बुजुर्ग माता-पिता के पास रहना है, लेकिन साथ नहीं! अब यह भी आसानी से मुमकिन होगा
भारत के शहरी इलाकों में, खास बुजुर्गों के लिए बनी रिहाइशी सोसाइटियों में एक नई मांग देखने को मिल रही है. यहां के बुजुर्ग अब हर आयु-वर्ग के पड़ोसियों से घिरे रहना चाहते हैं. वजह, वे बाहरी दुनिया के अनुभवों से खुद को कटा हुआ महसूस नहीं करना चाहते.

यूं तो सीनियर-लिविंग के लिए बनी सोसाइटीज अक्सर कई ऐसी सुविधाएं देती हैं जिससे बुर्जुर्गों का वक्त बेहतर तरीके से कट सके. मसलन, तरह-तरह की क्लासेज, वर्कशॉप और ऐसे क्लब जिन्हें निवासी अपने रुचियों के आधार पर जॉइन कर सकते हैं. लेकिन अब इनमें रहने वाले इसे एक खालिस बुजुर्ग माहौल से अलग, किसी आम सोसाइटी में रहने जैसा अनुभव चाहने लगे हैं.
दरअसल, इंटर-जेनरेशनल (अंतर-पीढ़ीगत), या कहें कि अलग-अलग आयु वर्गों के लिए आ रहे रिहाइशी प्रोजेक्ट अब इसी वादे के साथ लॉन्च हो रहे हैं. ये किसी आम अपार्टमेंट की तरह ही हैं, लेकिन इनमें बनाई गई यूनिट (फ्लैट या मकान) अलग-अलग जरूरतों के हिसाब से डिजाइन की जा रही हैं, जिससे हर आयु वर्ग की जरूरतों को पूरा किया जा सके, खासकर स्वास्थ्य, इंफ्रास्ट्रक्चर और खुशहाली की नजर से.
अंतरा सीनियर केयर के मैनेजिंग डायरेक्टर और सीईओ रजित मेहता कहते हैं, "भारत के सामाजिक और सांस्कृतिक ढांचे को देखते हुए इंटर-जेनरेशनल हाउजिंग का बहुत महत्व है." ऐसा इसलिए भी है क्योंकि आजकल कामकाजी पेशेवर युवा अपने माता-पिता के करीब तो रहना चाहते हैं, मगर अपनी निजता और स्वतंत्रता को भी बराबर महत्व देते हैं.
मेहता बताते हैं कि जब गुरुग्राम का ऐसा ही मैक्स एस्टेट प्रोजेक्ट लॉन्च हुआ, बुजुर्गों के लिए बनाए गए सभी 292 'सीनियर यूनिट' एक साल के भीतर ही धड़ाधड़ बिक गए. वे आगे कहते हैं, "इस बात ने हमें इसके बाद 'एस्टेट 361' नाम का अगला प्रोजेक्ट लॉन्च करने का आत्मविश्वास दिया, जिसके पहले फेज में 180 सीनियर यूनिट थीं. यह बीते दिसंबर की 5 तारीख को बिक्री के लिए खोले गए जिसमें से लगभग आधे अभी (जनवरी 2026) ही बिक चुके हैं.
भारत में बुजुर्गों की संख्या लगातार बढ़ रही है. आज 15 करोड़ से 2050 तक बुजुर्गों की जनसंख्या 35 करोड़ तक हो जाने का अनुमान है. मेहता के मुताबिक, यह इंटर-जेनरेशनल आवासीय योजनाएं भारत में खासा महत्व रखती हैं, क्योंकि यह उस खाली जगह को भरने में सक्षम हैं जो बड़े सामूहिक परिवारों और अलग-थलग पड़े सीनियर-लिविंग के बीच बनती है.
एक अनुमान के मुताबिक, बड़े शहरों में रह रहे लगभग 65 फीसद परिवार न्यूक्लियर यानी छोटे (2-3 सदस्यों वाले) हैं जो दूर-दराज बसे बुजुर्ग माता-पिता का खयाल रख पाने में खुद को असमर्थ पाते हैं. इसके अलावा, कई स्टडीज में यह भी सामने आया है कि बुजुर्गों में लगातार अकेलापन और नतीजतन मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी परेशानियां बढ़ी हैं जिसकी सीधी वजह संयुक्त परिवारों का छोटे टुकड़ों में विभाजित होना, बढ़ती उम्र को ध्यान में न रखकर बनाए गए मकानों में रहना और खयाल रखने के लिए अनौपचारिक तरीकों से सहायकों को रखना है.
इंटर-जेनरेशनल हाउजिंग का एक नमूना बेंगलूरू की प्राइमस सीनियर लिविंग में देखने को मिलता है. इस सोसाइटी के कई परिवारों से मांग उठी कि बच्चे उनके पास तो रहना चाहते हैं लेकिन एक ही छत के नीचे नहीं. प्राइमस के संस्थापक और मैनेजिंग डायरेक्टर आदर्श नरहरी बताते हैं कि एक ही सोसाइटी में सीनियर टावर अलग है, जिमें घर जैसा खाना, गार्ड, साफ-सफाई के लिए सहायक और 24 घंटे चिकित्सा-सेवाएं उपलब्ध रहती हैं. वहीं आम टावर में रहने वाले ऐसे सुविधाओं को पैसे देकर अलग से खरीद सकते हैं. नरहरी के मुताबिक़, "यह 21वीं सदी का संयुक्त परिवार है."
प्राइमस के पास फ़िलहाल तीन प्रोजेक्ट हैं, जिनमें से एक पूरा हो चुका है. मुंबई के पास, ठाणे में दिसंबर में लॉन्च हुए दोस्ती प्राइमस की 15 फीसदी यूनिट अब तक बिक चुकी हैं. बेंगलूरू में बन रहा प्राइमस सिग्मा यूं तो 2028 में रहने के लिए तैयार होगा, लेकिन इसकी 70 फीसदी यूनिट पहले ही बिक चुकी हैं. वहीं अंतरा सीनियर केयर फिलहाल चंडीगढ़, बेंगलुरू, हैदराबाद और चेन्नई जैसे शहरों में ऐसे रियल एस्टेट पार्टनर की तलाश कर रहे हैं जो उनके साथ एक इंटर-जेनरेशनल प्रोजेक्ट डिलीवर कर सके, जिसमें वे सीनियर केयर वाली यूनिट्स बनाने का जिम्मा उठाएंगे.
अन्य बड़े डेवलपर भी अब इस क्षेत्र में आ रहे हैं. हीरानंदानी कम्युनिटीज अब हीरानंदानी पार्क्स नाम का इंटर-जेनरेशनल प्रोजेक्ट चेन्नई में शुरू करने वाले हैं. वहीं डीएलएफ, जो गुरुग्राम में पहले ही सीनियर लिविंग प्रोजेक्ट लेकर आ चुके हैं, के भी अब इंटर-जेनरेशनल हाउजिंग के क्षेत्र में घुसने के कयास लगाए जा रहे हैं.
दामों की बात करें तो चूंकि सीनियर-लिविंग वाले यूनिट खास सुविधाओं से लैस होते हैं, इनपर आमतौर पर 3-5 फीसदी प्रीमियम लगता है. वहीं मल्टी-जेनरेशनल प्रोजेक्ट मार्केट में चल रहे दामों के अधिक करीब होते हैं.