अपनी ही जन्मभूमि पर फिरंगी होने की सजा भुगतते जॉर्ज ऑरवेल!
अंग्रेजी के मशहूर उपन्यासकार जॉर्ज ऑरवेल का जन्म बिहार के मोतिहारी में हुआ था. यहां उनके जन्मस्थल पर एक स्मारक बना है लेकिन आजकल उसकी हालत उन्हीं के चर्चित उपन्यास ‘एनीमल फार्म’ जैसी हो चुकी है

1984 का साल आने वाला था. इसी साल की कल्पना करते हुए मशहूर अंग्रेजी उपन्यासकार जॉर्ज ऑरवेल ने करीब 35 साल पहले यानी 1949 में ‘1984’ के नाम से अपना चर्चित उपन्यास लिखा था. इस साल के आने से पहले स्कॉटलैंड के पत्रकार इयान जैक यह तय करने भारत आए थे कि जॉर्ज ऑरवेल का जन्मस्थान आखिर है कहां?
दरअसल 1903 में जब जॉर्ज ऑरवेल का जन्म हुआ, उनके पिता मोतिहारी और मुंगेर में पदस्थापित थे और उनका परिवार भी साथ रहता था. जैक ने मोतिहारी और मुंगेर दोनों स्थलों का मुआयना किया और तय पाया कि जॉर्ज का जन्म मोतिहारी में ही हुआ है. इसके बाद उनके आलेख पूरी दुनिया में छपे और मोतिहारी के अफीम विभाग के क्वार्टर को जॉर्ज ऑरवेल का आधिकारिक जन्मस्थान मान लिया गया.
हालांकि ऑरवेल करीब एक साल ही यहां रहे और बाद में इंग्लैंड चले गए और वहीं 21 जनवरी 1950 को उनका निधन हुआ. आज इस मशहूर उपन्यासकार की पुण्यतिथि है. खैर यहां हम उनके जन्मस्थल पर बने स्मारक की बात कर रहे हैं.
जब यह तय हो गया कि ऑरवेल का जन्म कहां हुआ था तो स्थानीय बुद्धिजीवियों ने रोटरी क्लब की मदद से उस स्थान को सहेजने का अभियान शुरू किया. फिर बिहार सरकार ने जिम्मेदारी समझते हुए इस जगह को अपनी संरक्षित स्मारकों की सूची में डाल दिया. 2014 में इस स्थल का जीर्णोद्धार किया गया. हालांकि अगर आज आप उस संरक्षित स्थल पर जाएंगे तो आपको जॉर्ज ऑरवेल के दूसरे मशहूर उपन्यास एनिमल फार्म की याद आएगी. वहां आपको सूअर लोटते नजर आएंगे, शराबबंदी कानून वाले बिहार राज्य में आपको वहां भरपूर मात्रा में शराब की बोतलें और टेट्रापैक दिखेंगे और आसपास के युवा नशा करते या जुआ खेलते भी नजर आएंगे.
जॉर्ज ऑरवेल की मकबूलियत को देखते हुए कई लेखक, पत्रकार, कलाकार जब मोतिहारी शहर आते हैं तो वहां जाने की कोशिश करते हैं. पूर्वी चंपारण जिले का पर्यटन विभाग भी बड़े गर्व से बताता है कि उसका शहर जॉर्ज ऑरवेल की जन्मस्थली है. लेकिन अगर आप वहां पहुंचना चाहें तो जाने का रास्ता न स्थानीय लोग बता पाएंगे और न ही गूगल मैप आपको वहां तक पहुंचा पाएगा. ऐसे ज्यादातर लोगों को इस संरक्षित स्मारक तक पहुंचाने का काम मोतिहारी के युवा पत्रकार विश्वजीत मुखर्जी करते हैं, जिन्होंने जॉर्ज ऑरवेल के मोतिहारी कनेक्शन को लेकर एक डॉक्यूमेंटरी बनाई है और वे जॉर्ज के दत्तक पुत्र रिचर्ड ब्लेयर के संपर्क में भी रहते हैं.
विश्वजीत बताते हैं, “मैं ब्रिटेन के अलावा ऑस्ट्रेलिया, जापान और श्रीलंका के शोधार्थियों की टीम को लेकर वहां गया हूं. इनके अलावा कई बड़े लेखक, पत्रकार और कलाकारों को भी वहां घुमाकर लाया हूं. वे सब यह सोचकर आते हैं कि यह जगह अच्छी तरह संरक्षित होगी, मगर जब वे यहां के हालात देखते हैं तो उदास हो जाते हैं. आखिरी बार मैं वहां 25 दिसंबर, 2025 के आसपास फिल्मकार अनुभव सिन्हा के साथ वहां गया था. उन्होंने भी इस जगह को देखकर निराशा जाहिर की और कहा इस जगह को बेहतर होना चाहिए था.”
दरअसल मोतिहारी में जॉर्ज ऑरवेल स्मारक को संरक्षित करने और वहां लगातार आयोजन करने का श्रेय विश्वजीत के पिता देवप्रिय मुखर्जी को जाता है, जो जॉर्ज आरवेल कमेमोरेटिव कमिटी के 2005 से ही अध्यक्ष हैं. वे स्थानीय रोटरी क्लब के भी सदस्य हैं. इसी क्लब ने सन 2000 में इस जगह को संरक्षित करने का बीड़ा उठाया था. वे लोग उस संरक्षित स्थल पर हर साल जॉर्ज की जयंती और पुण्यतिथि पर आयोजन करते हैं. इसके अलावा भी बीच-बीच में आयोजन कर उस जगह की प्रासंगिकता बनाए रखने की कोशिश करते हैं. हर साल 15 अगस्त और 26 जनवरी को भी वहां ध्वजारोहण करते हैं.
देवप्रिय मुखर्जी बताते हैं, “जब हमने उस जगह को संरक्षित करने का अभियान शुरू किया तो वहां एक बड़ा सा शिलापट्ट लगवाकर यह लिखवाया कि यह शताब्दी साहित्यकार जॉर्ज आरवेल की जन्मभूमि है. बाद में बिहार सरकार ने इसे अपने संरक्षित स्मारकों की सूची में शामिल किया. तब हमलोगों ने वहां जॉर्ज की मूर्ति स्थापित कराई. उसके बाद सरकार ने इसका संरक्षण कराया. लेकिन उसके बाद वह लगातार उपेक्षित होता चला गया.”
दरअसल 22 अप्रैल 2012 को यहां बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार आए थे और यहां के विजिटर बुक में उन्होंने लिखा था, “मेरे मन में इस स्थल को जॉर्ज ऑरवेल स्मारक के रूप में विकसित करने का विचार है. मैं फिर आउंगा.” विश्वजीत कहते हैं, “वे इस स्थल को स्मारक के साथ-साथ संग्रहालय के रूप में विकसित करना चाहते थे, जहां ऑरवेल की कृतियां भी हों.” हालांकि नीतीश कुमार अभी तक तो दोबारा यहां नहीं आ पाए मगर बिहार सरकार ने 2014 में इस स्थल के संरक्षण का कार्य शुरू किया जो 2015 में पूरा हुआ. उसके बाद यहां सिक्योरिटी गार्ड भी रखे गए.
मगर इसके बाद सरकार इस स्मारक को धीरे-धीरे भूलने लगी और यह उपेक्षित होता चला गया. इसकी एक वजह स्थानीय लोगों और राजनेताओं में इस स्थल को लेकर पैदा हुआ नकारात्मकता का भाव भी था.
2013-14 में जब से इस स्थल को संरक्षित करने की घोषणा बिहार सरकार ने की, इसके खिलाफ मोतिहारी में आंदोलन शुरू हो गए. वहां के एक स्थानीय सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता रंजीत गिरी ने स्थानीय स्वतंत्रता सेनानी के उत्तराधिकारियों को एकजुट कर यह आंदोलन किया. वे बताते हैं, “ऑरवेल के पिता ब्रिटिश सरकार के मुलाजिम थे, वे खुद अंग्रेजी सत्ता के समर्थक और गांधी के विरोधी थे, ऐसे आदमी का यहां स्मारक बनाने की क्या जरूरत. वे तो गुलामी के प्रतीक हैं. वैसे भी यह उनकी जन्मस्थली है, इसका पक्का प्रमाण नहीं है. यहां पहले अपने देश के स्वतंत्रता सेनानियों का स्मारक बने, फिर ऑरवेल का.”
रंजीत गिरी खुद को गांधीवादी बताते हैं. उनके मुताबिक उस वक्त उनके इस अभियान को BJP के विधायक प्रमोद कुमार का भी समर्थन मिला और इसी वजह से ऑरवेल स्मारक की आधी जमीन पर सत्याग्रह पार्क बनाने की स्वीकृति मिली और वह बना भी. बताया जाता है कि मोतिहारी के सांसद BJP के वरिष्ठ नेता राधामोहन सिंह भी कभी ऑरवेल के स्मारक के संरक्षण के पक्षधर नहीं रहे. इंडिया टुडे ने उनका पक्ष जानने के लिए उन्हें फोन भी किया, मगर वे उपलब्ध नहीं हो पाए.
रंजीत गिरी ने ऑरवेल की किताबों को नहीं पढ़ा है, मगर वे कहते हैं, “दिल्ली विश्वविद्यालय के एक प्रोफेसर ने हमें बताया कि एनमिल फार्म में उन्होंने भारतीयों की तुलना कुत्ते और बिल्लियों से की है. हालांकि हमने उनका आलेख रिफ्लेक्शन ऑन गांधी पढ़ा है, जिसमें उन्होंने गांधी की आलोचना की है. उन्हें ढोंगी बताया है. इसलिए हमलोग उनके खिलाफ हैं.”
यह सच है कि जॉर्ज ऑरवेल ने ‘रिफ्लेक्शन ऑन गांधी’ में लिखा है कि गांधी की अहिंसा लोकतांत्रिक ब्रिटिश सत्ता के खिलाफ ही सफल हो सकती है, किसी तानाशाही राज्य में नहीं. हालांकि उन्होंने इस आलेख में उनके व्यक्तिगत गुणों की तारीफ भी की है. मगर यह सरासर गलत है कि एनिमल फार्म में उन्होंने भारतीयों की तुलना कुत्ते और बिल्लियों से की है. उन्होंने इस उपन्यास में सूअर बाड़ा को प्रतीक बनाकर लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं की आलोचना की है.
बहरहाल इन आंदोलनों की वजह से न सिर्फ मोतिहारी की जनता बल्कि स्थानीय राजनेताओं में भी ऑरवेल को लेकर उत्साह में कमी आई. शायद यह भी एक वजह रही होगी कि कई बार मोतिहारी जाकर भी नीतीश कुमार 2012 के बाद वहां दोबारा नहीं पहुंचे
इस बीच 2015 से 2020 तक वहां बिहार सरकार की तरफ से चार सुरक्षा प्रहरी तैनात रहे. मगर उन्हें कभी मानदेय नहीं मिला. इस बात की पुष्टि 2017 से 2022 तक बेतिया संग्रहालय के प्रभारी रहे शिव कुमार मिश्र भी करते हैं. उस दौरान ऑरवेल स्मारक भी उनके अधीन आता था. शिव कुमार कहते हैं, “मैंने उस दौरान कई बार राज्य मुख्यालय में इन प्रहरियों के वेतन और यहां की बिगड़ती सुरक्षा व्यवस्था के बारे में लिखा. मगर कोई जवाब नहीं आया. ऐसे स्मारकों में कम से कम छह सुरक्षा प्रहरी और एक मोन्यूमेंट अटेंडेंट होना चाहिए था. यह अंतर्राष्ट्रीय प्रतिष्ठा का स्मारक है, यहां दुनिया भर से लोग आते हैं. इसका तो विशेष ध्यान रखा जाना चाहिए.”
बताया जाता है कि चूंकि सुरक्षा प्रहरियों को मानदेय नहीं मिलता था, तो वे इस जगह पर लोगों को ठहराने लगे और उनसे पैसे वसूलने लगे. आखिरकार ये सुरक्षा प्रहरी वहां से काम छोड़कर चले गए. फिर यहां की स्थिति और बिगड़ने लगी. स्थानीय लोग यहां से ईंट और दरवाजे उखाड़ कर ले जाने लगे. इस बीच जॉर्ज ऑरवेल की मूर्ति तक तोड़ दी गई और वहां तक पहुंचने के निशान भी मिट गए. देवप्रिय मुखर्जी कहते हैं, “साल 2000 में जब हमने इस स्थान को संरक्षित करने का अभियान शुरू किया था, तब के मुकाबले आज इसकी हालत ज्यादा खराब है.”
इस संबंध में हमने कला एवं संस्कृति विभाग के सचिव प्रणव कुमार से बात की तो उन्होंने बताया, “हम लोग जॉर्ज ऑरवेल के स्मारक की रिमॉडलिंग की योजना बना रहे हैं, ताकि उसे फिर से विकसित किया जा सके और वह उनकी प्रतिष्ठा के अनुकूल हो.”