चिड़ियाघर से मंदिर तक, रोहित 'मीत' का ब्रेल मिशन हजारों लोगों को दिखा रहा एक नई दुनिया
ट्रेन के एक भावुक सफर से शुरू हुआ रोहित कुमार 'मीत' का मिशन आज ब्रेल किताबों, चिड़ियाघरों, मंदिरों और सार्वजनिक स्थलों के जरिए नेत्रहीनों की दुनिया में नई रोशनी भर रहा है

लखनऊ के नवाब वाजिद अली शाह प्राणी उद्यान में दो महीने पहले जब शकुंतला देवी विश्वविद्यालय के छात्र राजेश अपने दोस्तों के साथ पहुंचे तो उनके लिए यह सिर्फ एक सैर नहीं थी. बचपन से नेत्रहीन राजेश के लिए चिड़ियाघर का मतलब अब तक केवल आवाज़ों और दूसरों के बताए वर्णन तक सीमित था.
लेकिन उस दिन उन्होंने पहली बार अपने हाथों से जानवरों के बारे में ‘पढ़ा’. बाड़ों के बाहर लगे ब्रेल लिपि के बोर्ड पर उंगलियां फेरते हुए वे शेर, हाथी, हिरण और पक्षियों की जानकारी हासिल कर रहे थे. राजेश बार-बार मुस्कुरा रहे थे. वे जानवरों को देख नहीं सकते थे लेकिन पहली बार उन्हें लगा कि चिड़ियाघर उनके लिए भी बना है.
राजेश की यह मुस्कान दरअसल उस व्यक्ति के वर्षों पुराने संघर्ष और सपने की कहानी कहती है, जिसने अपना जीवन नेत्रहीनों के जीवन में ज्ञान का उजाला फैलाने के लिए समर्पित कर दिया. यह कहानी है लखनऊ के रोहित कुमार 'मीत' की, जिन्होंने ब्रेल लिपि को सिर्फ किताबों तक सीमित नहीं रहने दिया बल्कि उसे साहित्य, चिड़ियाघर, मेट्रो कार्ड, दवाइयों के पाउच, ऐतिहासिक इमारतों और अब मंदिरों की आरती तक पहुंचा दिया.
आने वाले दिनों में लखनऊ के मंदिरों में भी ऐसा ही अनोखा प्रयोग दिखाई देगा. यहां आने वाले दृष्टिबाधित श्रद्धालु केवल देवी-देवताओं के बारे में ब्रेल बोर्ड से जानकारी ही नहीं पढ़ सकेंगे बल्कि ब्रेल कॉरिडोर के जरिए आरती संग्रह भी पढ़ पाएंगे. यह पहल भी रोहित कुमार 'मीत' की सोच का विस्तार है. रोहित की यह यात्रा किसी सरकारी योजना या बड़े आर्थिक सहयोग से शुरू नहीं हुई थी. इसकी शुरुआत हुई थी एक ट्रेन यात्रा से, जिसने उनके जीवन की दिशा बदल दी.
सितंबर 2008 में रोहित दिल्ली से लखनऊ लौट रहे थे. उनके हाथ में कवि गोपालदास नीरज की पुस्तक 'लिखे जो ख़त तुझे' और शायर बेकल उत्साही की किताब 'कारवां गुजर गया' थी. ट्रेन में सामने की बर्थ पर एक दस वर्षीय बच्ची अपने नेत्रहीन पिता के साथ सफर कर रही थी. बच्ची ने रोहित से किताबें मांगीं और अपने पिता को पढ़कर सुनाने लगी. छोटी बच्ची जिस भाव और आत्मीयता से कविताएं पढ़ रही थी, उसे देखकर रोहित भीतर तक भावुक हो गए. उन्हें लगा कि साहित्य का आनंद सुनकर नहीं, पढ़कर पूरा होता है. गजलों और कविताओं की आत्मा शब्दों के स्पर्श में छिपी होती है. उसी क्षण उन्होंने तय किया कि दृष्टिबाधित लोगों के लिए ब्रेल लिपि में साहित्यिक पुस्तकों का प्रकाशन करेंगे.
यह विचार जितना संवेदनशील था, उतना ही कठिन भी. उस समय नेत्रहीनों के लिए पाठ्यक्रम की किताबें तो उपलब्ध थीं लेकिन साहित्यिक पुस्तकों का लगभग अभाव था. रोहित ने दो वर्षों तक देश के बड़े-बड़े प्रकाशकों से संपर्क किया. उन्होंने ब्रेल लिपि में साहित्यिक किताबें छापने का प्रस्ताव रखा लेकिन हर जगह से लगभग एक जैसा जवाब मिला. इस काम में आर्थिक लाभ नहीं था इसलिए कोई भी प्रकाशक तैयार नहीं हुआ. आखिरकार रोहित ने हार नहीं मानी. उन्होंने अपनी मां और दोस्तों से उधार लेकर करीब पांच लाख रुपए जुटाए और वर्ष 2009 में लखनऊ में 'वॉयस पब्लिकेशन' की स्थापना की.
यहीं से ब्रेल साहित्य आंदोलन की शुरुआत हुई. वॉयस पब्लिकेशन के तहत सबसे पहले 'ख्वाबों का कारवां' नाम से उर्दू और हिंदी शायरियों का संकलन ब्रेल लिपि में प्रकाशित हुआ. इस अनोखी पुस्तक में 68 कवियों की 176 रचनाएं शामिल थीं. शुरुआत में इसकी 500 प्रतियां छपीं और उन्हें मुफ्त में दृष्टिबाधित लोगों के बीच बांटा गया. लेकिन मांग इतनी बढ़ी कि जल्द ही 500 और प्रतियां छापनी पड़ीं. रोहित के लिए यह केवल प्रकाशन नहीं था बल्कि यह साबित करने का प्रयास था कि साहित्य हर व्यक्ति का अधिकार है, चाहे वह देख सकता हो या नहीं.
सिद्धार्थनगर जिले के बढ़नी कस्बे में पले-बढ़े रोहित का अपना जीवन भी संघर्षों से भरा रहा. उनके पिता मुरारी लाल श्रीवास्तव मेरठ की मवाना चीनी मिल में क्लर्क थे. वर्ष 1993 में पिता की मृत्यु हो गई, तब रोहित केवल दस वर्ष के थे. चार भाई-बहनों का पालन-पोषण उनकी मां ने कठिन परिस्थितियों में किया. आर्थिक अभावों के बीच भी रोहित को बचपन से शायरी लिखने का शौक था. इसी दौरान उनके जीवन में उर्दू के मशहूर शायर बेकल उत्साही आए. बेकल उत्साही की बेटी का विवाह बढ़नी में हुआ था और वे अक्सर वहां आते रहते थे. वर्ष 1998 में हाईस्कूल के छात्र रोहित की मुलाकात उनसे हुई. बेकल उत्साही ने रोहित की प्रतिभा को पहचाना और उन्हें अपना शागिर्द बना लिया. उन्होने ही रोहित के नाम के साथ 'मीत' जोड़ने की सलाह दी. उनकी सरपरस्ती में रोहित ने उर्दू भाषा और शायरी पर अपनी पकड़ मजबूत की.
इंटरमीडिएट के बाद रोहित लखनऊ आ गए. कान्यकुब्ज कॉलेज से राजनीति शास्त्र में एम.ए. करते हुए वे मुशायरों में हिस्सा लेने लगे. लेकिन 2009 में वॉयस पब्लिकेशन की स्थापना के बाद उनका जीवन पूरी तरह एक मिशन में बदल गया. रोहित को इस काम में स्पर्श राजकीय दृष्टिबाधित इंटर कॉलेज के शिक्षकों और छात्रों का सहयोग मिला. उन्होंने साहित्यिक रचनाओं को ब्रेल लिपि में अनुवाद करने में मदद की. बाद में रोहित ने 'मीत वेलफेयर फाउंडेशन' की स्थापना की, जिसके जरिए उन्होंने कवियों और लेखक मित्रों से सहयोग लेकर ब्रेल पुस्तकों का प्रकाशन शुरू किया.
'ख्वाबों का कारवां' की सफलता के बाद अशोक चक्रधर की 'जरा मुस्कुरा तो दें’, बशीर बद्र की 'घर छोड़कर मत जाओ’, गोपालदास नीरज की 'लिखे जो ख़त तुझे' और बेकल उत्साही की 'सादगी श्रृंगार हो गई' जैसी चर्चित पुस्तकों का ब्रेल संस्करण प्रकाशित किया गया. इन सभी पुस्तकों का संपादन और संकलन स्वयं रोहित ने किया.
धीरे-धीरे उनकी पहचान देशभर के दिव्यांग संस्थानों और कॉलेजों तक पहुंच गई. आज शायद ही कोई ऐसा दृष्टिबाधित संस्थान हो, जहां रोहित का प्रकाशित ब्रेल साहित्य न पहुंचा हो. वे अब तक 10 हजार से अधिक पुस्तकें मुफ्त में बांट चुके हैं. रोहित कहते हैं कि किताबें केवल उन्हीं लोगों को दी जाती हैं, जो उन्हें पढ़ने की इच्छा जताते हैं. उनके लिए यह दान नहीं, बल्कि पढ़ने के अधिकार को उपलब्ध कराने का प्रयास है.
ब्रेल साहित्य तक सीमित रहने के बजाय रोहित ने ब्रेल को सार्वजनिक जीवन का हिस्सा बनाने की दिशा में भी काम किया. लखनऊ चिड़ियाघर में स्थापित ब्रेल कॉरिडोर इसका सबसे बड़ा उदाहरण है. यहां जानवरों के बाड़ों के बाहर लगी जानकारी अब ब्रेल लिपि में भी उपलब्ध है. दृष्टिबाधित लोग केवल स्पर्श के जरिए जानवरों के बारे में पढ़ सकते हैं. इस सुविधा वाला लखनऊ देश का पहला चिड़ियाघर बना. यहीं नहीं, चिड़ियाघर के प्रकृति प्रशिक्षण केंद्र में उन्होंने ब्रेल लाइब्रेरी भी स्थापित कराई. इस लाइब्रेरी में 'नंदन’, 'चंपक’, 'चंदामामा' जैसी बाल पत्रिकाओं से लेकर गजल संग्रह और साहित्यिक पुस्तकें तक मौजूद हैं. मुंबई के रिजवी कॉलेज में भी उन्होंने ऐसी लाइब्रेरी स्थापित की है.
रोहित की सोच यह है कि दृष्टिबाधित व्यक्ति को हर उस चीज तक पहुंच मिलनी चाहिए, जो एक सामान्य व्यक्ति को सहज रूप से उपलब्ध होती है. इसी सोच के तहत उन्होंने ब्रेल मेट्रो कार्ड, ब्रेल मेडिसिन पाउच और ऐतिहासिक भवनों की जानकारी ब्रेल लिपि में उपलब्ध कराने जैसे प्रयोग किए. अब उनका अगला बड़ा कदम मंदिरों में ब्रेल आरती कॉरिडोर बनाना है.
यहां दृष्टिबाधित श्रद्धालु केवल धार्मिक स्थलों की जानकारी ही नहीं, बल्कि आरती संग्रह भी स्वयं पढ़ सकेंगे. यह पहल धार्मिक अनुभव को भी समावेशी बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण मानी जा रही है. रोहित का काम केवल तकनीकी सुविधा उपलब्ध कराना नहीं है. वे समाज के उस नजरिए को बदलने की कोशिश कर रहे हैं, जिसमें दिव्यांग व्यक्ति को हमेशा दूसरों पर निर्भर मान लिया जाता है. ब्रेल कॉरिडोर, ब्रेल पुस्तकें और ब्रेल सूचना बोर्ड दरअसल आत्मनिर्भरता की नई भाषा हैं.
उनके इसी योगदान के लिए उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान ने उन्हें सर्वश्रेष्ठ प्रकाशक पुरस्कार से सम्मानित किया. लेकिन रोहित के लिए सबसे बड़ा सम्मान शायद वह मुस्कान है, जो राजेश जैसे किसी छात्र के चेहरे पर आती है, जब वह पहली बार अपने हाथों से दुनिया को 'पढ़' पाता है. आज जब डिजिटल दुनिया तेजी से आगे बढ़ रही है, तब भी भारत में दृष्टिबाधित लोगों के लिए साहित्य और सार्वजनिक जानकारी की पहुंच बेहद सीमित है. ऐसे समय में रोहित कुमार 'मीत' का काम यह याद दिलाता है कि संवेदनशीलता केवल भाषणों से नहीं, बल्कि छोटे-छोटे ठोस प्रयासों से पैदा होती है.