एक शर्मीला बैकबेंचर कैसे बना 'जन नायक' : थलपति विजय के थल से शिखर तक का सफर

सिनेमाई पर्दे से असलियत के 'नायक' बनने तक एक्टर विजय की जिंदगी किसी सुपरहिट फिल्म से कम नहीं है

थलपति विजय चुनाव प्रचार के दौरान (फाइल फोटो)

आज चार मई को जब राज्यों के चुनाव नतीजे आ रहे हैं तब तमिलनाडु की हवा में कुछ अलग बात है. जैसे किसी फिल्म का क्लाइमेक्स चल रहा हो. पर्दे के पीछे से एक नायक धीरे-धीरे बाहर आ रहा हो और पूरा जनसमुदाय उसकी एंट्री पर सीटी बजा रहा हो. कहानी फ़िल्मी लग रही है लेकिन अब यह कहानी अनगिनत बार स्क्रीन पर दोहराई जाने के बाद असलियत में लिखी जाने को तैयार खड़ी दिखाई दे रही है.

यह कहानी है एक अभिनेता की, बचपन में क्लास के सबसे चुपचाप रहने वाले उस बच्चे की जिसे स्क्रीन पर आते ही 'नेपो किड' की गाली खानी पड़ी. यह कहानी है एक्टर विजय की, जिसे प्यार से उसके चाहने वाले थलपति कहकर पुकारते हैं. जल, थल और नभ में जो थल का राजा हो. यह कहानी उस थलपति विजय की है जिसने पर्दे पर नायक बनकर शुरुआत की और अब असली दुनिया में सत्ता के दरवाजे तक पहुंच चुका है. कभी क्लास का सबसे चुप्पा बच्चा अब करोड़ों लोगों की आवाज़ बन चुका है.

ऐसे शुरू होती है यह कहानी

विजय का जन्म 22 जून 1974 को चेन्नई में हुआ. पिता एस ए चंद्रशेखर फिल्म निर्देशक थे और मां  शोभा चंद्रशेखर गायिका. घर में सिनेमा हवा की तरह था. लेकिन आगे चलकर यही हवा विजय को उड़ना सिखाने की जगह उनका दम घोंटने वाली थी. क्योंकि तमाम मेहनत के बाद भी विजय को अपने घर के इसी सिनेमाई माहौल के लिए गाली सुननी थी. 

विजय के बचपन का एक किस्सा अक्सर उनके करीबी लोग सुनाते हैं. कहते हैं कि स्कूल में वे बेहद शांत और कम बोलने वाले लड़के थे. क्लास में पीछे बैठना पसंद करते. उन्हें मंच पर बोलने से डर लगता था. उनकी जिंदगी में पहला बड़ा झटका तब आया जब उनकी छोटी बहन विद्या की कम उम्र में मौत हो गई. यह घटना विजय को भीतर से बदल गई. वे और भी अंतर्मुखी हो गए. लेकिन शायद यही दर्द उनके अंदर एक अलग तरह की संवेदना लेकर आया. उनकी फिल्मों में जो आम आदमी का दर्द दिखता है उसकी जड़ें शायद इसी घटना में हैं.

उतार चढ़ाव से दो चार होते रहे हैं विजय अपने फ़िल्मी सफ़र में (विजय की फिल्मों के स्क्रीनशॉट्स)

सिनेमा से विजय के थलपति बनने का सफर

अगर विजय की कहानी को समझना है तो उनकी फिल्मों को पढ़ना पड़ेगा क्योंकि उन्होंने सिर्फ फिल्में नहीं कीं बल्कि उन्होंने धीरे-धीरे अपने लिए एक राजनीतिक जमीन भी तैयार की.

विजय ने अपने फिल्मी सफर की शुरुआत बाल कलाकार के तौर पर की. पिता की फिल्मों में छोटे-छोटे रोल. लेकिन असली शुरुआत होती है साल 1992 से. फिल्म नालैया थीरपू. लॉन्च बड़े बैनर का, पिता के निर्देशन में. लेकिन फिल्म बॉक्स ऑफिस पर गिर गई. आलोचकों ने साफ कह दिया कि यह लड़का नहीं चलेगा. इस दौर में विजय को “नेपोटिज्म प्रोडक्ट” यानी वो कलाकार जो अपने माता-पिता या रिश्तेदारों के रसूख से इंडस्ट्री में टिका हुआ है, कहकर खारिज किया जा रहा था. अब साल 1996 में फिल्म आई पूव उनक्कागा.  यह फिल्म हिट हुई तो स्क्रीन पर विजय का कायदे से जन्म हुआ. रोमांटिक हीरो के तौर पर उन्होंने अपनी जगह बनाई. इस फिल्म के बाद दर्शकों ने उन्हें स्वीकार करना शुरू किया. 

इसके बाद 1997 से 2003 प्रयोग और संघर्ष का दौर रहा. लव टुडे, कधालुक्कू मरियाधई और प्रियामंनायेल फ़िल्में आईं. इन फिल्मों ने विजय को “चॉकलेट बॉय” की इमेज दी. लेकिन बॉक्स ऑफिस पर लगातार उतार-चढ़ाव आते रहे. विजय स्टार तो बन गए थे लेकिन सुपरस्टार नहीं कहला सके.

फिर आया विस्फोट का साल 2004. गिली  रिलीज हुई. यह फिल्म सिर्फ हिट नहीं थी, यह एक परिघटना थी. कबड्डी के मैदान से निकलकर विजय सीधे तमिलनाडु के हर घर में पहुंच गए. यह उनकी पहली “मास ब्लॉकबस्टर” थी. इसके बाद विजय सिर्फ एक्टर नहीं रहे. विजय “थलपति” बन गए.

और फिर शुरू हुआ उंचाई और गिरावट का चक्र. 2005 से 2010 तक यह चक्र चलता रहा. तिरुपाची  और पोक्किरी जैसी फिल्मों ने उन्हें मास हीरो के रूप में मजबूत किया. लेकिन फिर अधि और सुरा जैसी फ्लॉप फिल्मों ने उनके करियर को हिला भी दिया. इस दौर में कई लोग कहने लगे कि विजय का समय खत्म हो गया है. लेकिन विजय बार-बार वापसी के लिए मशहूर हैं. फिर आया साल 2012. वापसी जो इतिहास बन गई. तुपक्की  रिलीज हुई. ए.आर. मुरुगदास के साथ यह फिल्म आई और विजय ने अपने करियर का सबसे बड़ा कमबैक किया. फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर रिकॉर्ड तोड़े और विजय को “कंटेंट वाला मास हीरो" बना दिया. अब विजय सिर्फ एक्शन नहीं बल्कि सिस्टम पर सवाल उठाने वाले नायक बन गए. आगे की फिल्मों में विजय ने यही टोन जारी रखी. 

जन नायकन सेंसर बोर्ड के धक्के खाती रही है, अब रिलीज होगी विजय की अंतिम फिल्म

साल 2014 से 2017 तक सामाजिक संदेश और स्टारडम का मेल होता रहा. कथी, थेरी और मर्सल  में विजय ने किसान, पुलिस और डॉक्टर जैसे किरदार निभाए. हर फिल्म में एक सामाजिक या राजनीतिक संदेश था. फिल्म मर्सल  ने जो सवाल उठाए उससे राष्ट्रीय स्तर पर विवाद हुआ. लेकिन इससे विजय का कद और बढ़ गया. विजय की पैन इंडिया मशहूरियत का साल शुरू हुआ 2018 से जो 2021 तक चलता रहा. फिल्म बिगिल  और मास्टर  इतनी धाकड़ साबित हुईं कि ये फिल्में सिर्फ तमिलनाडु तक सीमित नहीं रहीं. मास्टर  कोविड के बाद थिएटर में रिलीज होकर बड़ी हिट साबित हुई. विजय अब एक ऐसे स्टार बन चुके थे जिनकी फिल्में त्योहार बन जाती थीं.

अब साल 2023 से 2024 तक के बदलाव को भी समझ लीजिए. क्योंकि यही दो साल विजय की सबसे बड़ी कामयाबी के भी रहे और फिर फिल्मों से दूरी के भी. फिल्म रिलीज हुई लिओ. लोकेश कनगराज के साथ यह फिल्म आई और 600 करोड़ के आसपास का कारोबार किया. यह विजय के करियर की सबसे बड़ी कमाई करने वाली फिल्मों में से एक बनी. लेकिन दिलचस्प बात है कि इसी समय विजय ने फिल्मों से दूरी बनाने का फैसला किया. विजय की खासियत सिर्फ हिट फिल्मों तक सीमित नहीं रही. उनकी फिल्मों में एक पैटर्न दिखने लगा. एक आम आदमी जो सिस्टम से लड़ता है. एक युवा जो भ्रष्टाचार के खिलाफ खड़ा होता है. विजय धीरे-धीरे अपने भीतर के राजनीतिक नेता को गढ़ रहे थे.

अब विजय की अंतिम कही जा रही फिल्म जन नायकन  बनकर तैयार है और महीनों से सेंसर बोर्ड के चक्कर काट रही है. शायद सच में जन नायक बनने के बाद विजय की इस फिल्म के रास्ते से भी रोड़े हट जाएं.

शादी भी फ़िल्मी कहानी सरीखी 

विजय की मुलाकात संगीता से एक दिलचस्प तरीके से हुई. कहते हैं कि संगीता उनकी बहुत बड़ी फैन थीं और लंदन से चेन्नई सिर्फ उनसे मिलने आई थीं. संगीता हर बार विजय की फिल्मों के हिट होने के बाद सिर्फ उनसे मिलने इतनी दूर आती रहीं. मुलाकातें धीरे-धीरे रिश्ते में बदलने लगीं. आखिरकार दोनों ने शादी कर ली. हालांकि विजय की शादी हमेशा लाइमलाइट से दूर ही रही. उनके दो बच्चे हैं. बेटा जेसन संजय और बेटी दिव्या. विजय ने हमेशा अपने परिवार को मीडिया की तीखी रोशनी से बचाकर रखा. उनका कहना था कि वे अपने बच्चों को स्टार किड नहीं बल्कि आम जिंदगी देना चाहते थे.

लेकिन स्टारडम की दुनिया में कहानियां सिर्फ सच से नहीं बनतीं. अफवाहें भी अपने रास्ते बना लेती हैं. पिछले कुछ सालों में विजय और संगीता के रिश्ते को लेकर कई तरह की बातें सामने आईं. कहीं कहा गया कि दोनों अलग रह रहे हैं. कहीं तलाक की खबरें उड़ीं. सोशल मीडिया ने इन अफवाहों को और हवा दी.

रील से रियल तक विजय की कहानी किसी फिल्म से कम नहीं

लेकिन दिलचस्प बात यह है कि विजय ने कभी इन अफवाहों पर खुलकर प्रतिक्रिया नहीं दी. उन्होंने चुप्पी चुनी. और यह चुप्पी भी एक तरह का बयान बन गई. उनके करीबी लोग कहते हैं कि विजय अपने निजी जीवन को सार्वजनिक बहस का हिस्सा नहीं बनाना चाहते. उनके लिए परिवार एक निजी दायरा है जहां कैमरे की नजर नहीं पहुंचनी चाहिए. पर्दे पर विजय हर सवाल का जवाब देने वाले नायक हैं. लेकिन असल जिंदगी में यह सुपरस्टार हर सवाल का जवाब देना जरूरी नहीं समझता. शायद यही बारीक और गहरी समझ बाकी सितारों से थलपति को अलग करती है.

और फिर बारी आई 'जन नायक' बनने की

हर कहानी में एक मोड़ आता है. विजय की जिंदगी में यह मोड़ तब आया जब उन्होंने महसूस किया कि फिल्मों में जो बातें वह कह रहे हैं उन्हें जमीन पर उतारना भी जरूरी है. 2024 में उन्होंने अपनी राजनीतिक पार्टी तमिलगा वेत्री कझगम (TVK) की घोषणा की. विजय का कहना था कि ये सिर्फ एक पार्टी नहीं है. ये सोसाइटी को 'गिव बैक' का उनका एक इरादा है.

कभी चुपचाप रहने वाला स्कूली बच्चा आज करोड़ों की आवाज़ बन गया !

राजनीति में आना आसान नहीं होता. खासकर तब जब आप एक सुपरस्टार हों. लोगों को लगता है कि यह एक और “स्टार एंट्री” है. लेकिन विजय ने अपने तरीके से राजनीति की. बड़े-बड़े वादों के बजाय छोटे-छोटे काम. शिक्षा, रोजगार और युवाओं की भागीदारी पर जोर. विजय का राजनीति में आना अचानक नहीं था. उन्होंने वर्षों तक विजय मक्कल इयक्कम संगठन के जरिए सामाजिक कार्य किए. चुनावी प्रचार के दौरान एक दृश्य बार-बार सामने आया. विजय बिना सुरक्षा घेरे के लोगों के बीच खड़े हैं. हाथ जोड़कर बात कर रहे हैं. कोई उन्हें छूकर देखना चाहता है तो कोई अपनी समस्या बताना चाहता है. विजय शालीनता से सुनते हैं. जवाब देते हैं.

आज जब चुनावी नतीजे सामने आ रहे हैं और उनकी पार्टी आगे दिख रही है तो ये सिर्फ एक राजनीतिक जीत नहीं है. यह उस सफर की जीत है जो एक शर्मीले बच्चे से शुरू हुआ था. जो असफलताओं से गुजरा. जिसने अपनी पहचान खुद बनाई. और जिसने आखिरकार जनता के बीच अपनी जगह बना ली. इस पूरी यात्रा में उनके निजी जीवन की चुप्पियां, अफवाहें, रिश्तों की परतें सब साथ-साथ चलती रहीं. लेकिन विजय ने हर बार एक ही चीज चुनी और वह है आगे बढ़ना. शायद यही वजह है कि आज तमिलनाडु में एक नई कहानी लिखी जा रही है. एक ऐसी कहानी जिसमें सिनेमा और राजनीति की सीमाएं धुंधली हो गई हैं. जहां पर्दे का नायक असली दुनिया का नेता बन चुका है. विजय के अपने फ़िल्मी स्टाइल में कहें तो 'अभी तो इंटरवल है...असली कहानी अब सामने आएगी'. 

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