सेक्स और रिलेशनशिप : क्या है सहमति की ताकत, अब एक स्टडी से पता चला

‘साइंटिफिक रिपोर्ट्स’ में प्रकाशित एक स्टडी बताती है कि दुनिया का कोई भी हिस्सा क्यों न हो, सेक्स और रिश्तों की मजबूती के लिए सहमति सबसे ज्यादा मायने रखती है

After a breakup, marriage can feel like a quick fix for lost security | Photo: Pexels/Jasmine Carter
सांकेतिक तस्वीर

जर्नल Scientific Reports में हाल में छपी एक अंतरराष्ट्रीय स्टडी बताती है कि लोग अपने संभावित पार्टनर का मूल्यांकन सिर्फ इस आधार पर नहीं करते कि पिछले सेक्सुअल पार्टनर की संख्या कितनी थी, बल्कि ये भी देखते हैं कि समय के साथ अनुभव में कितना बदलाव आया है. 11 देशों और पांच महाद्वीपों के 5,000 से ज्यादा लोगों की भागीदारी वाले इस अध्ययन से पता चलता है कि सेक्सुअल हिस्ट्री और बदलते व्यवहार रिश्तों में स्थिरता, प्रतिबद्धता और भरोसे की सोच को कैसे प्रभावित करते हैं.

इस अध्ययन, जिसका शीर्षक ‘Sexual partner number and distribution over time affect long-term partner evaluation’ है, में पाया गया है कि लोग आमतौर पर रिश्तों को तब ज्यादा समय तक टिके रहने वाला मानते हैं जब पार्टनर के पिछले सेक्सुअल संबंध जिंदगी के शुरुआती दौर में भले ज्यादा रहे हों लेकिन समय के साथ इनकी संख्या घटी हो. कुछ लोगों की नजर इस तरह का अनुभव मैच्योरिटी या भावनात्मक स्थिरता का संकेत है. इसके उलट, हालिया वर्षों में नए सेक्सुअल पार्टनर की बढ़ती संख्या का मतलब यह माना जाता है कि उसमें लंबे समय तक रिश्तों में बने रहने की कोई इच्छा नहीं है.

स्टडी के लेखकों का मानना है कि यह पैटर्न सूक्ष्म संज्ञानात्मक मूल्यांकनों को दर्शाता है, जिसे आसानी से किसी दायरे में नहीं बांधा जा सकता- लोग इस पर गंभीरता से ध्यान देते हैं कि समय के साथ रिश्तों को लेकर किसी व्यक्ति के व्यवहार में कैसे बदलाव आया. ये रुझान विभिन्न सांस्कृतिक परिवेशों और सभी जेंडर में समान रूप से नजर आते हैं. इससे पता चलता है कि साथी के चयन में एक सामान्य मनोविज्ञान काम करता है. लेकिन अकादमिक विश्लेषणों से परे यौन संबंध और सहमति की भावनात्मक सच्चाई से ही यह तय होता है कि लोग अपने अतीत के अनुभवों को वर्तमान रिश्तों में कैसे संभालते हैं.

मुंबई में रहने वाली डेटिंग कोच पूजा पटेल बताती हैं कि यह अध्ययन एक व्यापक मुद्दे को उजागर करता है. पटेल कहती हैं, “बहुत से लोगों को महसूस होता है कि उन्हें न केवल इस बात से आंका जाता है कि उनके कितने साथी रहे हैं बल्कि यह भी देखा जाता है कि वे उन साथियों तक कैसे पहुंचे. मेरे कई क्लाइंट खुद को स्वीकारे या पसंद किए जाने के लिए पार्टनर की खुशी देखने या सेक्स के लिए राजी होने का अत्यधिक दबाव महसूस करते हैं. जबकि सही मायने में देखा जाए तो सच्चे रिश्तों में कभी भी इसकी जरूरत नहीं होनी चाहिए.”

कई महिलाओं के लिए सहमति और दबाव से जुड़े मुद्दे बेहद निजी होते हैं. 36 वर्षीय अनन्या (बदला हुआ नाम) बताती हैं, “मैंने उनकी बात मान ली क्योंकि मुझे डर था कि अगर मैंने मना कर दिया तो वो मेरे साथ नहीं रहेंगे.” इसके भावनात्मक असर के बारे में अनन्या का कहती है, “उस समय मुझे लगा कि मैं रिश्ते को बचा रही हूं. लेकिन बाद में एहसास हुआ कि मैंने अपने खुद के उस हिस्से को गंवा दिया जो कभी खोना नहीं चाहती थी. इसने मुझे सालों तक अंतरंग संबंध बनाने को लेकर असहज कर दिया.”

दूसरी तरफ, एक अन्य महिला 34 वर्षीय मीरा (बदला नाम) ने ऐसी ही स्थिति में एक अलग रास्ता अपनाया. वे बताती हैं, “जब उसने मेरी ‘ना’ को नजरअंदाज करने की कोशिश की तो मैंने उसे रोक दिया. मैंने उससे कहा कि इसमें कतई सहज नहीं हूं और इस पर कोई समझौता नहीं कर सकती. पहले तो मुझे थोड़ा डर लगा लेकिन एहसास हुआ कि अपनी सीमाओं के लिए खड़ा होना सम्मान पर आधारित रिश्ते की नींव रखने का पहला कदम है. इस फैसले ने मेरे लिए सब कुछ बदल दिया.”

विशेषज्ञों का कहना है कि ये कहानियां समाज में आ रहे एक बड़े बदलाव को दिखाती हैं. अब लोग सिर्फ पार्टनर के पुराने रिश्तों की संख्या नहीं देखते बल्कि यह भी देखते हैं कि उन रिश्तों में आपसी सहमति, बराबरी और अपनी मर्जी का कितना सम्मान है. डेटिंग कोच पूजा पटेल कहती हैं, “एक अच्छे पार्टनर को चुनने के लिए ‘भावनात्मक सुरक्षा’ की भावना को अहमियत दी ही जानी चाहिए, क्योंकि सेक्सुअल हिस्ट्री सिर्फ आंकड़े तक सीमित नहीं बल्कि ये इंसान के असल अनुभव से जुड़ी होती है.”

पटेल आगे कहती हैं कि उनके क्लाइंट ऐसे रिश्ते तलाशते हैं जहां सहमति और एक-दूसरे की भावनाओं का सम्मान करना सिर्फ कोई विकल्प न हो बल्कि यही उनके संबंधों की बुनियाद हो. यह अध्ययन इस जटिल विषय में एक महत्वपूर्ण कड़ी जोड़ता है कि कागज पर लिखे पुराने रिश्तों के आंकड़े असल इंसानी जिंदगी, उनकी पसंद और उनके दबावों से गहराई से जुड़े होते हैं.

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