ओपिनियन: ये कहां आ गए हम...सोशल मीडिया के साथ चलते-चलते!

फेसबुक, इंस्टाग्राम और ट्विटर के लिए आपका गुस्सा पैसा है. जितना विवाद, उतनी ज्यादा इंगेजमेंट, और उतना ही ज्यादा विज्ञापन का मुनाफा. बैठकर बात करने से इन कंपनियों की तिजोरी नहीं भरती, इसलिए 'जहरीली पोस्ट' को एल्गोरिदम खुद धक्का मारता है

सांकेतिक तस्वीर
सांकेतिक तस्वीर

जो प्लेटफार्म अपने दोस्तों-रिश्तेदारों को और करीब लाने को बना था (शायद), वह पिछले 20-22 बरसों में हमारे दोस्तों को बहुत दूर ले जा चुका है. फेसबुक हो चाहे इंस्टाग्राम, दोस्त कहीं नहीं बचे. बची है तो उधार की विचारधारा, कुढ़न और दुनिया भर की नफरत.

कितना अजीब है कि गुलाब की फोटो के साथ 'गुड मॉर्निंग' भेजने का जो सिलसिला शुरू हुआ था, वहां एल्गोरिदम के इतने कांटे बोए जा चुके हैं कि अक्सर ही हमारी उंगलियां छिल-छिल जाती हैं. पहले हिंदू-मुसलमान हुआ, फिर बीजेपी-कांग्रेस और अब ट्रंप-ईरान हो रहा है. राजनीतिक पार्टियों ने इसे बखूबी हथियाया. ट्विटर (एक्स जुबां पर नहीं चढ़ सका) तो एकदम अलग ही कुछ बन चुका है.

मैं भी उन लोगों में से एक हूं जिसे इन सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स की वजह से रोज़गार मिल सका. कइयों का रोज़गार भी इसी सोशल मीडिया ने छीना. जिस फेसबुक को चलाने के लिए कभी मां-बाप से डांट पड़ती थी, उसे चलाने के लिए कंपनियां बाकायदा हायरिंग करने लगीं. लेकिन ये सब शुरू कहां से हुआ था? शुरू से शुरू करते हैं.

शुरुआत बड़ी मासूम थी. साल 2004 के आसपास जब ऑरकुट आया, तो मकसद सिर्फ अपने स्कूल के दोस्तों को ढूंढना और उनकी 'स्क्रैपबुक' पर कुछ लिख देना था. जिस दौर में सोशल मीडिया से मुलाकात हुई, तब ऑरकुट विदा ले रहा था और फेसबुक पर लोगों ने अकाउंट बनाने शुरू कर दिए थे. होता यहां भी ऑरकुट जैसा ही था, दोस्तों की टाइमलाइन पर कुछ पोस्ट करना या विदेशियों को फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजना ही लोग ज्यादा पसंद करते थे. जल्दी ही लोगों ने समझ लिया कि यहां अपनी जिंदगी की कुछ डिटेल्स भी साझा की जा सकती हैं, मसलन दसवीं का रिजल्ट या नौकरी लगने की खबर. लोगों ने अपने प्रोफाइल में स्कूल-कॉलेज और यहां तक कि अपनी कंपनी के नाम भर दिए और देखते ही देखते लोग इसका सहारा मैट्रिमोनियल साइट्स की तरह भी लेने लगे.

फेसबुक थोड़ा और जवान हुआ और कैमरे थोड़े और तीखे. नतीजन अब खूबसूरत और 'कूल' दिखने की होड़ यहां लग गई. ऐसे चुटकुले चलने लगे कि इंसान की असली पर्सनालिटी आधार कार्ड और फेसबुक डीपी के बीच कहीं होती है. और हां चुटकुलों को कैसे भूल सकते हैं? RVCJ, मोटू-पतलू और जोक्स के लिए ना जाने कितने ही पेज बन गए थे यहां, और तब पता चला कि देश में क्या गजब का सेंस ऑफ़ ह्यूमर है. यही पेज आगे चलकर मीम पेज बने और आजकल फनी रील की फैक्ट्री हो लिए हैं. इनमें से कुछ तो इतने बड़े हो गए कि उनका नाम अब आप फिल्मों के प्रोडक्शन पार्टनर्स में भी खोज सकते हैं.

साल आया 2011. जो फेसबुक और ट्विटर अब तक ड्राइंग रूम के एयरकंडीशन सोफों तक सीमित थे, वे एंड्रॉइड की सस्ती लहर पर सवार होकर चाय की टपरियों तक जा पहुंचे. भारत में 'इंडिया अगेंस्ट करप्शन' या अन्ना आंदोलन ने पहली बार यह साबित किया कि ये प्लेटफॉर्म्स सिर्फ फोटो डालने के लिए नहीं, बल्कि सत्ता की चूलें हिलाने के लिए भी इस्तेमाल हो सकते हैं.

साल 2010 के अंत में ही इंस्टाग्राम की भी एंट्री हुई जिसने सोशल मीडिया का पूरा गेम ही पलट दिया. अब शब्दों की जगह तस्वीरों ने ले ली थी. शुरुआत में यह एक ऐसा प्लेटफॉर्म था जहां लोग अपनी छुट्टियों या खाने की धुंधली सी फोटो 'फिल्टर' लगाकर डाल देते थे. लेकिन धीरे-धीरे इसने 'परफेक्शन' की एक ऐसी अंधी दौड़ शुरू की, जिसने हमारी असल जिंदगी और डिजिटल प्रोफाइल के बीच की खाई को गहरा कर दिया.

जल्दी ही इंस्टाग्राम सिर्फ फोटो शेयरिंग ऐप नहीं रहा, बल्कि यह 'स्टेटस सिंबल' और 'इंफ्लुएंसर इकोनॉमी' का गढ़ बन गया. 'लाइक' और 'कमेंट' की चाहत में लोग ऐसा रमे कि अब खाना खाने से पहले उसकी फोटो खींचना ज्यादा जरूरी हो गया. (मैं भी खींचता हूं.) इसी 'विजुअल कल्चर' ने रील के दौर में कदम रखा, जहां 15 सेकंड की वीडियोज ने हमारे अटेंशन स्पैन को खाना शुरू कर दिया. किताबें पढ़नी बोझिल लगने लगीं, 'सेकंड स्क्रीन' का एक बड़ा ही अजीब, डरावना और घटिया कांसेप्ट आया. सीधे शब्दों में कहें तो टीवी देखने के बीच ही लोग अपना फ़ोन भी स्क्रॉल करते रहते हैं क्योंकि उनका 'सेकंड स्क्रीन' उतना रोचक नहीं है.

दिखावे की इस रेस ने युवाओं में हीन भावना और FOMO पैदा किया. खूबसूरती छांटने वाले इस प्लेटफॉर्म पर अब 'बॉडी शेमिंग' और 'लग्जरी लाइफस्टाइल' की फेक नुमाइश ने एक नई किस्म की नफरत और जलन को जन्म दे दिया था.

लेकिन इसी दौर में एक और बड़ी चीज हुई - राजनीतिक पार्टियों को समझ आ गया कि यहां असली खेल वोट का है. यहीं से भारत में 'आईटी सेल' नाम की उस समानांतर सत्ता की नींव पड़ी, जिसने आगे चलकर हमारे मोबाइल स्क्रीन्स को वॉर-ज़ोन्स में बदल दिया. फिर आया Jio का साल, जिसने डेटा इतना सस्ता कर दिया कि सूचनाओं की बाढ़ आ गई, लेकिन हम यह भूल गए कि बाढ़ अक्सर अपने साथ गाद भी लाती है!

2015 आते-आते सोशल मीडिया अब हमारी मर्ज़ी से चलने वाली चीज़ नहीं रहा बल्कि उसने हमें ही अपनी पसंद का गुलाम बना लिया. 'इको चैम्बर्स' की शुरुआत हुई. एल्गोरिदम को ऐसा डिजाइन किया गया कि आपको वही दिखेगा जो आप देखना चाहते हैं. अगर आप खास विचारधारा पसंद करते हैं, तो फेसबुक आपको वही दिखाएगा. नतीजा? हममें से अधिकतर ने अपनी सोच के बाहर की खिड़कियां बंद कर लीं!

इसी दौरान भारत में उदय हुआ 'वॉट्सएप यूनिवर्सिटी' का. इनफार्मेशन (और कई लोगों के लिए तो फैक्ट्स) का सबसे बड़ा सोर्स वह 'फॉरवर्ड' मैसेज बन गया जिसके नीचे लिखा होता था 'Forwarded as received'. हालांकि यह फीचर भी वॉट्सएप में बाद में जोड़ा. इससे पहले "फ़िरोज़ गांधी का असली नाम फ़िरोज़ खान था" वाला मैसेज सबके इनबॉक्स में गिर चुका था.

MIT की एक स्टडी False news spreads faster than the truth के मुताबिक, ये झूठ और नफरत सच से 6 गुना ज्यादा तेजी से भागते हैं. आज आलम ये है कि जिस घर में कभी एक साथ बैठकर खबरें देखी जाती थीं, वहां आज बाप और बेटे अलग-अलग वॉट्सएप ग्रुप्स के जंगजू हैं. इसी तरह की 'अनवेरिफाइड इनफार्मेशन' ने भारत की सड़कों पर मॉब लिंचिंग और अफवाहों का वह दौर शुरू किया, जिसने डिजिटल दुनिया के खून के छींटे जमीन पर दिखा दिए.

पिछले पांच-सात साल को देखें तो लगता है कि अब हम 'नफरत की फैक्ट्री' के सबसे बुरे दौर में हैं. अब यह सिर्फ विचारधारा की लड़ाई नहीं है, यह मोनेटाइजेशन का खेल है. फेसबुक, इंस्टाग्राम और ट्विटर के लिए आपका गुस्सा पैसा है. जितना ज्यादा विवाद, उतनी ज्यादा इंगेजमेंट, और उतना ही ज्यादा विज्ञापन का मुनाफा. बैठकर बात करने से इन कंपनियों की तिजोरी नहीं भरती, इसलिए 'जहरीली पोस्ट' को एल्गोरिदम खुद धक्का मारता है.

अब इसमें तड़का लगा है AI और डीपफेक का. ORF की एक रिपोर्ट बताती है कि भारत में करीब 47 फीसदी लोग अब इस नए डिजिटल खतरे की जद में हैं. अब नफरत फैलाने के लिए टाइप करने की मेहनत भी नहीं करनी पड़ती. फर्जी वीडियो और ऑडियो ही किसी का कैरेक्टर असैसिनेशन करने या दंगा भड़काने के लिए काफी हैं. कैंब्रिज एनालिटिका जैसे कांड ने दुनिया को पहले ही दिखा दिया था कि कैसे हमारी पसंद-नापसंद का डेटा चुराकर पूरे देश की सोच को बदला जा सकता है.

आज हम एक ऐसे मोड़ पर हैं जहां जो प्लेटफॉर्म दोस्तों को जोड़ने के लिए बने थे, वहां 'ब्लॉक' और 'अनफॉलो' सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाले हथियार बन चुके हैं. Pew Research का डेटा 'पॉलिटिक्स ऑनलाइन' बताता है कि 25 फीसदी लोग अब अपने करीबी दोस्तों या रिश्तेदारों को सिर्फ इसलिए ब्लॉक या अनफ्रेंड कर रहे हैं क्योंकि उनकी विचारधारा नहीं मिलती. मैं भी इन 25 फीसदी में शामिल हूं.

डीटूर लेकर टिकटॉक भी लोगों तक पहुंचे. साल 2017-18 के आसपास टिकटॉक ने भारत में कदम रखा. जहां इंस्टाग्राम 'साफ-सुथरे' और 'अमीर' दिखने वाले शहरी लोगों का अड्डा था, वहीं टिकटॉक ने छोटे शहरों, कस्बों और खेतों-खलिहानों में रहने वाले उस तबके को माइक थमा दिया जिसे मुख्यधारा के मीडिया ने कभी नहीं पूछा था. यह सिर्फ एक ऐप नहीं, एक 'सोशियो-इकोनॉमिक रेवोल्यूशन' था. एक दिहाड़ी मजदूर या गांव की गृहिणी भी अपनी 'मेरिट' के दम पर रातों-रात स्टार बन रही थी. इसने मनोरंजन को ज्यादा लोकतांत्रिक बनाया और पहली बार 'आम आदमी' को सीधे ऐड्स और ब्रांड एंडोर्समेंट से कमाई का जरिया दिया.

लेकिन यह डिजिटल बराबरी ज्यादा दिन नहीं चली. टिकटॉक पर होने वाले उस 'कच्चे' और 'देसी' कंटेंट का शुरुआत में कुलीन शहरी वर्ग और तथाकथित 'एलीट इन्फ्लुएंसर्स' ने खूब मजाक उड़ाया. इनमें मेरे जैसे लोग भी शामिल रहे. उन्हें Cringe कहकर खारिज किया गया. मगर जैसे ही भारत में टिकटॉक बैन हुआ, इंस्टाग्राम ने फौरन 'Reels' लॉन्च किया. वही अपर-कास्ट/अपर क्लास इन्फ्लुएंसर्स, जो कल तक टिकटॉक का मजाक उड़ा रहे थे, उन्होंने उसी फॉर्मेट, उन्हीं गानों और उसी 'लिप-सिंक' मॉडल को कॉपी करना शुरू कर दिया.

फर्क सिर्फ इतना था कि अब वही कंटेंट महंगे कैमरा सेटअप और लग्जरी लोकेशंस के साथ परोसा जा रहा था. गरीब और लोअर मिडिल क्लास के टिकटॉकर्स ने जिस क्रिएटिविटी की नींव रखी थी, उसे अमीर इन्फ्लुएंसर्स ने पॉलिश करके अपना बना लिया. टिकटॉकर्स के पास से रोजगार चला गया और इंस्टाग्राम के एलीट वर्ग ने उनके मॉडल पर अपनी नई सल्तनत खड़ी कर ली. हालांकि अब इंस्टाग्राम पर 'लास्ट माइल' के अच्छे-अच्छे इन्फ्लुएंसर्स दिखने लगे हैं.

कुल मिलाकर, हमारी जिंदगी बदल गई. सबकुछ इतना फ़ास्ट पहले कभी नहीं था. कंज्यूम करने की इच्छा आज से पहले कभी इतनी नहीं थी. हम अब खाली नहीं बैठ पाते, मन अजीब सा होने लगता है. हर पल प्रोडक्टिव होने का दबाव है क्योंकि जिम भी करना है, अपनी स्किल सेट भी बढ़ानी हैं, सोशल मीडिया प्रजेंस भी बनानी है, उपन्यास भी पढ़ना है और बिना नाश्ता किए दफ्तर भी जाना है. बहुत मन होता है कि सारे सोशल मीडिया एकाउंट्स बंद कर कहीं गुमनामी की जिंदगी जी सकूं लेकिन मन चोर भी तो उतना ही है. दोस्तों की लाइफस्टाइल से कम्पैरिजन भी करना है, अपनी भी फोटो लगानी है, क्रांतिकारी स्टोरीज भी शेयर करनी है. ऐसे में तो कुछ होना नहीं. होने और ना होने के बीच ऑनलाइन होना है, चाहे हरी वाली बत्ती बुझाकर ही क्यों ना हो.

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