कोरोना ने हमारे दिमागों पर क्या असर डाला? सरकार के इस सर्वे से पता चलेगा
मानसिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NMHS) का नया चरण सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को कवर करेगा, ताकि कोविड के लंबे मनोवैज्ञानिक प्रभावों के बीच नीति और सेवाओं को दिशा दी जा सके

करीब एक दशक बाद भारत ने अपना राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NMHS) फिर से शुरू किया है. इस बार इसे और विस्तृत किया गया है और कोरोना महामारी इससे एक बड़े सवाल का जवाब भी मिलेगा : कोविड-19 ने हमारे मन, ऐसी चुनौतियों का सामना करने की हमारी क्षमताओं (कोपिंग) और हमारी देखभाल प्रणालियों में क्या बदला?
एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, नौ साल के अंतराल के बाद यह सर्वे फिर शुरू किया गया है और पहली बार इसमें सभी राज्य और केंद्रशासित प्रदेश शामिल होंगे ताकि कोविड के लंबे मनोवैज्ञानिक असर के बीच नीति और सेवाओं में सुधार के लिए जरूरी जानकारी मिल सके.
भारत का मानसिक स्वास्थ्य परिदृश्य कई ‘ज्ञात-अज्ञातों’ से भरा है: कितने लोगों को मदद की ज़रूरत है, वे कहां रहते हैं, वे सबसे पहले किस तरह की मदद तलाशते हैं (डॉक्टर, आस्था-आधारित उपचारक जैसे ओझा, गुनिया, केमिस्ट या कोई नहीं), और देखभाल पाने में उन्हें कितना समय लगता है. सर्वे का नया चरण, NMHS-2, कहीं बड़े पैमाने पर डिज़ाइन किया गया है (एक प्रकाशित प्रोटोकॉल के अनुसार 2024-2026 के बीच 2,25,000 से अधिक व्यक्तिगत आकलन की योजना है), जो देशभर में जमीनी स्तर के ऐसे आंकड़े उपलब्ध करा सकता है जिनकी तुलना की जा सके.
पिछला सर्वे NMHS (2015-16) राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य एवं तंत्रिका विज्ञान संस्थान (NIMHANS) की अगुआई में किया गया था. इसमें दो अहम जानकारियां सामने आईं जो आज भी चुभती हैं. पहली, मानसिक बीमारी दुर्लभ नहीं है : सरकारी निष्कर्षों के अनुसार वयस्कों में वर्तमान प्रसार 10.6 फीसदी और आजीवन प्रसार 13.7 फीसदी है. इसका मतलब यह कि करोड़ों लोगों ने किसी न किसी समय ऐसी मानसिक समस्या का अनुभव किया है जिसे पहचाने जाने और इलाज की जरूरत थी. इसके अलावा असली संकट केवल प्रसार नहीं था; बल्कि ‘केयर गैप’ था. NMHS निष्कर्षों के विश्लेषण में विभिन्न मानसिक विकारों में उपचार अंतर 70 फीसदी से 92 फीसदी तक बताया गया (उदाहरण के लिए, सामान्य मानसिक विकारों में 85 फीसदी से अधिक). सरल शब्दों में कहें तो जिन्हें पुख्ता देखभाल की ज़रूरत थी, उनमें से अधिकांश को वह मिल नहीं रही थी.
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि NMHS-2 यह दिखा सके कि महामारी ने चिंता, डिप्रेशन, ड्रग्स का इस्तेमाल, नींद की समस्याएं, दुख और बर्नआउट को कैसे बदला, तो रिसोर्सेज की तैनाती जिलों के हिसाब से बदल सकती है. अगर कुछ ज़िलों में डिप्रेशन या शराब-निर्भरता में बढ़ोतरी दिखती है, तो राज्य वहां मनोचिकित्सक, क्लिनिकल मनोवैज्ञानिक, मनोरोग सामाजिक कार्यकर्ता और काउंसलर तैनात कर सकते हैं- और जहां विशेषज्ञ कम हैं, वहां प्राइमरी केयर के डॉक्टरों को प्रशिक्षित कर सकते हैं.
अगर सर्वे में देखभाल तक पहुंच में अधिक देरी या अनौपचारिक रास्तों पर भारी निर्भरता सामने आती है, तो केवल अस्पताल-आधारित मनोचिकित्सा के बजाय चरणबद्ध देखभाल, सामुदायिक काउंसलिंग और टेली-सपोर्ट मॉडलों की जरूरत को बल मिलेगा. इसके अलावा इलाज में अंतर से वित्त विभागों को भी एक अंदाजा मिलेगा कि कितने लोग बिना इलाज के हैं और उस अंतर को पाटने में कितनी लागत आएगी?
आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, 2023 में भारत में 1,71,418 आत्महत्याएं दर्ज की गईं. एक राष्ट्रीय सर्वे हर त्रासदी को नहीं रोक सकता, लेकिन यह नीति-निर्माताओं को बता सकता है कि समस्या कहां सबसे ज्यादा है. किशोर बनाम कामकाजी वयस्क, ग्रामीण बनाम शहरी या फिर महिलाएं बनाम पुरुष. और यह भी पता चल सकता कि मानसिक समस्याओं की वजह क्या है. नौकरी जाने का तनाव, सामाजिक जिम्मेदारियां, कोई लंबी बीमारी या अकेलापन.
NMHS-2 का वादा केवल एक बड़ा डेटासेट नहीं है. यह कोविड के बाद “सब तनाव में हैं” वाली बातचीत को एक मानचित्र में बदलने का अवसर है. यह बताएगा कि कौन संघर्ष कर रहा है, कितनी गंभीरता से, और किस तरह की देखभाल वास्तव में उस तक पहुंच पाएगी.