आम बॉलीवुड थ्रिलर से कैसे अलग है रघुबीर यादव और IPS सिमाला प्रसाद की 'द नर्मदा स्टोरी’

पुलिस अधिकारी सिमाला प्रसाद इससे पहले 'नक्काश' और 'अलिफ़' में भी नजर आ चुकी हैं

चमकती रोशनी, रेड कार्पेट और तालियों की गूंज...बॉलीवुड की दुनिया अक्सर यहीं से अपनी पहचान बनाती है. लेकिन इस चकाचौंध के बीच एक कहानी ऐसी भी है जो रोशनी से नहीं, सच से चमकती है. यह कहानी है कई दिग्गज कलाकारों और एक मशहूर निर्देशक के साथ आने से संभव हो पाई फिल्म द नर्मदा स्टोरी  की.

असल जिंदगी से दो चार होती इस फिल्म में बहुत करीने से ‘लोक’ और ‘तंत्र’ को पिरोकर अंतिम जन कहलाने वाले आम भारतीय के हिस्से के सवाल पूछे गए हैं. जहां एक तरफ दिग्गज कलाकार रघुवीर यादव, मुकेश तिवारी और दुनिया भर में पहचान बना चुके निर्देशक ज़ैगम इमाम इस कहानी में ‘लोक’ का प्रतिनिधित्व करते हैं, वहीं इनकी जिम्मेदारी लेने वाले तंत्र की तरफ से इस कहानी में आती हैं सिमाला प्रसाद. एक आईपीएस अधिकारी, जिन्होंने बतौर कलाकार इस फिल्म में एक जरूरी किरदार की भूमिका निभाई है.

अलिफ़  और नक्काश  जैसी फिल्मों से दुनिया भर में प्रशंसा बटोर चुके निर्देशक ज़ैगम इमाम और वेब सीरीज कल्चर का प्रतीक बनकर घर-घर पहुंची सीरीज ‘पंचायत’ के अपने ताज़ा काम से चौंकाते मंझे हुए अभिनेता रघुबीर यादव के साथ पुलिस अधिकारी सिमाला प्रसाद का बतौर एक्टर काम करना महज संयोग भर नहीं है.

एक्टिंग का लोहा मनवा चुकी हैं सिमाला 

इंटरनेशनल अवार्ड सर्कल में काफी सराही गई फिल्म अलिफ़  2017 में भारतीय सिनेमाघरों में दिखाई गई थी. इसमें दानिश हुसैन, नीलिमा अज़ीम और आदित्य ओम की सधी हुई एक्टिंग के बीच सवाल-जवाब का जो एक सीन दर्शकों को याद रह जाता है वो बतौर एक्टर सिमाला प्रसाद ने निभाया था. उस छोटे लेकिन कमाल के असरदार रोल में अपनी एक्टिंग से सिमाला ने दर्शकों समेत क्रिटिक्स को भी हैरान किया था. 

बातचीत में सिमाला कहती हैं कि उन्हें अपना काम पूरी तन्मयता से करने की आदत है और बाउंड्रीज़ को चैलेंज करने में जो आनंद है उससे वे कभी चूकती नहीं. चाहे साल 2010 में बिना किसी कोचिंग के संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा पहले ही प्रयास में पास करके ऑल इंडिया रैंकर बनने की बात हो या अपने बचपन के सपने एक्टिंग के लिए खुद को दोहरी जिम्मेदारी देने का मामला हो, सिमाला हमेशा अपना ‘पुशिंग दी बाउंड्री’ मोड ऑन रखती हैं.
द नर्मदा स्टोरी  में अपने किरदार पर बात करते हुए बड़े सहज ढंग से सिमाला अभिनय को अपनी उस संवेदनशील नज़र का विस्तार मानती हैं, जिसने वर्दी पहनने के बाद समाज के सबसे मुश्किल, सबसे असहज सचों को करीब से देखा है. यही वजह है कि जब वे कैमरे के सामने आती हैं तो उनका अभिनय उन्हीं का अनुभव लगता है.

फिल्म के सेट पर निर्देशक ज़ैगम इमाम, सिमाला प्रसाद और मुकेश तिवारी

उनकी शुरुआत भले ही अलिफ़  और नक्काश  जैसी बेहतरीन फिल्मों में छोटे किरदारों से हुई. लेकिन, उन छोटे-छोटे रोल्स में भी उन्होंने एक ऐसी छाप छोड़ी जो लंबे समय तक बनी रहती है. इन किरदारों के लिए स्क्रीन टाइम कभी मायने नहीं रखता, मायने रखता है किरदार का असर. और यही उनकी सबसे बड़ी ताकत है. 

सफर का नया पड़ाव 

अब इस सफर में एक नया अध्याय जुड़ रहा है- द नर्मदा स्टोरी. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराहे गए निर्देशक ज़ैगम इमाम की यह फिल्म सिर्फ एक कहानी नहीं बल्कि समाज के उन अंधेरे कोनों में उतरने की कोशिश है जहां अक्सर हम देखने से बचते हैं. यह फिल्म उन लड़कियों की कहानी कहती है जो अचानक गायब हो जाती हैं. और, उनके साथ गायब हो जाते हैं कई सवाल, कई चीखें, कई अनसुने सच.

रघुबीर यादव और मुकेश तिवारी के साथ इस फिल्म में किरदार निभा रहीं सिमाला बताती हैं कि द नर्मदा स्टोरी  कोई आसान फिल्म नहीं है. यह दर्शकों को सहज नहीं रहने देती. यह सवाल करती है. क्या हम सच में जागरूक हैं? या हम सिर्फ वही देखना चाहते हैं जो हमें परेशान न करे? यह फिल्म डर, चुप्पी, सामाजिक दबाव और सिस्टम की खामोशियों को सामने लाती है.

फिल्म में सिमाला प्रसाद के साथ रघुवीर यादव, मुकेश तिवारी, अंजलि पाटिल और अश्विनी कालसेकर जैसे मंझे हुए कलाकार हैं. लेकिन इस पूरी स्टारकास्ट के बीच सिमाला की मौजूदगी अलग इसलिए दिखती है क्योंकि वे इस कहानी को सिर्फ निभा नहीं रहीं, वे इसे समझती हैं, महसूस करती हैं.
खुद सिमाला कहती हैं, “यह भूमिका मेरे बहुत करीब है. अपनी पढ़ाई के दिनों से ही मैं अभिनेत्री बनना चाहती थी, और इस फिल्म का लीड किरदार मेरे उस सपने को जीने का मौका दे रहा है.” 

'द नर्मदा स्टोरी' के एक फ्रेम में सिमाला प्रसाद और मुकेश तिवारी

संतुलन की साधना 

बातचीत में सिमाला बार-बार अपनी जिम्मेदारी और पैशन के बीच संतुलन की बात कहती हैं. इस संतुलन को साधने में की गई साधना पर ध्यान दिलाती हैं. वर्दी के साथ असल दुनिया और कैमरे के साथ असल सवालों का सामना करते हुए रघुबीर यादव की उस्तादी कितनी काम आई? 

सिमाला कहती हैं कि पुलिसिंग में भले अब उन्हें समय हो जाने की वजह से अनुभव के स्तर पर काफी कुछ हासिल हुआ हो, लेकिन अभिनय के मामले में रघुबीर यादव सरीखे उम्दा कलाकार के साथ एक प्रोजेक्ट पर काम करना लगातार सीखने जैसा है. संतुलन साधने की कला ऐसे दिग्गज ही सिखा भी सकते हैं.

दरअसल, सिमाला की असली पहचान इसी संतुलन में छिपी है. एक तरफ वे एक सख्त ईमानदार आईपीएस अधिकारी हैं, जिनकी पहचान जमीनी स्तर पर काम करने वाली अफसर के रूप में होती है. दूसरी तरफ वे एक कलाकार हैं, जो उन्हीं अनुभवों को परदे पर उतारकर समाज से संवाद करना चाहती हैं. उनकी किताब ‘She Goes Missing’ इसी सोच का विस्तार है. इसमें उन्होंने लापता लड़कियों की समस्या को सिर्फ एक क्राइम केस की तरह नहीं देखा, बल्कि उसे एक गहरी मानवीय त्रासदी के रूप में समझने की कोशिश की है. वही संवेदना अब द नर्मदा स्टोरी  में और बड़े कैनवस पर दिखाई देती है. सिमाला मानती हैं कि इंसान को खुद को एक ही पहचान में सीमित नहीं करना चाहिए. उनके लिए वर्दी और अभिनय दो अलग-अलग रास्ते नहीं, बल्कि एक ही मकसद की ओर जाने वाले दो माध्यम हैं- समाज को समझना और उसे बेहतर बनाने की कोशिश करना.

द नर्मदा स्टोरी  के जरिए दिग्गजों की ये टीम एक बार फिर यह साबित कर रही है कि सिनेमा सिर्फ मनोरंजन का माध्यम नहीं बल्कि मन में उठते सवालों का भी कैनवास है. और सिमाला तो यह साबित कर ही चुकी हैं कि अगर इरादे मजबूत हों, तो वर्दी की सख्ती और कला की संवेदनशीलता, दोनों को एक साथ जिया जा सकता है.

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