई. श्रीधरन भी हैं, जिन्होंने कोंकण रेलवे के बाद सिटी मेट्रो की स्थापना की. सरकार में इनके सरीखे अनेक स्त्री-पुरुष रहे हैं जिन्होंने ऐसी इमारतें खड़ी कीं जिनकी अहमियत महज ईंट और गारे से निर्मित ढांचे से कहीं ज्यादा है.
आजाद भारत की कहानी सार्वजनिक-निजी भागीदारी की कहानी भी है. यानी यह टाटा, बिरला, आइटीसी या इन्फोसिस सरीखे विशाल कॉर्पोरेशनों की कहानी भी है जिन्होंने अपने शेयरधारकों की कमाई से कहीं ज्यादा बड़ा काम किया है. उन्होंने ऐसे साम्राज्य खड़े किए जिन्होंने देश के शानदार होटलों, कारगर सार्वजनिक परिवहन प्रणालियों, बेहतरीन अकादेमिक संस्थाओं या प्रशिक्षण केंद्रों के निर्माण का गौरव हासिल किया है. इनमें कुछ की जरूरत खालिस स्वार्थ से पैदा हुई थीरू इन्फोसिस ने अपना केंद्र इसलिए बनाया क्योंकि उसे अपने इंजीनियरों में एक खास किस्म के हुनर की जरूरत थी. दूसरी परोपकारी मकसदों से बनाई गईः किस्सा यह है कि जे.एन. टाटा ने 1903 में बॉम्बे में ताज महल होटल की स्थापना इसलिए की क्योंकि उन्हें उनकी राष्ट्रीयता की वजह से शहर के वाटसंस होटल में दाखिल नहीं होने दिया गया था.
इन शानदार संस्थाओं के निर्माण के पीछे ये ऐसे दूरदर्शी लोग थे, जिन्होंने एक सपने को पूरा करने के रास्ते की तमाम रुकावटों से लोहा लिया. यह वर्गीज कुरियन हो सकते हैं जिन्होंने आणंद मिल्क कोऑपरेटिव की स्थापना की या डॉ. प्रताप सी. रेड्डी हो सकते हैं, जिन्होंने देश में सबसे बड़े निजी हेल्थकेयर नेटवर्क बनाने में सहयोग के लिए राजीव गांधी को मनाया.
आजादी के 70वें साल में इंडिया टुडे उन संस्थाओं को आदरांजलि अर्पित कर रहा है, जिन्होंने आज दुनिया भर में कामयाबी के झंडे गाड़े हैं, चाहे वे आइआइटी के ग्रेजुएट हों जो आज दुनिया की सबसे नई और अत्याधुनिक कॉर्पोरेट कंपनियां चला रहे हैं, या राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के ग्रेजुएट हों जो सिनेमा की जबरदस्त कामयाब फिल्मों की शीर्ष कतार में हैं, या राष्ट्रीय फैशन टेक्नोलॉजी संस्थान के पूर्व छात्र हों, जो पेरिस से लेकर न्यूयॉर्क तक को अपनी रोशनियों से चकाचैंध कर रहे हैं.
आजादी के 70 साला जश्न में इंडिया टुडे ने जिन 70 शानदार संस्थाओं को चुना है, इनमें से हरेक का एक सबक है. यह ऐसी फेहरिस्त है जो उद्योगों और विचारों की नुमाइंदगी करती है. इन संस्थाओं ने आर्थिक मूल्य से कहीं ज्यादा योगदान समाज को दिया, इन्होंने उत्कृष्टता के पैमानों को और ऊंचा उठाया और बहुतेरे लोगों की तारीफ हासिल की. भड़कीले तेवर दिखाना और चमकदार मंसूबे बनाना आसान है. मगर अमिट छाप छोडऩा मुश्किल है.
अगले पन्नों में आप ऐसी संस्थाओं के बारे में पढ़ेंगे जिन्होंने क्रांतियों को रक्रतार दी, बाजार का विस्तार किया, तालीम और इलाज की गुणवत्ता को ऊंचा उठाया, हिंदुस्तानियों के बीच बेहतर पुल जोड़े और उन इलाकों में दिलेरी के साथ धड़धड़ाते हुए कदम रखे जहां दूसरे लडख़ड़ाते चल रहे थे.