इंडिया टुडे आर्काइव : प्राण सुखा देने वाला किरदार
हिंदी फिल्मों के कालजयी विलेन प्राण कृष्ण सिकंद का 12 फरवरी को जन्मदिन है

(मधु जैन का यह आलेख 1 मई, 2013 के अंक में प्रकाशित हुआ था)
इसे अफसोसनाक ही कहेंगे कि 1950 के दशक और उसके बाद भी हिंदी सिनेमा को सुनहरे दौर में ले जाने वाली तिकड़ी में प्राण साहब को शुमार नहीं किया गया. बिग थ्री- दिलीप कुमार, राज कपूर और देव आनंद- को असल में बिग फोर होना चाहिए था. सशक्त चरित्र अभिनेता प्राण ने अनगिनत फिल्मों में काम किया, खासकर पुराने जमाने के मशहूर सितारों के साथ.
इनमें से ज्यादातर फिल्मों ने धमाकेदार प्रदर्शन किया और वजह रही उनकी वह बेमिसाल अदाकारी, जिसने लोगों के मन में उनकी खास छाप बनाई. जिद्दी, मुनीमजी, देवदास, मधुमती, राम और श्याम और जिस देश में गंगा बहती है जैसी फिल्मों में उन्होंने विलेन की जबरदस्त भूमिका निभाई थी. अगर बहुमुखी प्रतिभा के धनी प्राण इन फिल्मों में नहीं होते तो शायद वे वैसा अमिट प्रभाव नहीं छोड़ पातीं. विलेन की बदनीयती को जीवंत करने का उनका बेमिसाल अंदाज हीरो को बिना किसी मेहनत शराफत का देवता बना देता थी.
पद्मभूषण से सम्मानित 93 वर्षीय प्राण कृष्ण सिकंद को 2012 के लिए 44वां दादा साहब फाल्के पुरस्कार से नवाजा गया. इस घोषणा को सबने सराहा, लेकिन अफसोस भी जताया कि उन्हें भारतीय फिल्म उद्योग का सबसे प्रतिष्ठित सम्मान बहुत देर से मिला. विडंबना है कि इनमें से ज्यादातर पुरस्कार अभिनेताओं को उनके जीवन के ढलते दौर में ही मिलते रहे हैं.
उनका नाम भारतीय सिनेमा में विलेन का पर्याय रहा, शायद यही बात उनके हिस्से आने वाले इस सम्मान के लिए अड़ंगा बन गई हो. हालांकि अपने छह दशक के लंबे करियर के दौरान उन्होंने लगभग 400 फिल्मों में काम किया, उनमें से ज्यादातर में उनका रोल पॉजिटिव रहा. हकीकत यह है कि अभिनय में पुरस्कार की बारी आती है तो नायक, नायिकाएं और अच्छे किरदार निभाने वाले, विलेन और कैरेक्टर ऐक्टर से बाजी मार ले जाते हैं, चाहे उनका अभिनय कौशल कितना ही सशक्त क्यों न हो.
प्राण ने परदे पर बतौर विलेन इतिहास रच डाला: उन्हें ‘विलेन ऑफ द मिलेनियम’ कहा गया. दर्शकों को उन्होंने किस कदर थर्रा रखा था इसका अंदाजा उनसे जुड़ी मनगढ़ंत कहानियों से लगाया जा सकता है. जब प्राण चाय के लिए आमंत्रित किए जाते तो महिलाओं को ड्राइंग रूम से हटा दिया जाताः स्क्रीन और वास्तविक जीवन के बीच एक झीना-सा परदा था. फिर वही दिल लाया हूं की शूटिंग के दौरान मरहूम डायरेक्टर नासिर हुसैन ने प्राण को शोर मचा रही भीड़ को शांत करने के लिए कहा. प्राण के नजर डालने भर की देरी थी, एकदम खामोशी छा गई. लगभग दो दशक तक लोग अपने बच्चों का नाम प्राण रखने से परहेज करते रहे क्योंकि मां-बाप के लिए यह बच्चे को रावण या शैतान का नाम देने जैसा था.
अभिनय के क्षेत्र में पदार्पण महज संयोग था. वे बचपन में प्रोफेशनल फोटोग्राफर बनना चाहते थे. 12 फरवरी, 1920 को दिल्ली के बल्लीमारान में जन्मे प्राण ने उत्तर भारत के विभिन्न स्कूलों में पढ़ाई की और फिर लाहौर चले गए. उनके पिता केवल कृष्ण सिकंद सरकारी सिविल कॉन्ट्रैक्टर थे. प्राण ने स्कूल की पढ़ाई पूरी नहीं की और लाहौर में एक दुकान में काम करने लगे. वे अकसर एक पान की दुकान पर खड़े रहते. वहीं स्क्रीन राइटर वली मोहम्मद वली ने उन्हें देखा. निर्माता और स्टुडियो मालिक दलसुख पंचोली 1939 में यमला जट नामक पंजाबी फिल्म बना रहे थे जिसमें विलेन की जरूरत थी. इस तरह 19 साल की उम्र में प्राण अनिच्छा से फिल्म में काम करने के लिए तैयार हो गए. हालांकि करियर के तौर पर अभिनेता बनना शायद ही उनके मन में आया होगा, पर संयोग से वे मंच पर अभिनय कर चुके थे. विडंबना यह कि उनका पहला रोल शिमला में हुई रामलीला में सीता का था. ए. दास ऐंड कंपनी में फोटोग्राफी एप्रेंटिस के तौर पर काम करने के दौरान उन्होंने यह रोल किया था.
प्राण ने 1939 में राज कपूर, देव और दिलीप कुमार से भी पहले फिल्म इंडस्ट्री में कदम रखा था और इन महानायकों के दौर के फीके पड़ने के बाद भी प्राण लंबे समय तक ऊंची फीस लेने वाले कैरेक्टर ऐक्टर बने रहे. उन्होंने कपूर खानदान की चारों पीढ़ी के साथ काम किया है- पृथ्वी राज कपूर से लेकर उनके तीनों बेटों (राज, शम्मी और शशि) राज कपूर के तीन बेटों (रणधीर, ऋषि और राजीव) और रणधीर कपूर की बेटी करिश्मा कपूर तक. दिलचस्प है कि 1970 का दशक ऐसा दौर था जब कैरेक्टर ऐक्टर के रूप में उनकी ऐसी जबरदस्त मांग थी कि उन्हें अमिताभ बच्चन, विनोद खन्ना, शत्रुघ्न सिन्हा और ऋषि कपूर से भी अधिक फीस मिलती थी. 1980 के दशक में सिर्फ राजेश खन्ना की फीस उनसे ज्यादा रही.
विभाजन के तुरंत बाद मुंबई आने पर उनकी शुरुआत थोड़ी धीमी थी, जबकि उस समय तक वे लाहौर में कई फिल्मों में काम कर चुके थे. मशहूर गायिका-अभिनेत्री नूरजहां के साथ 1942 में उन्होंने खानदान में बतौर हीरो काम किया था. यह नूरजहां की पहली फिल्म थी और वे सिर्फ 13 साल की थीं. प्राण ने सीमा पार इस नई जगह में भी विलेन के किरदार को ही गले लगाया. लेखक सआदत हसन मंटो और उनके दोस्त अभिनेता श्याम ने 1948 की फिल्म जिद्दी में उन्हें रोल दिलवाया था. शाहिद लतीफ की इस फिल्म में देव आनंद और कामिनी कौशल मेन रोल में थे.
फिर ऐसा दौर चला जिसमें उनके हिस्से सिर्फ विलेन के रोल ही आते रहे. 1967 में ऐक्टर-डायरेक्टर मनोज कुमार ने उन्हें अपनी फिल्म उपकार में मददगार शख्स मंगल का रोल दिया जो यादगार बन गया. उन पर फिल्म का बेहतरीन गाना कसमे-वादे प्यार वफा फिल्माया गया जो आज भी कानों में रस घोल देता है. लोगों ने उन्हें मंगल चाचा कहना शुरू कर दिया था. उपकार के साथ प्राण के करियर में अहम मोड़ आया और उन्हें कई फिल्मों में हीरो की भूमिका पेश की जाने लगी, लेकिन वे इन्हें निभाने के लिए खुद को सहज नहीं महसूस करते थे, क्योंकि वे उन हीरो की खेप में शामिल नहीं होना चाहते थे जो, “..हीरोइनों के साथ पेड़ों के इर्द-गिर्द गाने गाएं.” वैसे उन पर कई गाने फिल्माए गए, जंजीर में यारी है ईमान मेरा और धर्मा में राज की बात.
अमिताभ बच्चन को पहचान दिलाने वाली फिल्म जंजीर में काम करने के बाद प्राण ने बिग बी के साथ करीब दर्जनभर फिल्में कीं. जाहिर है, इस वरिष्ठ अभिनेता ने उन्हें रोल दिलवाने में कुछ न कुछ भूमिका तो निभाई ही थी. निस्संदेह, सोने से दिल और मेहंदी रंगे बालों वाले पठान के रूप में प्राण ने इस फिल्म की सफलता में चार चांद लगा दिए थे. उनकी कई फिल्मों ने बॉक्स ऑफिस पर अच्छा प्रदर्शन किया. उनकी यादगार फिल्मों में चोरी चोरी, हलाकू, तुमसा नहीं देखा, मधुमती, जिस देश में गंगा बहती है, कश्मीर की कली, शहीद, खानदान, मिलन, उपकार, राम और श्याम, ब्रह्मचारी, नन्हा फरिश्ता, जॉनी मेरा नाम, पूरब और पश्चिम, परिचय, जंजीर, विक्टोरिया नंबर 203, बॉबी, धर्मा, मजबूर, धरमवीर, अमर अकबर एंथनी, शराबी, डॉन और कर्ज शामिल हैं.
प्राण ने कुछ साल से अभिनय छोड़ दिया था. लेकिन वे अब भी अपनी शातिर छवि और अंदाज के लिए याद किए जाते हैं. वे एक लेखक की कल्पना से साकार हुए पात्र थे जिन्होंने उन किरदारों के वजूद में खुद को ऐसा ढाला कि उसे ही अपनी पहचान बना लिया. अधिकांश हिंदी फिल्मों में विलेन एकआयामी किरदार होता है. प्राण ने विलेन के रोल में एक खास जटिलता और कभी-कभी हास्य पिरोकर कालजयी भूमिकाएं की हैं. उन्होंने अखबारों की कतरनें इकट्टी कर रखीं थीं जिसमें से वे विविध हेयरस्टाइल, मूंछों और हाव-भाव को अपने अभिनय में पिरो सकते थे. परदे की अपनी ज्यादातर ‘वेशभूषा’ को उन्होंने खुद अपनी कल्पना से साकार किया और अपने विगमेकर और मेकअप मैन को बताया.
प्राण अपने आसपास के लोगों को भी बड़ी बारीकी से पढ़ा करते और उनके अंदाज, इशारों और कभी-कभी डायलॉग्स को भी विभिन्न भूमिका निभाते समय अपना लेते जिससे किरदार जीवंत हो जाए. मिसाल के तौर पर उनके एक परिचित के चाचा कहा करतेः क्यों ठीक है ना ठीक? प्राण ने न सिर्फ इस लाइन को उठाया, बल्कि इसके पहले की जाने वाली उनकी हरकत की भी नकल कीः सिगरेट का एक कश लेने के बाद वे धुएं का छल्ला छोड़ते जो उनकी पहचान बन गया. इस महान अभिनेता ने सबसे पहले 1949 में बनी बड़ी बहन में इस अंदाज को पेश किया था. आपने आम तौर पर उनकी कई फिल्मों में उनके मुंह के कोने से झूल रही सिगरेट या बीड़ी देखी होगी जबकि सिगार और पाइप पीने का उनका अंदाज भी काबिले गौर था.
ऐसे कई अंदाज और हाव-भाव हैं जिनसे प्राण ने अपनी अलग पहचान कायम की थी और बाद में कई अभिनेताओं ने उनकी नकल भी की. जिस देश में गंगा बहती है में राका के रूप में उन्होंने ऐसी बेहतरीन खलनायकी पेश की कि राज कपूर पर भी भारी रहेः उनकी चाल और चबा-चबाकर कहे गए बोल, बार-बार अपनी उंगलियों को अपने गले पर फिराना, मानो आने वाले समय में छिपी नियति की ओर इशारा हो. वास्तव में, उनकी लाइन ‘तेरा बाप राका’ दर्शकों की जुबान पर भी बैठ गई थी. उनके अनगिनत अंदाजों में कुछ बेहद खास थेः सिक्का उछालकर हाथ के ऊपर गिराना, (कब, क्यों और कहां); पान पर चूना और कत्था लगाने के लिए उंगलियों का इस्तेमाल (अधिकार); सिगार को बांसुरी बजाने के अंदाज में पीना (दस लाख).
प्राण के वे बोल और अंदाज जो दर्शकों के मन में हमेशा बसे रहेंगेः शता ले, शता ले, शंपा मेरा भी शमय आएगा (कश्मीर की कली); भारत, तू दुनिया की छोड़! पहले अपनी सोच! राम ने हर युग में जन्म लिया है, लेकिन लक्ष्मण जैसा भाई दोबारा नहीं पैदा हुआ! (उपकार); आज की दुनिया में अगर जिंदा रहना है... तो दुनिया के बटन अपने हाथ में रखने पड़ते हैं (शराबी).
यकीनन, प्राण, हिंदी सिनेमा के महान विलेन थे. उनकी शख्सियत दहशत पैदा करती, उनकी छवि, निगाहों से बयां होती दुष्टता, आग उगलती नजरें- दर्शकों के रोंगटे खड़े कर देती.
कोई हैरत नहीं कि प्राण का नाम परदे पर क्रेडिट्स के नीचे ‘और प्राण’ के रूप में लिखा आता. कभी-कभी यह उनके पहले भी लिखा होता. आखिर किस चीज ने उन्हें बेताज विलेन बनाया? मैं इसका श्रेय परदे से झलकते उनके शातिर अंदाज और आग उगलती आंखों को दूंगी जिसकी आंच में दर्शकों की दिलेरी भस्म हो जाती और सब बस कांपते रह जाते.
(मधु जैन आइक्यूः द इंडिया क्वार्टरली की एडिटर हैं)