इंडिया टुडे आर्काइव : पं. शिवकुमार शर्मा ने संतूर को कैसे दिलाया था एक शास्त्रीय वाद्य का दर्जा

पं. शिवकुमार शर्मा की 13 दिसंबर को पुण्यतिथि है. पंडित हरिप्रसाद चौरसिया ने उनको याद करते हुए इंडिया टुडे मैगजीन के 25 मई 2022 के अंक में यह आलेख लिखा था

पंडित शिवकुमार शर्मा

यह बात है 1958 की. शिवजी से पहली बार मेरी मुलाकात दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में हुई थी. मुझे याद है, हम दोनों ही वहां एक अंतरमहाविद्यालयी सम्मेलन में भाग लेने पहुंचे थे. वे वहां प्रतिभागी के तौर पर आए थे और मैं एक संगत कलाकार के तौर पर.

दोस्ताना ताल्लुकात तो हमारे बीच तभी बन गए थे लेकिन कुछ महीने बाद जब मैं बंबई में उनसे मिला तो हम पक्के दोस्त बन गए. उस समय उन्होंने जम्मू में अपनी पढ़ाई पूरी ही की थी और काम की तलाश में बंबई आ गए थे. संतूर और तबला दोनों बजा लेने के कारण उन्हें स्वर और लय की अच्छी समझ थी.

बंबई महासागर की तरह है. यह एक ऐसा शहर है जहां आप आसानी से गुम हो सकते हैं. शिवजी का एक पहलू तो यही था कि वे बेहद भले और सज्जन आदमी थे. साथ ही वे बहुत पढ़े-लिखे व्यक्ति थे, इसलिए उन्हें अपना संगीत दर्शकों तक पहुंचाने में ज्यादा समय नहीं लगा. लोग उन्हें तुरंत पसंद करने लगते थे.

उनकी प्रतिभा की तारीफ करने के लिए मेरे पास पर्याप्त शब्द नहीं हैं. हमने उनके साहस के कारण संतूर सुनना शुरू किया. इसे पहले एक लोक साज समझा जाता था. लेकिन शिवजी के संतूर वादन के बाद लोगों ने उसे एक शास्त्रीय वाद्ययंत्र के तौर पर पसंद करना और सम्मान देना शुरू किया.

हमारा पहला साझा एल्बम कॉल ऑफ द वैली 1967 में रिलीज हुआ. इस रिकॉर्ड की थीम-एक कश्मीरी गडरिए की जिंदगी का एक दिन—भी उन्होंने ही सुझाया था. वह एलबम बहुत लोकप्रिय हुआ और मैं 

समझता हूं कि यह उनकी लोकप्रियता ही थी, जिसके कारण दर्शकों के दिमाग में उनका संतूर और मेरी बांसुरी की अपनी अलग पहचान बनी. उस समय हम संगीत के शास्त्रीय कार्यक्रमों और फिल्मों में भी बजाया करते थे.

कुछ वर्षों बाद जब यश चोपड़ा ने हमसे अपनी फिल्मों में संगीत देने के लिए कहा तो हम दोनों ने ही इसे एक चुनौती के रूप में लिया. अब अगर कोई हमसे कुछ कह रहा था तो हमें कोशिश तो करनी ही थी. मेरे मन में यह ख्याल कभी नहीं आया कि इधर-उधर इतनी ओर भाग-दौड़ करनी पड़ रही है. लेकिन शिव-हरि ने जो किया उसे लोगों ने खूब सराहा.

हम दोनों में कुछ शौक एक-से थे. हम दोनों को खाने का बहुत शौक था, शाकाहारी-मांसाहारी दोनों. पर हमारे विचार एक जैसे नहीं थे. पर जब हम संगीत के बारे में कुछ सोचने बैठते थे तो हमारे बीच एक दुर्लभ तालमेल बन जाता था. मैं जो करता, उसे वे पसंद करते और वे जो कुछ करते, वह मुझे पसंद आ जाता. एक स्तर पर तो ऐसा लगता जैसे यह दो आत्माओं का मिलन हो.

इससे हममें आत्मविश्वास पैदा हुआ. अंत में मैं इतना ही कह सकता हूं कि उन्होंने संतूर के साथ जो संगीत दिया उसकी कोई मिसाल नहीं है. लोगों के मन में यह बात आ सकती है कि वे अब नहीं रहे तो संतूर खत्म हो जाएगा. यह तो ऐसा ही कहना हुआ कि शाहजहां के बिना ताजमहल को गिर जाना चाहिए था. भविष्य की पीढ़ियां, जिन्होंने उन्हें पसंद किया और उनका सहयोग दिया, वे निश्चित रूप से यह पक्का करेंगी कि संतूर आगे भी जिंदा रहे और समृद्ध हो, न केवल भारत में बल्कि पूरी दुनिया में.

(श्रीवत्स नेवटिया से बातचीत के आधार पर)

Read more!