मेलोडी का जादू : जब एक सवाल ने भारत में इस टॉफी को बना दिया था कल्ट ब्रांड

इटली की पीएम जॉर्जिया मेलोनी से मुलाकात के दौरान पीएम मोदी का दिया ‘मेलोडी’ गिफ्ट 90 के दशक की यादें ताजा कर गया

PM Modi gifts Melody toffees to Giorgia Meloni during Rome meeting
पीएम मोदी ने इटली की प्रधानमंत्री को दिया मेलोडी का पैकेट

इस समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी से हुई एक मुलाकात सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बनी हुई है. इस दौरान हुई एक छोटी सी घटना ने अचानक भारत के करोड़ों लोगों को अपने बचपन की तरफ लौटा दिया. पीएम मोदी ने मुलाकात के दौरान जॉर्जिया मेलोनी को एक छोटा सा गिफ्ट दिया. यह गिफ्ट थ- ‘पारले मेलोडी’ टॉफी का पैकेट. वही सुनहरे रैपर वाली मेलोडी जिसे कभी भारत के हर मोहल्ले की दुकान पर बच्चे एक-दो रुपए बचाकर खरीदते थे.

कुछ ही देर बाद मेलोनी ने इसका वीडियो इंस्टाग्राम पर साझा किया. वीडियो में दोनों नेता हाथ में मेलोडी का पैकेट पकड़े दिखाई देते हैं. इस वीडियो के वायरल होते ही भारत में लोगों को सिर्फ एक टॉफी याद नहीं आई. लोगों को याद आया वह सवाल जिसने संसद से सड़क तक कभी पूरे देश को घेर लिया था - “मेलोडी इतनी चॉकलेटी क्यों है?”

लेकिन इस सवाल के पीछे एक कहानी है और यही कहानी बताती है कि कैसे अगर सही मार्केटिंग की जाए तो एक प्रोडक्ट भारत में बचपन की आवाज भी बन सकता है. 

क्या है मेलोडी की कहानी

1980 का भारत आज जैसा ब्रांड ड्रिवेन और विज्ञापनों से भरा हुआ भारत नहीं था. उस दौर में मोहल्ले की छोटी दुकानों पर रखी कांच की बरनियों में बच्चों की दुनिया बसती थी. संतरे वाली गोलियां, कॉफी बाइट, किस्मी, पॉपिन्स और कुछ सस्ती मीठी टॉफियां. स्वाद सीधा और बाजार छोटा. कंपनियां बहुत संभलकर प्रयोग करती थीं. किसी भी नए स्वाद को लेकर डर बना रहता था क्योंकि भारतीय ग्राहक अपनी जीभ से समझौता जल्दी नहीं करता था.
इसी दौर में पारले ने एक ऐसा प्रयोग किया जिसे शुरुआत में उसकी सबसे बड़ी नाकामी माना गया. कंपनी ने एक नई टॉफी बाजार में उतारी. नाम था - मेलोडी.

पारले को लगा था कि भारत का स्वाद धीरे-धीरे बदल रहा है. शहरों में पश्चिमी प्रभाव बढ़ रहा था. बच्चे अब सिर्फ मीठी टॉफियां नहीं कुछ अलग और 'चॉकलेटी' स्वाद भी चाहते हैं. इसी सोच के साथ कंपनी ने यूरोपीय टेस्ट पैलेट से प्रेरित एक कैंडी तैयार की. बाहर से टॉफी, भीतर से चॉकलेट. पारले को उम्मीद थी कि मेलोडी बाजार में नई सनसनी बनेगी.

लेकिन बाजार ने उसे लगभग ठुकरा दिया

दुकानदार शिकायत करने लगे कि बच्चे एक बार खरीदते हैं लेकिन दोबारा मांगते नहीं. गांव-कस्बों में लोग समझ ही नहीं पा रहे थे कि आखिर ये टॉफी है या चॉकलेट. भारतीय स्वाद उस समय ज्यादा सीधी मिठास का आदी था. मेलोडी का स्वाद उनके लिए कुछ अलग और 'बहुत ज्यादा चॉकलेटी' था. कंपनी के भीतर तक यह चर्चा शुरू हो गई कि शायद भारतीय बाजार अभी इस तरह के स्वाद के लिए तैयार नहीं है.

असल मुश्किल सिर्फ स्वाद की नहीं थी. समस्या यह थी कि मेलोडी के पास अपनी कोई पहचान नहीं थी. उस दौर के अधिकतर विज्ञापन बेहद सीधे होते थे. कोई बच्चा टॉफी खाकर खुश हो रहा है, कोई स्कूल जा रहा है, कोई मां बच्चे को मिठाई दे रही है. विज्ञापन सिर्फ जानकारी देते थे, जिज्ञासा पैदा नहीं करते थे.

और फिर एंट्री हुई एवरेस्ट ऐड एजेंसी की

पारले चाहता था कि लोग समझें कि मेलोडी दूसरी टॉफियों से ज्यादा चॉकलेटी है. लेकिन दिक्कत ये थी कि बिना किसी दूसरे ब्रांड का नाम लिए यह बात लोगों तक कैसे पहुंचाई जाए. एजेंसी में काम कर रहे हरेश मूरजानी ने एक अलग रास्ता चुना. उन्होंने तय किया कि विज्ञापन में ऐसे किरदार होंगे जिन्हें बच्चे पसंद करते हैं या जिन जैसा बनना चाहते हैं. जैसे जादूगर, टीचर, स्पोर्ट्स कोच या फिल्म स्टार.

लेकिन अब भी एक चीज की कमी थी. वह लाइन जो सीधे लोगों के दिमाग में जाकर बैठ जाए. यह जिम्मेदारी कॉपीराइटर सुलेखा बाजपेयी के पास आई. कहा जाता है कि पारले के ऑफिस में प्रेजेंटेशन से पहले तक वे लगातार अपनी लाइनों को सुधारती रहीं. शुरुआती ड्राफ्ट में सवाल कुछ और था - “मेलोडी के अंदर इतनी चॉकलेट कैसे भरी?” और जवाब था - “मेलोडी खाओ, खुद जान जाओ.” फिर अचानक उनके दिमाग में एक छोटा सा बदलाव आया. सवाल छोटा हुआ, ज्यादा आसान हुआ और सीधे लोगों की जुबान पर चढ़ने लायक बन गया.

“मेलोडी इतनी चॉकलेटी क्यों है?” बस यही वो क्षण था जिसने भारतीय विज्ञापन इतिहास की दिशा बदल दी.

अब विज्ञापनों में कोई स्पोर्ट्स कोच बच्चों से पूछता - “मेलोडी इतनी चॉकलेटी क्यों है?”
और बच्चे मुस्कुराकर जवाब देते - “मेलोडी खाओ, खुद जान जाओ.”

किसी विज्ञापन में टीचर यही सवाल पूछती थीं. किसी में जादूगर. किसी में फिल्म स्टार. स्कूल, खेल का मैदान, जादू का शो जैसी रोजमर्रा की जगहों को चुना गया ताकि हर बच्चा खुद को उस दुनिया का हिस्सा महसूस कर सके. फिर आखिर में बजता था वह जिंगल जिसने पूरे देश के दिमाग में जगह बना ली.

“मेलोडी है चॉकलेटी… मेलोडी है चॉकलेटी…”

उस दौर में भारतीय विज्ञापन सीधे जवाब देने के आदी थे. लेकिन मेलोडी ने लोगों के सामने एक सवाल रख दिया. और यही उसकी सबसे बड़ी ताकत बन गई. जिस 'बहुत ज्यादा चॉकलेटी' स्वाद की वजह से उसे असफल माना जा रहा था उसी को विज्ञापन का केंद्र बना दिया गया. लोगों के भीतर उत्सुकता पैदा की गई. जवाब पूरी तरह नहीं दिया गया. बस इतना कहा गया कि खुद खाकर देखो.

जिज्ञासा के दम पर चला विज्ञापन

धीरे-धीरे बच्चे दुकानों पर जाकर सिर्फ ये जानने के लिए मेलोडी खरीदने लगे कि आखिर ये इतनी चॉकलेटी क्यों है. स्कूलों में बच्चे ये लाइन दोहराने लगे. बसों, गलियों और यहां तक कि राजनीतिक बहसों में भी ये डायलॉग सुनाई देने लगा. मेलोडी टॉफी से ज्यादा बातचीत का हिस्सा बन गई.
नब्बे का दशक भारत में उपभोक्तावाद के उभार का शुरुआती दौर था. टीवी घरों तक पहुंच रहा था. विज्ञापन अब सिर्फ प्रोडक्ट बेचने का जरिया नहीं रह गए थे, वो संस्कृति बनने लगे थे. और मेलोडी उस बदलती संस्कृति का चेहरा बन गई.

धीरे-धीरे वही टॉफी जो कभी असफल मानी जा रही थी भारत की सबसे लोकप्रिय चॉकलेट कैंडीज में शामिल हो गई. आज चार दशक बाद भी “मेलोडी इतनी चॉकलेटी क्यों है?” सिर्फ एक विज्ञापन लाइन नहीं है. वो इस बात का सबूत है कि कई बार बाजार में प्रोडक्ट नहीं उसके पीछे सुनाई गई कहानी जीतती है.

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