क्या है वजन बढ़ने का मनोविज्ञान?
खान-पान की बुरी आदतों वाले लोगों से घिरा रहना मोटापे के प्रति आपकी सोच पर असर डालता है

लोग अमूमन यह मानते हैं कि वजन बढ़ना एक निजी मसला है, जिसमें हम कितनी कैलोरी खा रहे हैं, कितने कदम चल रहे और कितनी इच्छाशक्ति रखते हैं, इन बातों की अहम भूमिका होती है. लेकिन मानव व्यवहार कई चीजों से तय होता है, यह अलग-थलग नहीं बनता.
खानपान और स्वाथ्य से जुड़ी हमारी आदतों पर हमारे आसपास के माहौल का गहरा प्रभाव होता है. सैफी अस्पताल में चेस्ट फिजिशियन के तौर पर काम कर रहे डॉ. सुलेमान लधानी मानते हैं कि इंसानी रहन-सहन, दरअसल, संक्रामक होता है.
सामाजिक पहलुओं का वजन और स्वास्थ्य चुनावों पर असर
निकोलस क्रिस्टकिस और जेम्स फाउलर के शोध, 'द फ्रैमिंगम हार्ट स्टडी' से पता चलता है कि मोटापा हमारे सोशल नेटवर्क की वजह से भी फैलता है. यह रिसर्च दावा करती है कि अगर किसी का सबसे करीबी दोस्त ओबीस ( अत्यधिक मोटापे से ग्रस्त) है, तो उसके खुद मोटे होने की संभावना 57 फीसदी बढ़ जाती है. हालांकि यह बायोलॉजिकल नहीं होता. यानी सीधे तौर पर किसी दोस्त का मोटा होना हमें मोटा नहीं करता. मगर किसी ओबीस व्यक्ति के करीब रहने पर किसी इंसान के दिमाग में 'नॉर्मल' बॉडी की धारणा बदल जाती है. यानी अतिरिक्त वजन होना उन्हें खतरे की घंटी नहीं जान पड़ता.
रोजमर्रा के जीवन में इस बात को देख पाना मुश्किल नहीं. मसलन, दफ्तरों के कल्चर को ही ले लीजिए. टीम के साथ खाना खाना, आए दिन किसी के बर्थडे पर केक मंगवाना, या ब्रेक लेने के बहाने कई राउंड चीनी वाली चाय या कॉफ़ी पी लेना आम है. समोसे से शैदाइयों के बीच अपने लिए सलाद मंगवाने की कोशिश कर रहा व्यक्ति कुछ अलग-थलग पड़ जाता है. ऐसे में हेल्दी लाइफस्टाइल अपनाने की उसकी इच्छाशक्ति जाती रहती है.
इसका एक मनोवैज्ञानिक पहलू भी है. इंसान आमतौर पर वही करता है जो उसके आस-पास के लोग करते हैं. अगर आपके दोस्तों को कई किलोमीटर चलने के बजाय कई घंटों तक खाना पसंद है, तो इस रस्साकशी में उनकी जीत होना लाजिमी है. इसी तरह, अगर आस-पास के लोगों में एक्सरसाइज को लेकर कोई उत्साह या चेतना नहीं है तो वही हमारा 'डिफ़ॉल्ट' व्यवहार बन जाता है. मानव बर्ताव पर हुए शोध से मालूम पड़ता है कि आसपास के माहौल का असर खाने की आदतों से लेकर शराब पीने और शारीरिक व्यायाम तक पर पड़ता है.
एक बात जिसपर कम ध्यान जाता है, वह है धारणा. जैसे-जैसे वैश्विक स्तर पर मोटापा बढ़ता जाता है, लोग इसे समस्या मानना कम करते जाते हैं. 'ओबेसिटी' नाम के जर्नल में छपी एक स्टडी के मुताबिक़, अगर हमारे आस-पास अधिक लोग मोटे हों, तो वे अपने बढ़ते वजन को 'ओवरवेट' की केटेगरी में नहीं रखते हैं.
जब सामाजिक प्रभाव सकारात्मक हो
रनर, साइकलिस्ट या हाइकर दोस्तों के साथ बिताने पर एक अदद 'वॉक' के लिए जाना इतना मुश्किल नहीं लगता. बल्कि मुमकिन है कि टहलने में आपको आनंद आने लगे. समाज का प्रभाव दोनों तरीकों से काम करता है. हेल्दी रहने की लत एक से दूसरे को लगती है. कई स्टडीज बताती हैं कि ग्रुप एक्सरसाइज प्रोग्राम्स में हिस्सा लेने वाले लंबे वक़्त तक इस आदत को कायम रख पाते हैं और उनके बेहतर नतीजे मिलते हैं.
हालांकि इसका यह मतलब नहीं कि हमारे पेट पर जमा चर्बी के दोषी हमारे दोस्त हैं. बल्कि यह स्वीकार करना है कि संगत का असर तगड़ा होता है. प्रेरणा महज अनुशासन से नहीं आती, बल्कि सामाजिक पहलुओं से भी प्रभावित होती है. अपने आस-पास एक स्वस्थ माहौल बनाना, चाय-समोसे पर चर्चा के बजाय 'वॉकिंग मीटिंग' करना, अपने साथियों के साथ हेल्दी खाना शेयर करना या एक ऐसा दोस्त बनाना जो शाम को आपके साथ टहलने जा सके, आपकी सेहत में चार चांद लगा सकता है. अगर दोस्तों से स्वास्थ्य ख़राब करने वाली आदतें लग सकती हैं, तो अच्छा करने वाली भी लग सकती हैं. इसकी चाबी इच्छाशक्ति में नहीं, संगत में है.