शेप ऑफ मोमो : सिक्किम का एक गांव, तीन महिलाएं और बदलती दुनिया के सवाल

सिक्किमी निर्देशक त्रिबेनी राय की ‘शेप ऑफ मोमो’ तीस की उम्र पार कर चुकी एक ऐसी महिला की कहानी है जो सिर्फ महिला होने की वजह से अपनी दुनिया सीमित नहीं करना चाहती

'शेप ऑफ मोमो' का एक सीन

बिष्णु बस यह साबित करना चाहती है कि वह सब कुछ कर सकती है. गैस सिलेंडर उठा सकती है. संतरे के बाग में रहने वाले परिवार से बकाया रकम वसूल सकती है. अपनी बड़ी बहन की ग्रेजुएशन पूरी करवा सकती है. एक रिश्ते में जा सकती है. और इस बात की परवाह नहीं करती कि लोग क्या कहेंगे.

लेकिन पितृसत्ता उस गांव में एक काली परछाईं की तरह मौजूद है, जहां वह नई दिल्ली में कुछ समय बिताने के बाद लौटी है. गांव की महिलाएं अपनी भूमिकाओं और लैंगिक समीकरणों को स्वीकार कर चुकी हैं. इसलिए जब बिष्णु घर के पुरुष सदस्य जैसी भूमिका निभाने लगती है तो उसकी मां और बहन के साथ टकराव होने लगता है.

बिष्णु की मां के लिए स्वतंत्रता जताना समुदाय से अलग हो जाने जैसा है. वहीं बिष्णु के लिए यह जीवन जीने का स्वभाविक तरीका है. उसकी गर्भवती बहन के मन में पछतावा है, जबकि बिष्णु मानती है कि जो करना चाहते हो उसके लिए कभी देर नहीं होती.

उसकी बहन कहती है, "मैं देखूंगी कि तुम्हारे जैसी हर बात पर फैसला सुनाने वाली लड़की को कैसा पति मिलता है." वहीं उसकी मां उसके गुस्से और चिड़चिड़े व्यवहार से तंग आ चुकी है.

'शेप ऑफ मोमो' की निर्देशक त्रिबेनी राय बिष्णु के जिद्दी स्वभाव और उसके संवेदनशील पक्ष के बीच बेहतरीन संतुलन बनाती हैं. इसी के जरिए वे एक ऐसा दिलचस्प किरदार सामने लाती हैं जो व्यावहारिकता को प्राथमिकता देता है. जिसे अपराधबोध होता है लेकिन वह उसे खुद पर हावी नहीं होने देती.

राय ने अपनी नेपाली भाषा की पहली फीचर फिल्म में तीस की उम्र पार कर चुकी एक ऐसी महिला को दिखाया है जो सिर्फ महिला होने के आधार पर अपनी पहचान और विचारों को सीमित नहीं होने देना चाहती. बिष्णु कहती है, "मैं सहन नहीं करूंगी. मैं बर्दाश्त नहीं करूंगी."

यह संघर्ष अधिकतर भीतर का है. राय दर्शकों को केवल महिलाओं वाले एक घर के भीतर ले जाती हैं और उन्हें किरदारों की चिंताओं तथा जटिलताओं से परिचित कराती हैं. जिस बारीकी और समझदारी से वे ऐसा करती हैं, वह उनकी कहानी कहने की क्षमता को दिखाता है.

राय की नजर में एक कोमलता है. खासकर तब जब वे महिलाओं के आपसी रिश्तों को दिखाती हैं. जैसे बगीचे में धूप सेंकते हुए उनके दृश्य या रात के खाने में मोमो खाते हुए एक-दूसरे की टांग खींचने वाले पल.

इस सीन में बिष्णु कहती है, "सुंदर दिखने वाले मोमो बनाने से कहीं बेहतर काम मेरे पास हैं."

राय के संवाद कई परतों वाले हैं. वे किरदारों की सोच और नजरिए की झलक देते हैं. फिल्म में विशेषाधिकार जताने की प्रवृत्ति और बाहरी लोगों/प्रवासियों के प्रति स्थानीय लोगों के नजरिए को भी दिखाया गया है. इसके जरिए सामाजिक और आर्थिक असमानताएं सामने आती हैं.

लेकिन मां-बेटी, दो बहनों, बिष्णु और उसके नए प्रेमी या फिर सबसे महत्वपूर्ण रूप से बिष्णु और उसके बाग में काम करने वाले युवक के रिश्ते को जिस तरह राय बुनती हैं, वही 'शेप ऑफ मोमो' को खास तौर पर असरदार बनाता है.

नेपाली अभिनेत्री गौमाया गुतुंग ने बिष्णु के किरदार को बेहद सहजता से निभाया है. उन्होंने उसके गुस्से, निराशाओं और आकांक्षाओं को प्रभावी ढंग से व्यक्त किया है. बिष्णु की मां की भूमिका में पशुपति राय और बहन की भूमिका में श्यामा श्री शेरपा भी पूरी तरह स्वाभाविक लगती हैं.

राय दिखाती हैं कि सिक्किम का परिदृश्य बदल रहा है और राज्य पर्यटकों के लिए खुल रहा है. लेकिन लोगों की सोच का खुलना कहीं अधिक जटिल प्रक्रिया है. जो महिलाएं यथास्थिति पर सवाल उठाने का साहस करती हैं, वे हमेशा खुद को हाशिये पर धकेला हुआ पाएंगी.

'शेप ऑफ मोमो' की खूबसूरती यह है कि यह जवाब देने की कोशिश नहीं करती. यह सिर्फ वे सभी सही सवाल पूछती है, जिन्हें पूछा जाना चाहिए.

Read more!