मुंबई के एलीफेंटा से 1500 साल पहले चलता था अंतर्राष्ट्रीय कारोबार!

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) मुंबई के पास एलीफेंटा द्वीप की खुदाई कर रहा है और इस दौरान यहां उसे कई आयातित वस्तुओं के अवशेष मिले हैं

एलीफेंटा में चल रही ASI की खुदाई

मुंबई बंदरगाह के एलीफेंटा द्वीप पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की खुदाई चल रही है. इस दौरान 1,500 साल पुराना पीने के पानी का जलाशय, रोमन एम्फोरा (फूलदान के आकार का एक बर्तन) के टुकड़े और आयातित चीनी मिट्टी के बर्तन व कांच मिले हैं.

सुप्रीटेंडेंट अभिजीत आंबेकर के नेतृत्व में ASI की एक टीम द्वीप के पूर्वी हिस्से में स्थित मोराबंदर में एक स्थल की खुदाई कर रही है. इसका उद्देश्य कालक्रम (chronology) स्थापित करना और द्वीप पर पिछली बस्तियों की प्रकृति और विस्तार का निर्धारण करना है.

अरब सागर में मुंबई से 10 किमी दूर एलीफेंटा या घारापुरी द्वीप पर स्थित एलीफेंटा की गुफाएं चट्टानों को काटकर बनाए गए गुफा मंदिरों के लिए जानी जाती हैं. यह यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थल है. इस द्वीप में तीन गांव शामिल हैं - शेतबंदर, राजबंदर और मोराबंदर, और यह भारत और विदेशों के पर्यटकों के लिए एक आकर्षण का केंद्र है.

यह स्थान कोंकण शिलाहारों की राजधानी रहा होगा. इस राजवंश के अनंतदेव के खरेपाटन शिलालेख पुरी (घारापुरी) का उल्लेख करते हैं. ASI के निष्कर्ष मुंबई और उत्तरी कोंकण सहित आसपास के क्षेत्रों के मध्यकालीन अतीत का अनुमान लगाने में मदद करेंगे. जबकि पश्चिमी भारत में बौद्ध, ब्राह्मणवादी और जैन परंपराओं से जुड़े 900 से अधिक ज्ञात रॉक-कट (चट्टानों को काटकर बनाए गए) स्मारक हैं, इनमें से लगभग 130 मुंबई के पास के द्वीपों पर हैं, जिनमें मुख्य रूप से एलीफेंटा द्वीप और साल्सेट शामिल हैं.

आंबेकर ने कहा कि एलीफेंटा द्वीप में खुदाई से एक आयताकार जलाशय मिला है जो उत्तर की ओर एक लंबवत सीढ़ीदार जंक्शन (T-आकार के सीढ़ीदार टैंक) से जुड़ा है, जो द्वीप पर प्राचीन जल प्रबंधन प्रणालियों पर प्रकाश डालता है. यह द्वीप की अन्य संरचनाओं की तरह चट्टान को काटकर नहीं बनाया गया है, बल्कि द्वीप के निवासियों की पेयजल जरूरतों के लिए इसे निर्मित किया गया था.

आंबेकर बताते हैं, "इस स्थल से महत्वपूर्ण खोजों में से एक विशाल संरचना है जो लगभग 14.7 मीटर लंबी और 6.7 मीटर तथा 10.8 मीटर चौड़ी है. यह T आकार बनाती है. खुदाई अब तक पांच मीटर की गहराई तक पहुंच चुकी है और 20 सीढ़ियां सामने आई हैं. ये सीढ़ियां पत्थरों के उन ब्लॉकों का उपयोग करके बनाई गई हैं जो द्वीप के नहीं हैं."

आंबेकर के मुताबिक यह द्वीप चट्टानों को काटकर बनाए गए अजूबों के लिए जाना जाता था, हालांकि जल भंडारण के लिए उपयोग किए जाने वाले ऐसे हौज पहले भी मिले हैं. उन्होंने आगे कहा, "लेकिन यहां पानी के (भंडारण) के लिए एक सावधानीपूर्वक डिजाइन की गई वास्तुकला है. द्वीप पर वर्षा जल बहुत बड़ी मात्रा में आता है, लेकिन इसके पथरीले इलाके के कारण जमीन में बहुत कम पानी रिस पाता था. मानसून के महीनों के बाद पानी की कमी का सामना करने वाले द्वीप पर ऐसी संरचनाएं एक आवश्यकता बन जाती हैं."

इस टैंक की तुलना गुजरात और राजस्थान की बावड़ियों से की जा सकती है, जहां सीढ़ियां एक केंद्रीय टैंक तक जाती हैं. माना जाता है कि इस स्वरूप की उत्पत्ति 7वीं शताब्दी ईस्वी के आसपास हुई थी, और एलीफेंटा में हुई खोज उसी का एक स्थानीय संस्करण हो सकती है.

पुरातत्वविदों को भारत-भूमध्यसागरीय (रोमन) एम्फोरा के टुकड़े, अन्य आयातित चीनी मिट्टी की चीजों और कांच के साथ मिले हैं, जो संकेत देते हैं कि यह द्वीप लंबी दूरी के व्यापार नेटवर्क का हिस्सा था. आंबेकर ने कहा कि एलीफेंटा द्वीप जहाजों के लिए लंगर डालने का स्थान रहा होगा, और माल को कल्याण, ठाणे और आगे उल्हास क्रीक के माध्यम से मुख्य भूमि तक ले जाने के लिए छोटे जहाजों पर लादा जाता होगा, और माल ढोकर यहां भा लाया जाता होगा.

खुदाई में आयातित चीनी मिट्टी की वस्तुएं भी मिली हैं, जिनमें फीरोजा रंग के चमकीले बर्तनों  के कुछ टुकड़े और मेसोपोटामिया मूल के टॉरपीडो जार और भूमध्यसागरीय क्षेत्र के एम्फोरा जार के 3,000 से अधिक बर्तनों के टुकड़ों का एक संयुक्त भंडार शामिल है. मेसोपोटामिया के टॉरपीडो जार और भूमध्यसागरीय एम्फोरा महत्वपूर्ण प्राचीन समुद्री वाणिज्यिक बर्तन थे, जो शराब, तेल और मछली के सॉस सहित तरल वस्तुओं का परिवहन करते थे.

ASI ने कहा कि भूमध्यसागरीय एम्फोरा प्रारंभिक ऐतिहासिक काल से प्रचलित थे, हालांकि टॉरपीडो जार बाद में (लगभग दूसरी या तीसरी शताब्दी ईस्वी के आसपास) उभरे, जिनमें विशिष्ट बिटुमेन-लाइन वाले , बिना हैंडल वाले और लंबे आकार थे जो खाड़ी और हिंद महासागर में थोक परिवहन को सक्षम बनाते थे.

टीम ने 11 सिक्के भी बरामद किए हैं, जिनमें छह तांबे के और पांच सीसे के बने हैं. इस इलाके से मिले इन तांबे के सिक्कों में से दो की पहचान पुणे के डेक्कन कॉलेज पोस्ट-ग्रेजुएट एंड रिसर्च इंस्टीट्यूट के प्रोफेसर अभिजीत दांडेकर ने कलचुरी राजवंश के कृष्णराज के सिक्कों के रूप में की है. 

मोराबंदर में एक अन्य स्थल से काफी बड़े आकार के दो बड़े भंडारण जार मिले हैं- एक लगभग 1.25 मीटर लंबा है और दूसरे टूटे हुए जार का व्यास 1.22 मीटर है. यह खोज उल्लेखनीय है क्योंकि यह माल के भंडारण के लिए गोदामों के रूप में पहचानी गई संरचनात्मक खोजों के करीब स्थित है. यहां लोहे की सिल्लियों और एक पत्थर के लंगर के अलावा, एम्फोरा और टॉरपीडो जार के टुकड़ों की एक बड़ी मात्रा भी मिली है.

इसके अतिरिक्त, 80 मीटर की दूरी पर, ईंटों से बना एक पानी का टैंक और चट्टान को काटकर बनाया गया एक पानी का टैंक मौजूद है, जिनका उपयोग स्पष्ट रूप से कपड़ा रंगाई की प्रक्रिया में किया जाता था, जिन्हें रंगाई के कुंड के रूप में पहचाना जा सकता है. आंबेकर के मुताबिक इतने बड़े भंडारण जार की खोज महत्वपूर्ण है, जो शायद पानी के भंडारण के लिए उनके उपयोग का संकेत देती है. ईंटों से बने और चट्टान काटकर बनाए गए टैंक, भंडारण जार के साथ मिलकर, इस स्थल पर संभावित कपड़ा-रंगाई गतिविधियों का सुझाव देते हैं.

किंवदंती के अनुसार, घारापुरी राक्षस राजा बाणासुर की शाही गद्दी थी, जिसकी बेटी का विवाह भगवान कृष्ण के पोते अनिरुद्ध से हुआ था. महाराष्ट्र और गोवा के ऐतिहासिक भूगोल पर अपने काम में, मुंबई के एलफिंस्टन कॉलेज के इतिहास विभाग के पूर्व प्रमुख एच.एस. थोसर लिखते हैं कि एलीफेंटा द्वीप और अनिरुद्ध के बीच किसी तरह का ऐतिहासिक संबंध था. यह भी संभव है कि अनिरुद्धपुरी, जो त्रैकुटक राजवंश की शाही गद्दी थी, जिनका अधिकार क्षेत्र उत्तरी कोंकण तक फैला था, इसी द्वीप के समान थी.

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