हिंदी का भविष्य बहुत उज्ज्वल है मगर लंबे समय तक नहीं रहेगा : जी.एन. देवी
भारतीय भाषाओं के प्रख्यात अध्येता जी.एन. देवी से पुष्यमित्र की बातचीत

गणेश नारायणदास देवी, जिन्हें दुनिया जी.एन. देवी के नाम से जानती है, भारतीय भाषाओं के प्रख्यात अध्येता हैं. उनकी संस्था भाषा रिसर्च एंड पब्लिकेशन सेंटर ने भारतीय भाषाओं के सर्वेक्षण में ऐतिहासिक कार्य किया है.
हाल ही में पटना में किताब उत्सव के दौरान उनकी अंग्रेजी पुस्तक के हिंदी अनुवाद महाभारत: महाकाव्य एवं राष्ट्र का विमोचन हुआ. इस अवसर पर भाषाओं के विकास, भविष्य और महाभारत की प्रासंगिकता पर पढ़िए पुष्यमित्र से उनकी बातचीत :
अगर पूरी दुनिया की एक ही भाषा होती तो सभी एक ही भाषा में संवाद करते. यह कितना अच्छा होता? फिर भाषाओं को लेकर कोई विवाद भी नहीं होता. मगर आप भाषाओं की विविधता के समर्थक हैं, ऐसा क्यों?
भाषाओं की निर्मित बायोलॉजिकल प्रक्रिया रही है. जब होमोसेपियंस जानवर से इंसान के रूप में उभर रहा था तो उसके शरीर में काफी परिवर्तन हुए. रीढ़ की हड्डी आई और दिमाग में भी कई बदलाव हुए. दिमागी बदलाव की प्रक्रिया में उसने बोलने के साथ-साथ सोचना भी सीखा. वह अपने दिमाग में विचार करने लगा और सामने वाले व्यक्ति के दिमाग में क्या चल रहा है, सोचने लगा. इस प्रक्रिया से जुड़ी नाक की, होठ की, दांतो की और जीभ की शारीरिक हलचल से भाषा बनने लगी. ऐसा नहीं हुआ कि इंसान ने एक दिन बैठकर भाषा बनाई, फिर उसकी लिपि तैयार की. इंसान धीरे-धीरे अपने सोच-विचार को समाज में शेयर करना सीखने लगा. उस नई क्षमता को लेकर उसके माइग्रेशन हुए.
अफ्रीका से निकलकर इंसान पूरी दुनिया में फैला. अलग-अलग समूह जो एक जगह ठहरे तो वहां उसने अपने आसपास की चीजों के लिए शब्दों का निर्माण किया. कई हजार साल बाद जब राज्य व्यवस्था स्थापित हुई तब संवाद शुरू हुए. अलग-अलग बोलियों से मिलकर भाषा बनी. इस तरह भाषा पैदा हुई. इसलिए एक भाषा होना, यह बाइबल का मिथ है. मगर भाषा का स्वरूप कभी ऐसा नहीं रहा. भाषा हमेशा से अनेक ही रही है. मगर राज्य एक भाषा बनानी की प्रक्रिया करता है. वह कभी पूरी नहीं होती क्योंकि हर बोली में कुछ न कुछ ऐसे शब्द होते हैं, जो वहां की जमीन से जुड़े होते हैं.
अपने देश में संस्कृत, पर्शियन और अंग्रेजी तीन भाषाओं ने लंबे समय तक राज किया. संस्कृत से पहले भी अपने देश में कई भाषाएं थीं, उनके शब्द संस्कृत ने स्वीकारे. पर्शियन के हजारों शब्द हमारे देश की सभी भाषाओं ने, तमिल तक ने स्वीकारे. पर्शियन में भी हमारे शब्द शामिल हुए. अंग्रेजी की भी वही स्थिति है. मगर आप देखेंगे, खेती से जुड़े जितने शब्द हैं, वे न संस्कृत से है, न पर्शियन, न अंग्रेजी से. हमारी बोलियों के शब्द वैसे के वैसे हमारी भाषाओं में आये.
इसलिए एक भाषा सबकी हो ऐसा कभी रहा नहीं और एंथ्रोपोलिजकल वजहों से हो नहीं सकता. क्योंकि भाषा पहले बॉयोलॉजी से जुड़ी फिर इकॉलॉजी से जुड़ी. यह एक सांस्कृतिक कृति है.
आपकी एक किताब काफी चर्चित है, देवभाषा. वह संस्कृत भाषा के बारे में है. संस्कृत भाषा को आप किस रूप में देखते हैं?
संस्कृत भाषा में जितने पोएटिक मीटर बने, उतने बहुत कम अन्य भाषा में बने. उसमें म्यूजिक का एक अंश रहा है. मगर आज तो संस्कृत भाषा चलन में नहीं हैं, क्योंकि मैं बोलूंगा तो लोग समझ नहीं पाएंगे. वह हमारे विरासत की भाषा है, उसका कालखंड समाप्त हो गया है, उसे इस नजर से मैं देखता हूं.
इस किताब में मैंने लिखा है कि संस्कृत को इतनी प्रतिष्ठा क्यों मिली. संस्कृत हमारे कर्मकांड की भाषा रही है, लेकिन उसको कोई ठीक से समझ नहीं पाता था तो लोगों को लगा कि जरूर इस भाषा में कोई जादुई कीमिया है. जो थोड़े लोग इस भाषा को जानते थे, उन्होंने अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिए इसका इस्तेमाल किया. बहुत सोच समझ कर. जैसे आज अपने देश में अंग्रेजी बोलने वालों को विद्वान समझते हैं, ऐसे ही. इसी तरह संस्कृत को विद्वता और दैवी शक्ति का प्रतीक माना गया. कहा गया कि वे भगवान के साथ सीधा संवाद कर सकते हैं.
कहा गया कि जो संस्कृत जानते हैं, वे सबसे ऊपर हैं. जो संस्कृत जानने वालों का रक्षण करते हैं, वे उसके नीचे. जो इनकी व्यवस्था संभालते हैं, उन्हें भी तीसरा दर्जा दिया गया. और जिनका संस्कृत से कोई रिश्ता नहीं था, उसे शूद्र माना गया. तो इस तरह हमारी वर्ण व्यवस्था संस्कृत भाषा की झूठी प्रतिष्ठा के आधार पर पूरे समाज पर थोपी गई. संस्कृत भाषा बड़ी महान है मगर उसकी प्रतिष्ठा का ऐसा इस्तेमाल किया गया, यही बात उस किताब में मैंने लिखी है.
आपने प्राकृत का जिक्र किया. बुद्ध ने अपने उपदेशों के लिए संस्कृत की जगह प्राकृत को चुना. यह क्या उनकी कोई भाषाई राजनीति थी? क्योंकि उस वक्त तो धर्म और धर्माचार्यों की भाषा संस्कृत मानी जाती थी.
जिस इलाके में गौतम बुद्ध ने अपना काम किया वहां इंसानी बसाहटें कम से कम पांच हजार सालों से थीं. उनकी भाषाएं भी थीं. इसलिए गौतम बुद्ध को उन सभी लोगों से बात करनी था तो उनकी भाषा में बात करना जरूरी था. उस वक्त संस्कृत का प्रसार पश्चिमी भारत के इलाकों में था, ज्यादा से ज्यादा यमुना तक था. पूर्वी भारत जो पश्चिम से कटा हुआ था, वहां संस्कृत फैली नहीं थी. उसे इस इलाके में लोगों की भाषा बनने में काफी वक्त लगा. संभवतः गौतम बुद्ध ने इसलिए संस्कृत की जगह प्राकृत को चुना होगा.
अगर हम बिहार की बात करें तो यहां मगही, मैथिली, भोजपुरी जैसी कई बोलियां लंबे समय से इस्तेमाल में हैं. मगर जब महात्मा गांधी ने हिंदी को बढ़ावा देने की बात कही तो यहां के लोगों ने अपनी भाषा छोड़कर हिंदी को अपनाया. अब हिंदी कहती है कि इन्हें बढ़ावा नहीं देना चाहिए. इससे हिंदी का नुकसान होगा. इसे आप कैसे देखते हैं?
संस्कृत बहुत बड़ी भाषा बनी. उसमें बहुत साहित्य लिखा गया, बहुत महत्व मिला. मगर वह आई और चली गई. पर्शियन का फैलाव ईरान से लेकर चीन तक था. वह भी चली गई. अंग्रेजी आई है मगर वह नई तकनीक के साथ-साथ कम भी होती जाएगी. हिंदी जो अंग्रेजी की जगह लेने की कोशिश कर रही है, वह बहुत प्रगति करेगी. उसमें बहुत साहित्य भी आएगा. लेकिन जब भी एक भाषा खुद को बहुत अधिक फैलाने की कोशिश करती है, तब वह धीरे-धीरे कमजोर होने लगी है. एक भाषा की अपनी कैरिंग कैपेसिटी होती है, उससे ज्यादा उस पर लादने की कोशिश करेंगे तो दिक्कत होगी. किसी भी भाषिक साम्राज्य की यही गति होती है. इससे पहले ग्रीक और लैटिन के साथ भी यही हुआ. अंग्रेजी के टुकड़े होने की शुरुआत हो चुकी है. हिंदी का भविष्य बहुत उज्ज्वल है, मगर वह दीर्घकाल तक नहीं रहेगा. जबकि उसकी अलग-अलग भाषा जो उसकी जड़ों में है, वह हमेशा जिंदा रहेगी और आगे बढ़ेगी.
इन दिनों दुनिया में एक नई भाषा पैदा हो रही है, इमोजी की भाषा. इसका प्रसार और इसके भविष्य के बारे में आपकी क्या राय है?
आजकल लोगों में दिमाग का प्री फ्रंटल एरिया ज्यादा विकसित हो रहा है. उसका काम है नजर से दुनिया को समझना. आवाज की जगह, ध्वनि की जगह. जिसे हम भाषा कहते हैं, वह ध्वनि आधारित रही है.मगर अब भाषा का रूप चित्राधारित ज्यादा होगा. यह सुनकर थोड़ा अचरज लगता है. पहले ध्वनि थी पर जब से लेखन आया तो लेखन भाषा नहीं है, भाषा की छवि है. प्रिटिंग उस छवि का औऱ ज्यादा गहरा रूप है. वह भाषा को चित्रमय करता गया है. अब नये जमाने की डिजिटल टेक्नोलॉजी से भाषा को चित्रमय करने की प्रक्रिया को बहुत सपोर्ट मिला है. इसलिए अब लोग बोलेंगे कम. बोलेंगे, मगर उतना नहीं बोलेंगे.
जब भाषा का आविष्कार नहीं हुआ था तो इंसान हंस सकता था. उसकी हंसने की आवाज सभी भाषाओं में समान है. चाइनीज हंसना और तमिल हंसना अलग नहीं है. उसी तरह आश्चर्य के उद्गार 'ओह' और दर्द के उद्गार 'आह' भी सभी भाषा में समान हैं. ये जरूर बचेंगे पर दुनिया का ज्यादातर आकलन चित्र के माध्यम से होगा. आपने जो कहा इमोजी की भाषा, वह बढ़ती जायेगी. उसका ग्रामर अलग है. उसके पूर्ण विराम, अर्धविराम नहीं है. उसमें एक चित्र से दूसरे की कनेक्टिविटी सजेशन द्वारा हो रही है. चित्र इशारे करते हैं, उन चित्रों के माध्यम से हम दुनिया की चीजें समझ रहे हैं. इससे रीड़िंग हैबिट बदल रही है. आज से तीस साल पहले जो व्यक्ति काफी पढ़ लेता था, वह व्यक्ति भी आज उतना पढ़ नहीं पा रहा. यह वैश्विक प्रभाव है. यह किसी देश या आइडियोलॉजी से जुड़ा नहीं है, लेकिन बॉयोलॉजिकल इवॉल्यूशन से जरूर जुड़ा है.
आपकी नई किताब महाभारत का हिंदी अनुवाद प्रकाशित हुआ है. पटना में ही इसका विमोचन हुआ है. इस किताब का क्या विषय है, इसके जरिए आप क्या कहना चाहते हैं?
व्यास ने जो महाभारत रचा, उसका महत्व उसकी कथा से नहीं है. बल्कि अपने पहले के आठ से नौ साल साल के इतिहास को उन्होंने किस रूप में देखा, वह उसकी हिस्टोरियोग्राफी है. इसमें मिथ, पुराण कथा, इतिहास और काल का अनंत रूप इन सबका अद्भुत मिश्रण बनाया, इस वजह से महाभारत लोगों को बहुत प्रिय लगा. महाभारत ने ही सबसे पहले हमारे देश के लोगों को अतीत की तरफ देखने की दृष्टि प्रदान की है. यह आज भी वैसी ही है. इस वजह से लोग महाभारत को भूतकाल की कृति नहीं मानते हैं. किसी भी युग में महाभारत फिर से प्रासंगिक होता है, उसे लोग नए जोश से स्वीकार करते हैं.
महाभारत ने जिन लोगों को अतीत देखने की एक दृष्टि दी, उन लोगों से मिलकर भारत बनता है. इसलिए यह किताब हमारे राष्ट्र के बारे में भी है. महाभारत मेरा बहुत प्रिय ग्रंथ रहा है, इसका मेरे साथ एक व्यक्तिगत लगाव इसलिए भी है कि मेरा नाम गणेश है, वही गणेश जिन्होंने वेद-व्यास के कहे को लिपिबद्ध किया था.