न आवाज सुनी, न दुनिया देखी; हौसले के दम पर सारा मोइन बन गईं दुनिया के लिए मिसाल
लखनऊ की छात्रा सारा मोइन ने तीन दिव्यांगताओं के बावजूद आईएससी बोर्ड की 12वीं की परीक्षा में 98.7% अंक हासिल कर रिकार्ड कायम किया

लखनऊ के नज़रबाग की एक साधारण-सी गली से निकली असाधारण कहानी आज दुनिया भर के लिए प्रेरणा बन गई है. यह कहानी है सारा मोइन (20) की, एक ऐसी छात्रा, जिसने अंधेरे, खामोशी और शब्दहीनता तीनों को चुनौती देते हुए अपनी किस्मत खुद लिखी.
2026 में ISC कक्षा 12 की परीक्षा में 98.7 प्रतिशत अंक हासिल कर लखनऊ के प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों में शुमार Christ Church College की टॉपर बनी सारा की उपलब्धि सिर्फ एक परीक्षा का परिणाम नहीं है, बल्कि यह वर्षों के संघर्ष, परिवार के त्याग और शिक्षा के प्रति अटूट विश्वास की कहानी है.
सारा की मार्कशीट उनकी प्रतिभा का साफ आईना है. ज्योग्राफी और मास मीडिया एंड कम्युनिकेशन में पूरे 100 अंक, अंग्रेजी में 98, इतिहास में 97 और मनोविज्ञान में 96 अंक. ये सिर्फ नंबर नहीं, बल्कि उस दृढ़ इच्छाशक्ति के प्रमाण हैं, जिसने हर बाधा को पीछे छोड़ दिया. लेकिन इन अंकों के पीछे जो कहानी छिपी है, वह कहीं ज्यादा गहरी और भावनात्मक है.
एक सामान्य शुरुआत, फिर अचानक बदली जिंदगी
सारा का जन्म एक सामान्य बच्ची की तरह हुआ था. उनकी आंखें ठीक थीं, सुनने और बोलने की क्षमता भी सामान्य थी. परिवार के लिए वह एक खुशहाल शुरुआत थी. लेकिन चार साल की उम्र में उनकी जिंदगी ने अचानक करवट ली. गर्दन पर एक ग्लैंड निकल आई, जिसने धीरे-धीरे पूरे परिवार की जिंदगी बदल दी. सारा के पिता मोइन अहमद बताते हैं, “हम सारा को इलाज के लिए कई अस्पतालों में ले गए. डॉक्टरों ने स्टेरॉयड की भारी मात्रा दी. इलाज खत्म होने के बाद हमें लगा कि सब ठीक हो जाएगा, लेकिन धीरे-धीरे हमने देखा कि सारा की देखने, सुनने और बोलने की क्षमता प्रभावित होने लगी.” कुछ ही समय में सारा उस स्थिति में पहुंच गईं, जहां वह न ठीक से देख सकती थीं, न सुन सकती थीं और न ही बोल पाती थीं। बाद में डॉक्टरों ने इसे 'सारकॉइडोसिस' (Sarcoidosis) से जुड़ी जटिलता बताया--एक दुर्लभ बीमारी, जिसने धीरे-धीरे उनकी संवेदनाएं छीन लीं.
स्कूलों के बंद दरवाजे
2014 में, जब सारा महज 6 साल की थीं, तब उनके लिए शिक्षा के दरवाजे लगभग बंद हो गए थे. लखनऊ के कई स्कूलों ने उनकी स्थिति को देखते हुए उन्हें दाखिला देने से मना कर दिया. मोइन अहमद उस दौर को याद करते हुए कहते हैं, “हम हर जगह गए, लेकिन कोई भी स्कूल उन्हें लेने को तैयार नहीं था. सबको लगता था कि वह पढ़ नहीं पाएंगी.”
सारा की मां जूली अहमद, जो खुद एक शिक्षिका हैं, बताती हैं कि उस समय सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि सारा को सामान्य बच्चों की तरह शिक्षा कैसे दी जाए. वे कहती हैं, “हम नहीं चाहते थे कि उसे अलग कर दिया जाए. हम चाहते थे कि वह वही सीखे, जो बाकी बच्चे सीखते हैं,” वह कहती हैं.
जैसे-जैसे सारा की स्थिति जटिल होती गई, परिवार पर दबाव बढ़ता गया. इलाज के लिए उन्हें हैदराबाद सहित कई शहरों में जाना पड़ा. पढ़ाई लगातार बाधित हो रही थी. आखिरकार एक समय ऐसा आया, जब सारा को स्कूल से निकालना पड़ा. इसी दौर में उनके पिता ने एक बड़ा फैसला लिया. उन्होंने अपनी नौकरी से समय से पहले सेवानिवृत्ति ले ली, ताकि वे सारा की देखभाल और पढ़ाई पर पूरा ध्यान दे सकें. मोइन अहमद बताते हैं, “यह आसान नहीं था, लेकिन हमें पता था कि अगर हम नहीं करेंगे, तो सारा का भविष्य रुक जाएगा.” इसके बाद घर पर पढ़ाई शुरू हुई. मां जूली अहमद ने शिक्षक की भूमिका निभाई, जबकि उनके बड़े भाई जोहेब अहमद ने भी हर संभव मदद की. लेकिन यह सफर आसान नहीं था-क्योंकि सारा के लिए पढ़ाई का मतलब किताबें पढ़ना नहीं, बल्कि उन्हें नए तरीके से समझना था.
जिंदगी का टर्निंग पॉइंट : समावेशी शिक्षा
सारा की जिंदगी में असली बदलाव तब आया, जब Christ Church College ने ‘समावेशी शिक्षा’ की दिशा में एक अहम कदम उठाया. कॉलेज ने विशेष जरूरतों वाले बच्चों के लिए एक अलग सेक्शन शुरू किया और एक स्पेशल एजुकेटर नियुक्त किया. स्कूल के प्रिंसिपल ईए चटर्जी बताते हैं, “हम चाहते थे कि ऐसे बच्चों को भी वही अवसर मिले, जो बाकी छात्रों को मिलते हैं. सारा हमारे लिए एक चुनौती भी थीं और प्रेरणा भी.”
यहीं सारा की मुलाकात स्पेशल एजुकेटर सलमान अली काज़ी से हुई, जिन्होंने उनकी क्षमता को पहचाना और उसे सही दिशा दी. काज़ी कहते हैं, “सारा बाकी बच्चों से अलग थीं. वह न देख सकती थीं, न सुन सकती थीं, लेकिन उनकी समझने की क्षमता अद्भुत थी. हमें बस सही माध्यम खोजना था.”
सारा की पढ़ाई के लिए तकनीक ने अहम भूमिका निभाई. उन्हें ‘ऑर्बिट रीडर’ और रिफ्रेशेबल ब्रेल डिस्प्ले जैसे उपकरणों की मदद से पढ़ाया गया. ये डिवाइस किताबों को डिजिटल फॉर्मेट में बदलकर ब्रेल डॉट्स में परिवर्तित करते हैं, जिससे सारा अपनी उंगलियों के जरिए पढ़ सकें. सलमान बताते हैं, “काउंसिल ने प्रश्न पत्र वर्ड फाइल में भेजा, जिसे डिवाइस ने ब्रेल में बदल दिया. सारा ने उसी के जरिए परीक्षा दी और जवाब दिए.” घर पर पढ़ाई का तरीका और भी अनोखा था. उनकी मां उनकी हथेली पर उंगलियों से अक्षर बनाकर सवाल पूछती थीं. सारा उन स्पर्शों को जोड़कर शब्द और वाक्य बनातीं और जवाब देतीं. जूली अहमद बताती हैं, “यह बहुत धैर्य का काम था. लेकिन सारा की सीखने की गति इतनी तेज थी कि हमें कभी लगा ही नहीं कि वह पीछे हैं.”
दो साल का नुकसान, लेकिन हौसला कायम
बीमारी और इलाज के चलते सारा के दो साल पढ़ाई में बर्बाद हो गए. यह किसी भी छात्र के लिए बड़ा झटका होता है लेकिन सारा ने इसे अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया. कक्षा 10 में उन्होंने 95 प्रतिशत अंक हासिल किए. यह उनके लिए एक टर्निंग पॉइंट था. मोइन बताते हैं, “10वीं के रिजल्ट ने सारा को आत्मविश्वास दिया कि वह कुछ भी कर सकती हैं.” और फिर आया 2026 जब सारा ने ISC कक्षा 12 में 98.7 प्रतिशत अंक हासिल कर इतिहास रच दिया. वे अपने कॉलेज की टॉपर बनीं और यह साबित कर दिया कि सीमाएं सिर्फ शरीर की होती हैं, मन की नहीं.
स्कूल के प्रेसिडेंट राकेश चटर्जी कहते हैं, “इस साल हमारे यहां दो विशेष बच्चों ने परीक्षा दी. सारा ने 98.7 प्रतिशत और दूसरे छात्र ने 72 प्रतिशत अंक हासिल किए. यह हमारे लिए गर्व की बात है.” उनके शिक्षक और सहपाठी उन्हें प्यार से ‘हेलेन केलर’ कहकर बुलाते हैं लेकिन सारा की पहचान अब किसी तुलना की मोहताज नहीं रही.
सारा की सफलता के पीछे उनका परिवार एक मजबूत स्तंभ की तरह खड़ा रहा. पिता का त्याग, मां का धैर्य और भाई का सहयोग-इन तीनों ने मिलकर सारा के सपनों को उड़ान दी. मोइन अहमद कहते हैं, “हमने सिर्फ इतना किया कि उसे कभी अकेला महसूस नहीं होने दिया.” उनकी मां कहती हैं, “हमें हमेशा विश्वास था कि सारा कुछ बड़ा करेगी, लेकिन उसने हमारी उम्मीदों से भी ज्यादा हासिल किया.”