‘कचौड़ी गली’ गुजरती है इतिहास के कई पड़ावों से, जहां गीत हैं और कहानियां भी!
कुछ लोग ‘कचौड़ी गली’ गाने को गौहर जान से जोड़ते हैं तो कुछ इसका रिश्ता सुंदर वेश्या या सुंदरीबाई से भी निकालते हैं

'कचौड़ी गली' चरचे में है. गाने की वजह से. गाने के इतिहास-भूगोल, सरोकार-विस्तार को लेकर. कचौड़ी गली पर किसी रूप में बात-बतकही होती है तो अच्छा ही लगता है. वजह, बचपन से ही कचौड़ी गली से सुनहरी स्मृतियों का जुड़ा होना. या कहें कि बचपन के सुनहरे अध्याय का एक हिस्सा बनारस की कचौड़ी गली में धमाचौकड़ी मचाते हुए बीता
कचौड़ी गली का रास्ता बनारस के चौक से खुलता है. वही गली ब्रह्मनाल का भी रास्ता है. मणिकर्णिका का भी. ब्रह्मनाल में मां की बुआ का घर है. बुआ के घर में ही मणिकर्णिका देवी रहती हैं. साल भर में एक बार घर से निकलकर मणिकर्णिका घाट के पास कुंड में जाती हैं.
वह बुआ, मां की सगी बुआ नहीं थीं. पर, हमने यह बहुत बाद में जाना. तब हमारे किसी नजदीकी रिश्तेदार-नातेदार का घर बनारस में नहीं था. जो जाता, वहीं रहता. इलाज कराने, गंगा नहाने, बाजार करने... हफ्ते-दस दिन तक रूकता. बुआ कभी गुस्साती नहीं. झल्लाती नहीं. मेरे अपने बड़े भाई के तो जीवन का सबसे अहम हिस्सा ही वहीं बीता. स्कूल से लेकर बीएचयू से डॉक्टरेट करने तक की पढ़ाई, वहीं रहकर की. हमें भी किसी ना किसी बहाने साल में दो-तीन बार जाने का अवसर मिल जाता था.
वहां जाते तो गली में खड़े होकर रास्ते से होकर मणिकर्णिका को जानेवाली अर्थियों को गिनने का खेल खेलते. एक घंटे में कितने गए? फिर मणिकर्णिका भी चले जाते. वहां से अंदर गली होकर विश्वनाथ मंदिर पहुंच जाते. दर्शन करने नहीं, विश्वनाथ गली में खिलौने के दुकान के बाहर खड़े होकर पानी में चलते स्टीमर को देखने. खरीदने के पैसे नहीं होते थे तो देखकर ही आनंदित होते. बाकी बचे समय में कचौड़ी गली की खाक छानते.
उसी रास्ते में पहली बार साइकिल का गुण भी आया. संयोग से बड़े होने पर स्कूटर चलाना भी, उसी गली में. बनारस की उस गली में चला लिया तो यह मान लिया कि अब कहीं भी चला लूंगा. संकरी गली, आदमी के चलने की जगह नहीं, उसी में राम नाम सत्य कहते हुए जाते लोग. उसमें बिना रुके, हॉर्न बजाने की बजाय मुंह से ही चिल्लाते हुए, 'हटअ मरदवा, दिखाई नाहीं पड़त हौ का, रास्ता छेकले हउआ...' कहकर स्कूटर निकाल लेना, खास कलाकारी थी.
जब खेल-खालकर शाम रात को लौटता, तो पहुंचते ही बुआ हमें देखते ही रागात्मक तरीके से गुनगुनाती, 'कचौड़ी गली सुन कइले बबुआ...’ इतना सुनाकर वे कहतीं कि दिन भर कचौड़ी गली में धूम मचाकर तुम घर आ गए. ओह, कचौड़ी गली सून हो गया होगा तुम्हारे बिना! पर, तब नहीं जानता था कि बुआ किसी गीत का बोल गुनगुनाकर हमें ताना देती हैं.
बातें बहुत हैं, कचौड़ी गली की. फिलहाल बात कचौड़ी गली गीत को लेकर चल रही है. कोक स्टूडियो से रेखा भारद्वाज की आवाज में गीत का नया वर्जन आया है. जाहिर सी बात है कि कोक स्टूडियो कोई भी गाना लेकर आता है तो वह लोकप्रिय हो ही जाता है. उसके साथ पूंजी की ताकत रहती है. फिर इस बार तो कोक स्टूडियो ने चयन ही ऐसे गाने का किया है, जो पुरबिया इलाके में लोकस्मृति का हिस्सा है. एक जमाने से जन-जन के बीच लोकप्रिय है. उसमें भी रेखा भारद्वाज की आवाज और अंदाज.
कुछ गानों को यह सुख हासिल हुआ है कि उसे पीढ़ी दर पीढ़ी कलाकार गाते ही चले जाते हैं. जैसे, मशहूर दादरा गीत है- 'हमरी अटरिया पर आजा रे सांवरिया...', जैसे मशहूर ठुमरी गीत है, 'याद पिया की आए...'. पुरबिया इलाके का यह कजरी गीत, 'मिरजापुर कइले गुलजार हो...' धीरे-धीरे उसी सदाबहार के मानक पर स्थापित होने और अमरत्व पाने की राह पर है.
कचौड़ी गली गीत पर बात-बतकही में एक बात बार-बार आ रही है कि यह गीत किस गौहर जान का है?
पहली बात तो यही कि गौहर जान को लेकर दुविधा में रहने की जरूरत नहीं. कलकत्ते वाली गौहर जान देश की सबसे लोकप्रिय कलाकार थीं. सबसे महंगी भी. 1901 में ही वे एक गाने की रिकार्डिंग का तीन हजार चार्ज करती थीं. वे गुमनामी में कभी रही नहीं. उनके गीत भी गुमनामी में नहीं रहे.
कचौड़ी गली गाने के साथ जिस गौहर जान की कथा जुड़ती है, वे गौहर जान बनारसवाली थीं. वहीं कचौड़ी गली के दूसरी ओर दालमंडी में रहती थीं. इनकी चर्चा मालिनी अवस्थी ने अपनी किताब 'चंदन किवाड़' में की है. विस्तार से. उन्होंने भी इस गीत से जुड़ी अपनी स्मृतियों को जोड़कर इसे विस्तार दिया है. असलम और गौहर का प्रेम, देशभक्ति आदि की कड़ियां और तथ्यों को जोड़कर.
हमने इस गीत को पहली बार सोमा घोष की आवाज में सुना था. बिस्मिल्ला खान के कंपोजिशन के साथ. उसके बाद इस गीत की लोकप्रियता बढ़ी थी. यह गीत और ‘पिया मेंहदी लिया द मोतीझील से...’ दोनों गीतों ने अपार लोकप्रियता हासिल की थी.
गौहर जान से इतर कुछ लोग इस गीत का रिश्ता सुंदर वेश्या या सुंदरीबाई से भी जोड़ रहे हैं. सुंदर वेश्या की प्रसिद्ध किताब है, 'बरसाती चांद'. उनका मशहूर प्रसंग है, काशी के नागर पहलवान यानी दाताराम नागर के साथ. इसकी विस्तार से चर्चा रूद्र प्रसाद मिश्र की किताब 'बहती गंगा' में है. भोजपुरी की सबसे श्रमसाध्य कामों से एक और क्लासिक किताबों में से एक, दुर्गा शंकर प्रसाद सिंह की किताब 'भोजपुरी के कवि और काव्य' में भी सुंदर वेश्या प्रसंग की चर्चा है. अलग तरीके से. 'नागर नइया' नाम से बारहमासा की भी एक पुरानी पोथी भी छपी थी. इन दोनों किताबों से पहले.
सुंदर वेश्या के दूसरे गीत भी मिलते हैं. कजरी के अखाड़े के गीत. जैसे एक मशहूर गीत है, ‘इतना आंख ना दिखावा, तनि धीरे बतियावा...’ सुंदर वेश्या के जीवन में जो प्रसंग रहे हैं, उससे साफ होता है कि इस गीत से उनका रिश्ता वास्ता नहीं रहा होगा. सुंदर वेश्या के नागर को कालापानी की सजा होती है. पर, बनारसवाली गौहर जान से भी इस गाने का संबंध रहा होगा, कहना थोड़ा मुश्किल ही लगता है. या बहुत दावे से नहीं कहा जा सकता. हां, जरूरी नहीं कि निजी तौर पर जो हमारा आकलन है, उसमें सत्यता ही हो. बिना डॉक्यूमेंटेशन वाले लोकगीतों में अनुमानों का युद्ध ही चलता है, कोई निर्णायक बात कहना आसान नहीं होता. इसलिए, यह अपनी राय है. गीत के बोल के अनुभव से. या, जो थोड़ी बहुत समझ है, उस आधार पर.
चूंकि यह गीत कहीं डॉक्यूमेंटेड नहीं, तो फिर इसके साथ किस्से-कहानी तो जुड़ेंगे ही. यह भी सच है कि इस गीत में अपने-अपने हिसाब से अनेक अंतरों को डेवलप भी किया गया है. इस गीत के अनेक वर्जन यूट्यूब पर मिलेंगे. सबके बोल में कुछ हेरफेर भी मिलेगा.
यह गीत एक संकेत देता है कि इसका तार माइग्रेशन से जुड़ा गीत है. पलायन की संस्कृति ने, पुरबिया लोकसंगीत में प्रेम के नगीने गीत दिए हैं. भोजपुरी के चर्चित प्रेम गीतों की सूची बने तो उनमें आधे से अधिक प्रेम गीत, बिरह की आग में झूलसन के बावजूद अलग सौंदर्य के साथ मिलेंगे. चाहे वे महेंदर मिसिर के गीत हों या फिर दूसरे गीत.
पर, ‘कचौड़ी गली’ गीत को लेकर लगता है कि यह आरकाटी प्रथा से उपजा गीत है. सब जानते हैं कि आरकाटी प्रथा के तहत अंग्रेज या उनके दलाल, भारतीयों को फंसाकर, लालच देकर, जोर जुलूम कर के काम के लिए ले जाते थे. कलकत्ता में मेन डिपो था, एक समय में. पर इधर के इलाके में फैजाबाद, मिरजापुर आदि में भी डिपो थे, जहां से गोरे लोग भारतीय मजदूरों को पकड़कर ले जाया करते थे.
‘कचौड़ी गली’ गीत में रंगून का जिक्र आया है. प्रेमी रंगून चला जाता है. रंगून एक जमाने में पलायन से उपजे प्रेम के गीतों में खूब आया करता था. हिंदी का तो मशहूर गीत है ही, ‘मेरे पिया गए रंगून....’ पर साथ ही भोजपुरी में भी गीत है. जैसे,’ नथिया झूलनी के करनवा पिया रंगूनवा गइले ना…’
रंगून से भारतीयों के आवाजाही का रिश्ता पुराना रहा है. बिहार में बर्मा टाइटल, कुशवाहा—कायस्थ आदि में चलता है. पर, बर्मा टाइटल उनका भी मिलेगा, जिनके परिवार के लोग बर्मा चले गए थे. बर्मा में भारतीयों (कैदियों, मज़दूरों और व्यापारियों) को ले जाने का मुख्य काम ब्रिटिश सरकार और अंग्रेज़ अधिकारी किया करते थे. राजनीतिक कैदी भी ले जाए जाते थे. जैसे बहादुर शाह ज़फ़र ले जाए गए थे. बाद में तो भारतीय शौक से, रोजगार के लिए, अधिक कमाई के लिए भी रंगून जाने लगे. ब्रिटिश भारतीय सम्राज्य का हिस्सा बनने के बाद.
बहरहाल, बात फिर से ‘कचौड़ी गली’ गीत की. इस गीत के बोल में ‘ओही मिरजापुर से उड़ले जहजवा...’ आता है. मिरजापुर से जहाज उड़ने का रिवाज नहीं रहा. अब भी नहीं है. हां, गंगा के रास्ते जहाज चलने का रिवाज जरूर रहा. इसलिए इसी गीत को कुछ लोगों को यह गाते हुए भी सुना है कि 'ओही मिरजापुर से चलले जहजवा...'. मिरजापुर के बजाय जहाज उड़ने का रिवाज बनारस से रहा. कहने को तो 1924 में ही बनारस में एयरपोर्ट बन गया था. यानी 102 साल पहले. पर, यह कायदे से ऑपरेटिव हुआ, आजादी बाद. 50 के दशक में. आजादी बाद.
अब कह सकते हैं कि लोकगीत के एक बोल को लेकर इतना क्या सोचना? सही बात है. लोकगीतों का बिखराव और खुरदुरापन ही उसका सौंदर्य है. उसमें मीन-मेख निकाला ठीक बात भी नहीं. ऐसी बातें तो लोकगीतों में आना सामान्य बात है. पर,पारंपरिक लोकगीतों में.
पारंपरिक गीतों तो अनेक बिंब ऐसे आते हैं जिनका हकीकत से वास्ता नहीं होता. बाकि जो गीत किसी के लिखे गए हों, बनाए गए हों, उसमें प्राय: सचेत रूप से ही बोल आते हैं. ‘कचौड़ी गली’ को भी पारंपरिक गीत मान लें, सामूहिक आकांक्षा का स्वर मान लें, तब इतनी बात ही नहीं. पारंपरिक गीतों का सौंदर्य तो चटक होता ही है. और यह पारंपरिक गीतों में ही तो होता है कि दुख का भाव भी सामूहिक स्वर की वजह से सुख के चटक रंग में बदल जाता है.
फिर बनारस के गीत तो रंग बदलने के लिए भी मशहूर हैं. जैसे दुलारी बाई का अपार दुख के क्षण का चैती गीत, 'एहि ठइयां झूलनी हेरानी हो रामा...' नेपाल की तराई तक पहुंचकर सुख का भाव भरनेवाला बन जाता है. बोल में बस ही दो शब्द जुड़कर. तराई वाले गाते हैं, 'एही ठइयां झूलनी हेराई गइले दइया रे...' आनंद के साथ. सामूहिक रूप से झूमते हुए. बनारस में दुलारी बाई ने इसे रोते-बिलखते हुए अपने प्रेमी के लिए गाया था. लोक की परंपरा में दुख में भी सुख के क्षण तलाश ही लिए जाते हैं.