कौन थीं रानी काम सुंदरी देवी जिन्होंने मिथिला की विरासत सहेजने में अपनी पूरी संपत्ति लगा दी?
राज दरभंगा की आखिरी रानी काम सुंदरी उर्फ कल्याणी का 12 जनवरी को तड़के तीन बजे निधन हो गया. उन्होंने कल्याणी फाउंडेशन की स्थापना की थी जो राज दरभंगा पर रिसर्च करने वालों के लिए जन्नत सरीखी जगह है

जब राज दरभंगा के आखिरी महाराजा कामेश्वर सिंह 54 साल की उम्र में गुजरे तो उनकी पत्नी रानी काम सुंदरी देवी सिर्फ 29 साल की थीं. राजा कामेश्वर सिंह ने अपनी मृत्यु से ठीक पहले अपनी तमाम संपत्ति का एक ट्रस्ट बना दिया था. वसीयत के मुताबिक कामेश्वर सिंह की बड़ी पत्नी राजलक्ष्मी और काम सुंदरी देवी के हिस्से एक-एक महल और पांच हजार रुपये प्रति माह की पेंशन ही आई. मगर विद्वानों के परिवार से आने वाली काम सुंदरी देवी ने 1988 में तय किया कि उनकी जो भी संपत्ति है, उसका इस्तेमाल मिथिला के सामाजिक-सांस्कृतिक इतिहास और धरोहर से जुड़े ज्ञान के संरक्षण में किया जाएगा.
इसके लिए काम सुंदरी देवी ने अपने तीस बीघा के आम के बगीचे को बेचकर एक कॉर्पस फंड तैयार किया और अपना छोटा सा महल, जो उनका इकलौता आवास था, इस काम के लिए दे दिया. ऐसा करके एक तरह से काम सुंदरी देवी ने अपने असली नाम - कल्याणी को पूरा निभा दिया. फिर वे ताउम्र इस काम में लगी रहीं. 12 जनवरी, 2026 को 93 साल की उम्र में उन्होंने आखिरी सांस ली.
दरभंगा शहर में घुसते वक्त विश्वविद्यालय परिसर से सटा है कल्याणी निवास जहां वे रहा करती थीं और इसी परिसर में आज भी महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह कल्याणी फाउंडेशन संचालित होता है. इस फाउंडेशन ने अब तक 27 महत्वपूर्ण पुस्तकों का प्रकाशन किया है और हर साल एक व्याख्यानमाला का आयोजन करता है. इस फाउंडेशन के पास राज दरभंगा से जुड़े कई बहुमूल्य दस्तावेज, 12-13 हजार से अधिक फोटोग्राफ और फिल्में संरक्षित हैं और यह जगह मिथिला से जुड़े विषयों पर शोध करने वालों के लिए जन्नत सरीखी है. इसे व्यवस्थित स्वरूप देने में प्रसिद्ध समाजशास्त्री प्रो. हेतुकर झा की अहम भूमिका रही है. वे रानी कल्याणी के बहन के बेटे थे.
हेतुकर झा के बेटे और दरभंगा राज से जुड़े विषयों पर पुस्तकें लिखने वाले तेजकर झा कहते हैं, “महारानी कल्याणी सौ से अधिक विधवा और परित्यक्ता महिलाओं की मदद किया करती थीं, उनके भोजन और उनके बच्चों की पढ़ाई का खर्च व्यक्तिगत तौर पर दिया करती थीं. कुछ मेधावी बच्चों को भी वे पढ़ने का खर्च देती थीं. वे कामेश्वर धार्मिक न्यास की भी इकलौती ट्रस्टी रही हैं. इस ट्रस्ट के अधीन 108 मंदिरों की देखरेख चलती है.”
रानी कल्याणी का जन्म 17 जून, 1932 को मधुबनी जिले के मंगरौनी गांव में हुआ था. पंडित हंसमणि झा उनके पिता थे. बताया जाता है कि उनका परिवार पढ़े-लिखे विद्वानों का था और उनकी सात पीढ़ियों में कुल 65 ऐसे विद्वान हुए जिन्हें महामहोपाध्याय की उपाधि मिली थी. छह मई, 1943 को उनका विवाह महाराज कामेश्वर सिंह से हुआ. वे उनकी तीसरी पत्नी थीं. अक्टूबर, 1962 में कामेश्वर सिंह का निधन हो गया. कल्याणी समेत उनकी तीनों पत्नियां निःसंतान थीं. कल्याणी के साथ उनकी बड़ी बहन रोहिणी के बेटे उदयनाथ झा रहते थे और आखिरी वक्त में उनकी देखरेख करते रहे. रानी ने उन्हें पावर ऑफ एटर्नी दी है..
हालांकि उदयनाथ झा की वजह से रानी कल्याणी के जीवन के आखिरी वर्ष विवादों में भी रहे. दरभंगा राज के पारिवारिक सदस्य कपिलेश्वर सिंह ने उदयनाथ पर आरोप लगाया था कि उन्होंने इस ट्रस्ट के सारे गहने बेच डाले हैं. कपिलेश्वर सिंह का आरोप था कि ट्रस्ट के पास जितने गहने होंगे उसकी कीमत कम से कम दो सौ करोड़ की होगी.
हालांकि दरभंगा पुलिस ने चार किलो सोना और 30 किलो चांदी के गहने बेचे जाने की बात मानी थी. ज्वेलर ने भी सोना खरीदे जाने की बात स्वीकार कर ली और कहा कि कुल गहने सिर्फ 86 लाख के थे. गहने गला दिए गए थे और वे उसका पेमेंट चेक से करने वाले थे. पहले तो पुलिस ने एटॉर्नी उदयनाथ झा, ट्रस्ट के मैनेजर और ज्वेलर को हिरासत में लिया, फिर पीआर बांड पर छोड़ दिया.
(राज दरभंगा के संपत्ति से जुड़े विवादों पर इंडिया टुडे ने उस वक्त विस्तार से स्टोरी की थी - राज दरभंगा की कहानी, जिसे ट्रस्टियों ने ही किया तबाह)
इसके बाद कपिलेश्वर सिंह ने यह आरोप भी लगाए कि उदयनाथ रानी कल्याणी को किसी से मिलने नहीं देते थे. अब माना जा रहा है उनके निधन के बाद कामेश्वर धार्मिक न्यास और कल्याणी फाउंडेशन दोनों की देखरेख कपिलेश्वर सिंह ही करेंगे.