मंदिर, जंगल और जीवन : क्या है तिरुपति का अनोखा ग्रीन मिशन ?
तिरुपति बालाजी मंदिर की देखरेख करने वाली संस्था की कोशिशों की वजह से आज यह शहर, मंदिर और इसके आस-पास की पहाड़ियां घने जंगलों से घिर चुकी हैं

फिल्म ‘पुष्पा’ में जैसे लाल चंदन के पेड़ों की कटाई दिखाई गई थी, वैसा ही हाल कुछ साल पहले असल जिंदगी में भी था. तिरुपति बालाजी मंदिर के आसपास मौजूद शेषाचलम के जंगलों में लाल चंदन के पेड़ों की अवैध कटाई और चीन जैसे देशों में तस्करी लंबे समय तक बड़ी समस्या रही.
लेकिन अब तिरुमला तिरुपति देवस्थानम (TTD) की कोशिशों से हालात काफी बदल गए हैं. मंदिर, शहर और आसपास की पहाड़ियों का करीब 90 फीसदी हिस्सा हरियाली से ढक गया है.
TTD का वन विभाग करीब 2,719 हेक्टेयर यानी लगभग 6,720 एकड़ जंगल की देखरेख करता है. भारत सरकार की ताजा 'इंडिया स्टेट ऑफ फॉरेस्ट रिपोर्ट' के मुताबिक TTD क्षेत्र का 89.4% हिस्सा वन क्षेत्र के तौर पर दर्ज है. इससे यह देश की उन प्रमुख संस्थाओं में शामिल हो गया है जो बड़े स्तर पर हरियाली संभाल रही हैं.
करीब 2,431 हेक्टेयर इलाके में घना जंगल है. इससे कार्बन स्टोरेज, मौसम संतुलन और जैव विविधता को बचाने में मदद मिल रही है. अधिकारियों के मुताबिक 1980 से TTD का वन विभाग शेषाचलम की जंगल संपदा की रक्षा कर रहा है. साथ ही करोड़ों श्रद्धालुओं की धार्मिक जरूरतों का भी ध्यान रखा जा रहा है.
वन विभाग एक डिप्टी कंजर्वेटर ऑफ फॉरेस्ट की निगरानी में काम करता है. यहां कुल चार फॉरेस्ट रेंज हैं. दो तिरुमला में और दो तिरुपति में. हर रेंज में फॉरेस्ट रेंज ऑफिसर तैनात हैं. इनके साथ डिप्टी रेंज ऑफिसर, फॉरेस्ट सेक्शन ऑफिसर और दूसरे कर्मचारी मिलकर चौबीसों घंटे गश्त करते हैं ताकि पेड़ों की कटाई और शिकार को रोका जा सके. जंगल में आग रोकने के लिए फायर लाइन बनाई गई हैं और ट्रेनिंग प्राप्त टीमें तैयार रखी गई हैं.
जैव विविधता बचाने के लिए TTD ने विदेशी बबूल यानी एकेशिया के पेड़ों की जगह देसी पेड़ लगाने का अभियान शुरू किया है. इसके तहत पीपल, बरगद, गूलर, महुआ, चंपा, आम, चंदन, लाल चंदन, आंवला और जामुन जैसे पौधे लगाए जा रहे हैं. यह काम 576 हेक्टेयर इलाके में चरणों में किया जा रहा है. अभी तक 22 हेक्टेयर क्षेत्र में पौधारोपण हो चुका है.
चारों फॉरेस्ट रेंज में खास नर्सरी बनाई गई हैं जहां देसी पेड़, सजावटी पौधे और औषधीय पौधे तैयार किए जाते हैं. इन्हीं से जंगल बहाली कार्यक्रमों के लिए पौधे उपलब्ध कराए जाते हैं.
आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने भी TTD की तारीफ की है. उन्होंने कहा कि हमारी परंपराएं प्रकृति को पवित्र मानती हैं और जंगलों व वन्यजीवों की रक्षा करना ईश्वर की सेवा जैसा है.
शेषाचलम के जंगल हाथी, तेंदुए, भालू और सांप जैसे कई वन्यजीवों का घर भी हैं. इसलिए इंसानों और जानवरों के बीच टकराव रोकना बड़ी चुनौती है. तिरुपति से तिरुमला तक 11 किलोमीटर के पैदल रास्ते पर कई बार तेंदुए और भालू दिखने की घटनाएं सामने आती रही हैं.
तीन साल पहले दो तेंदुओं के हमलों के बाद डर काफी बढ़ गया था. इनमें एक 6 साल की बच्ची की मौत हो गई थी. इसके बाद TTD ने पैदल यात्रा करने वाले श्रद्धालुओं को डंडे बांटना शुरू किया ताकि जरूरत पड़ने पर वे जंगली जानवरों से बचाव कर सकें.
श्रद्धालुओं की सुरक्षा के लिए तिरुमला में तीन स्नेक रेस्क्यू टीमें भी तैनात हैं. वन विभाग रास्तों के किनारे खतरनाक पेड़ों की पहचान कर उन्हें काटता या छांटता है. वन्यजीवों से जुड़े जोखिम कम करने के लिए वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया के साथ मिलकर कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं.
वन विभाग मंदिर में होने वाले धार्मिक अनुष्ठानों के लिए चंदन की लकड़ी, जलावन, कुश घास और दूसरी जरूरी सामग्री भी उपलब्ध कराता है. इसके अलावा सड़क किनारे हरियाली और बगीचों की देखभाल भी करता है.
अधिकारी बताते हैं कि दुर्लभ और औषधीय पौधों को बचाने पर खास जोर दिया जा रहा है. आयुर्वेद के लिए जरूरी कच्चा माल भी उपलब्ध कराया जा रहा है. इसके लिए पवित्र वनम, दिव्य औषध वनम और पालमनेरु टिंबर प्लांटेशन जैसे प्रोजेक्ट चल रहे हैं.
TTD अधिकारियों का कहना है कि उनका मकसद इस पवित्र वन संपदा को बचाना और आने वाली पीढ़ियों तक इसे सुरक्षित पहुंचाना है.