इंडिया टुडे आर्काइव | डिजिटल लत कैसे आपका दिमाग 'खराब' कर रही; इससे छुटकारा कैसे पाएं?
इन दिनों फोन या कंप्यूटर स्क्रीन की लत में सिर्फ युवा और किशोरवय लड़के-लड़कियां ही नहीं, बड़े-बुजुर्ग भी फंस गए हैं और इसके चलते कई मानसिक समस्याओं का शिकार भी बन रहे

दिल्ली की 12 वर्षीया अमृता (बदला हुआ नाम) हर सुबह फेसबुक पर अपने 592 दोस्तों को बताती है कि एक दिन पहले उसने क्या-क्या किया. स्कूल में पढ़ने वाली इस लड़की के पास पोस्ट करने को बहुत कुछ है. वह कहती है, ''मैं सुबह 4.30 बजे जगती और 8 बजे तक पढ़ती हूं.’’
ऑनलाइन कक्षाओं के बीच मिले वक्त में वह तेजी से मशक्कत भरे वर्कआउट करती है. स्कूल के बाद ऑनलाइन गिटार सीखती है और फिर होमवर्क पूरा करती है. हाल ही में अमृता ने रात का खाना बनाकर अपनी मां को चकित कर दिया, पर यह भी उसने महज ऑनलाइन तस्वीरें पोस्ट करने के लिए किया.
(यह रिपोर्ट इंडिया टुडे के 11 मई, 2022 के अंक में प्रकाशित हुई थी)
वे कहती है कि फेसबुक पर मिलने वाले 'लाइक्स’ और 'वाव्स’ उसे ऊर्जा देते हैं. नकारात्मक कमेंट पढ़कर अलबत्ता उसके आंसू फूट पड़ते हैं. कभी-कभी तो वह रात भर फोन पर होती है और बिना सोचे-समझे फेसबुक पर स्क्रॉल करती रहती है. कुछ रातों को तो वह महज दो घंटे सोती है.
उसका कहना है, ''मुझे शांति मिलती है. मेरा मन शांत हो जाता है.’’ मगर उसे इसकी क्या कीमत चुकानी पड़ी? वह अनिद्रा की शिकार है और इन दिनों दिल्ली के एम्स में बिहेवियरल एडिक्शन क्लिनिक जाती है, जो संस्थान का इंटरनेट, फोन, गेमिंग और सोशल मीडिया की लत के लिए मनोचिकित्सा ओपीडी है.
ऐसे समय में जब हमारा सारा ध्यान कोविड-19 पर लगा है, हम अपने चारों ओर खामोशी से पैर पसार रही एक और महामारी से बेखबर हैं. वह है डिजिटल दासता की बीमारी. इसने छोटे बच्चों और यहां तक कि नन्हे-मुन्नों को भी अपने नागपाश में जकड़ लिया है और किशोरों तथा वयस्कों, दोनों को समान रूप से तंग कर रही है.
जो कभी फुरसत का शगल हुआ करता था, धीरे-धीरे हमारी जिंदगियों पर बुरी तरह हावी हो गया. सोशल मीडिया के आगमन से चीजें और बदतर हो गईं. इसने हमारे सामने दुनिया खोल दी, पर हमें दुनिया से काट भी दिया. देश में डिजिटल की बढ़ती पैठ सराहनीय थी, पर इसने मुसीबत को चौतरफा फैलने में मदद भी की.
2020 के साथ महामारी आई, जब डिजिटल यंत्र वरदान के साथ अभिशाप भी बन गए. ये अकेलेपन का इलाज भी बने और उसका कारण भी. फिर तो यह बस समय की ही बात थी कि खतरे की घंटियां बज उठीं-एकाग्रता की घटती अवधि, व्यवहार में तब्दीलियां, दुश्चिंता, अनिद्रा, अवसाद, गुस्सा, हिंसा.
आपदा के प्रति सतर्क होते स्कूलों और अस्पतालों ने काउंसिलिंग और इस लत से छुटकारा पाने की सुविधाएं देना शुरू किया. लोग भी झुंड के झुंड इलाज के लिए टूट पड़े, रिहैब सेंटर पहुंचे या खुद ही नियम-कायदों को अपना लिया. मगर आइए पहले इस दैत्य की फितरत को जानते हैं.
डिजिटल लत क्या है?
इसे स्क्रीन, डिजिटल, इंटरनेट या सोशल मीडिया की लत कहिए, पर इस बुराई की जड़ डिजिटल सेवाओं का अत्यधिक इस्तेमाल है. वीवो-सीएमआर (साइबर मीडिया रिसर्च) के 'स्मार्टफोन ऐंड देयर इम्पैक्ट ऑन ह्यूमन रिलेशनशिप, 2021’ शीर्षक अध्ययन से नई दिल्ली, बेंगलूरू, हैदराबाद, चेन्नै, मुंबई, पुणे, अहमदाबाद और कोलकाता के 18-25 वर्ष आयु वर्ग के 2,000 लोगों से बातचीत की गई.
उसमें पता चला कि 84 फीसद लोग जागने के 15 मिनट के भीतर फोन चेक करते हैं और 46 फीसद एक घंटे में कम से कम पांच बार फोन उठाते हैं. ज्यादातर लोगों ने माना कि फोन के अत्यधिक इस्तेमाल से उनकी शारीरिक-मानसिक सेहत ही नहीं, बल्कि रिश्ते भी प्रभावित हो रहे हैं. इसके बावजूद 74 फीसद ने कहा कि वे अपने फोन से दूर नहीं रह सकते और इसके बगैर चिड़चिड़े और अवसादग्रस्त हो जाते हैं.
पुणे विश्वविद्यालय की 21 वर्षीया छात्रा प्रतिष्ठा खट्टर कहती हैं, ''मेरी प्रॉब्लम यह है कि आज मोबाइल फोन के बगैर जिंदगी नाममुकिन है. मैं जानती हूं कि ओवरयूज होता है पर मुझे सीमारेखा का नहीं पता और मुझे यह भी नहीं पता कि इससे मुझे क्या नुक्सान हो रहा है.’’ मगर अजिंक्य डीवाइ पाटील ग्रुप के चेयरमैन डॉ. अजिंक्य डी.वाइ. पाटील बताते हैं, ''स्क्रीन टाइम की लत वास्तविक है और इसके नतीजे बहुत गंभीर हैं.’’
दरअसल, इंडियन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स की 2021 की 'इंडियन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स गाइडलाइंस ऑन स्क्रीन टाइम ऐंड डिजिटल वेलनेस इन इनफैंट्स, चिल्ड्रेन ऐंड एडोलसेंट्स’ शीर्षक रिपोर्ट में खौफनाक खुलासा हुआ कि दो महीने के नन्हें शिशु भी मोबाइल फोन के संपर्क में आ रहे हैं.
देश में नवजात बच्चे औसतन 10 महीनों के भीतर स्मार्टफोन (96 फीसद) और टीवी स्क्रीन (89 फीसद) के साथ पहले संपर्क आ जाते हैं. यह तब है जब अमेरिकी एकेडमी ऑफ पीडिएट्रिक्स 18 महीने से छोटे बच्चों को डिजिटल मीडिया से पूरी तरह दूर रखने और दो से पांच साल के बच्चों को दिन में केवल एक घंटे इसके संपर्क में आने की सिफारिश करती है.
किशोर-किशोरियों के इस डिजिटल प्रलोभन का शिकार होने का सबसे ज्यादा अंदेशा होता है, जिसकी तस्दीक 2021 में 19 भारतीय शहरों में किए गए और मेडिकल जर्नल द बीएमजे में प्रकाशित 50 अध्ययनों का ऊंचे स्तर पर किया गया विश्लेषण भी करता है. उसमें पाया गया कि कॉलेज जाने वाले छात्रों में इंटरनेट की लत का जोखिम 20 और 40 फीसद के बीच था.
डिजिटल जिंदगी आजकल इस कदर हावी है कि लोग हर रात अपने डिजिटल यंत्रों से चिपके रहते हैं. बेंगलूरू के 29 वर्षीय इंजीनियर ओंकार कपूर स्वीकार करते हैं, ''मोबाइल फोन पर जब तक खबरें नहीं पढ़ लेते, हम सो नहीं पाते. यहां तक कि कभी-कभी तो अचानक कुछ याद आने पर बीच रात में भी हाथ मोबाइल फोन की तरफ बढ़ जाता है.
मैं जानता हूं, यह सेहत के लिए अच्छा नहीं है, पर कई बार मैं बिल्कुल ही जाने-समझे बगैर ऐसा करता हूं.’’ दरअसल पिछले महीने मैट्रेस कंपनी वेकलिफ्ट ने छह महीनों के दौरान एकत्र 2,00,000 से ज्यादा जवाबों का संकलन जारी किया, जिसमें 87 फीसद ने कबूल किया कि सोने से पहले फोन का इस्तेमाल करना उनकी बाध्यता है.
डिजिटल लत के इस पिशाच को सोशल मीडिया खुराक दे रहा है. भारत 40 करोड़ यूजर के साथ सोशल नेटवर्किंग के दिग्गज प्लेटफॉर्म फेसबुक का सबसे बड़ा यूजर आधार है. दुनिया में व्हाट्सऐप के भी सबसे ज्यादा 50 करोड़ यूजर हमारे यहां हैं.
ग्लोबल वेब इंडेक्स की 2019 की सोशल मीडिया ट्रेंड्स रिपोर्ट 45 देशों में किए गए एक सर्वे के नतीजों का जिक्र करती है, जिसमें 2,78,000 लोगों ने हिस्सा लिया और उनमें 15,000 भारतीय थे. इससे पता चला कि हमारे देश में डिजिटल उपभोक्ता रोज करीब 2.4 घंटे सोशल नेटवर्कों और मैसेजिंग पर खर्च करते हैं, जो 2.24 घंटे के वैश्विक औसत से थोड़ा ज्यादा है.
कभी जिसे समाज के लिए प्रौद्योगिकीय वरदान की तरह देखा जाता था, जल्द ही जहर भरा प्याला बन गया. जब सोशल मीडिया की शुरुआत हुई, इसकी बदौलत लोग दुनिया भर में दोस्तों के साथ जुड़ पाते थे, नए रिश्ते बनाते और समान विचारों वाले लोगों के साथ गपशप करते थे. वे दुनिया की अन्य संस्कृतियों के संपर्क में आते और अपनी विश्वदृष्टि का विस्तार करते थे.
दिल्ली विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र की प्रोफेसर और द फैमिली इन इंडिया-स्ट्रक्चर ऐंड प्रैक्टिस (2007) की संपादक तुलसी पटेल कहती हैं, ''संयुक्त परिवारों के टूटने से शुरू में सोशल मीडिया ने एकल परिवारों के हरेक व्यक्ति को जुड़ने का मौका दिया.’’ ऑनलाइन डेटिंग ऐप बंबल ने 2021 में 2,000 भारतीयों का सर्वे किया और पाया कि उनमें 72 फीसद मानते थे कि वे ऑनलाइन प्यार में पड़ सकते हैं और करीब आधे लोगों को लगता था कि डिजिटल माध्यम पर डेट करना नया चलन है.
जो सोशल मीडिया सुविधाजनक मालूम देता था, जल्द ही जरूरत और फिर व्यसन में बदल गया. अमेरिकी वेबसाइट एडिक्शनसेंटर डॉट कॉम सोशल मीडिया की लत को इस तरह परिभाषित करती है कि यह ''व्यवहारगत व्यसन है जिसका लक्षण सोशल मीडिया के बारे में अत्यधिक चिंता करना और सोशल मीडिया के लिए इतना अधिक समय समर्पित करना है कि जिससे जीवन के अन्य महत्वपूर्ण क्षेत्रों को हानि पहुंचती हो.’’
फिर आए ओटीटी और गेमिंग प्लेटफॉर्म और उनके साथ आया बिंज-वॉचिंग, यानी टीवी धारावाहिकों के कई सारे एपिसोड एक साथ और लगातार देखना, और ऑनलाइन गेमिंग का उभार. मीडिया कंपनी डेंत्सू के डेटा साइंस विभाग ने 2020 में 570 भारतीयों (78.5 फीसद जेन जेड और 21.5 फीसद मिलेनियल्स) पर एक अध्ययन किया, जिससे भारत में बिंज वॉचिंग में 23 फीसद की बढ़ोतरी का पता चला. 17 से 35 वर्ष के करीब आधे लोगों ने डिजिटल सामग्री देखते हुए दिन में आठ से नौ घंटे बिताए, जो दिन में चार घंटों के वैश्विक औसत से लगभग दोगुना था.
ऑनलाइन गेमिंग में उछाल और भी ज्यादा है. इस कदर कि विश्व स्वास्थ्य संगठन ने 'गेमिंग विकार’ को अब मानसिक रोग के रूप में वर्गीकृत किया है. बोस्टन कंसल्टिंग ग्रुप की 2021 की रिपोर्ट के मुताबिक, जिसने भारत में 21 जगहों पर 3,200 लोगों से बातचीत की, इस क्षेत्र में सबसे ज्यादा यूजर भारत में बढ़े हैं, जिनमें 2019-20 में 40 फीसद की बढ़ोतरी हुई.
इंडिया मोबाइल गेमिंग रिपोर्ट 2021 कहती है कि गेमिंग के लिए मोबाइल फोन के इस्तेमाल में सबसे ज्यादा बढ़ोतरी तीसरे दर्जे के शहरों में हुई है. 2020-21 में गेमर की संख्या में बिहार के सीवान में 123 फीसद और छत्तीसगढ़ के बईमानगोई में 179 फीसद इजाफा हुआ. रिपोर्ट में 2020 और 2021 के बीच गेमर की संख्या में 170 फीसद बढ़ोतरी तीसरे दर्जे के शीर्ष 30 शहरों में दर्ज की गई.
क्या है जो हमें बांधता है?
दिल्ली स्थित मानव व्यवहार और संबद्ध विज्ञान संस्थान (आइएचबीएएस या इहबास) के डायरेक्टर डॉ. निमेश देसाई कहते हैं, ''सोशल मीडिया इनामों की जटिल प्रणाली के जरिए आपको अपनी तरफ खींचता है और यही इनाम आपके दिमाग में खुशी के हॉर्मोन छोड़ते है.’’ 2020 में यूसीएलए के ब्रेन मैपिंग सेंटर पर शोधकर्ताओं ने इंस्टाग्राम से मिलते-जुलते ऐप का इस्तेमाल करके 32 किशोरों के दिमाग की मैपिंग की.
उन्होंने पाया कि जब भी किसी को 'लाइक’ मिलता, हर बार उसके मस्तिष्क के रिवार्ड सेंटर या पुरस्कार केंद्र सक्रिय हो जाते. जब मस्तिष्क को 'रिवार्ड’ मिलता है, तब वह उस व्यवहार या गतिविधि को सकारात्मकता के साथ जोड़ने लगता है और सक्रिय रूप से इसकी और ज्यादा मांग करता है. यह संतोष मादक पदार्थों, खाने, शराब या धूम्रपान से मिलने वाले संतोष की तरह होता है.
युवाओं में ऐसे इनामों के प्रति प्रतिक्रिया करने की ज्यादा प्रवृत्ति होती है. निमहांस (राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य और विज्ञान संस्थान) के मनोचिकित्सक डॉ. मनोज शर्मा, जो संस्थान का सोशल मीडिया व्यसन मुक्तिम केंद्र भी चलाते हैं, कहते हैं, ''यही वह समय है जब आप सीखते हैं कि तारीफ क्या है और क्या नहीं है. सोशल मीडिया वह जगह है जहां आप यह सीखते हैं.
यह दिमाग में पॉजिटिव हॉर्मोन के इंजेक्शन की तरह है.’’ नोटिफिकेशन, रीट्वीट, लाइक, शेयर और कमेंट का धाराप्रवाह आना इन दिनों कई छोटे बच्चों के लिए सोशल रिवार्ड की तरह है, जो उनके दिमाग में ऑक्सीटोसिन और डोपामाइन सरीखे 'हैपी हॉर्मोन’ की तेज धारा प्रवाहित करता है और तंत्रिका तंत्र के सर्किट को इस तरह जोड़ देता है कि उनमें इसकी और भूख जग जाती है. दिमाग के रिवार्ड सेंटर अपने बारे में बात करते वक्त भी सबसे ज्यादा सक्रिय होते देखे गए हैं.
हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं का अनुमान है कि लोग ऑफलाइन 30-40 फीसद वक्त खुद के बारे में बात करते हैं, तो ऑनलाइन यह 80 फीसद है. इस तरह अपने बारे में महज एक तस्वीर पोस्ट करने या लिखने के कृत्य मात्र से हैपी हॉर्मोन उत्सर्जि-त होते हैं, जो इसी व्यवहार को दोहराने के लिए प्रोत्साहित करते हैं.
डॉ. शर्मा बताते हैं, ''नौजवानों में आत्मनियंत्रण का तंत्र कम विकसित होता है और वे पुरस्कार की आकांक्षा करने वाले व्यवहार के ज्यादा तेजी से लत में पड़ सकते हैं. सोशल मीडिया के इस्तेमाल के लिए ऑनलाइन होने का मतलब यह भी है वे ऑनलाइन पुरस्कृत करने वाले व्यवहार की और ज्यादा तलाश में होते हैं, जैसे गेम्स या टीवी शो या पोर्न.’’
सबसे ज्यादा पुरस्कृत करने वाला व्यवहार ऑनलाइन गेमिंग प्लेटफॉर्म से आता है, जिसमें दरअसल हर काम के लिए पुरस्कार या रिवार्ड होता है. डॉ. शर्मा कहते हैं, ''मैंने ऐसे मरीज देखे हैं जो गेम खेलना जारी रखने के लिए कुछ भी कर गुजरेंगे.’’ गेमिंग की यह लत कभी-कभी उग्र रूप धारण कर लेती है और यह तथ्य इसी साल भारत के छोटे शहरों के दो मामलों से स्पष्ट हुआ.
राजस्थान के नागौर में 16 बरस के एक लड़के ने अपने 12 बरस के कजिन की हत्या वह कर्ज चुकाने के लिए कर दी जो ऑनलाइन गेम खेलते वक्त उस पर चढ़ गया था. वहीं छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में 19 साल के वासु विश्वकर्मा ने खुद अपने अपहरण का फर्जी नाटक रचा ताकि फिरौती की रकम से पबजी खेल सके. बेंगलूरू के ऑर्किड्स- द इंटरनेशनल स्कूल की पानाथुर शाखा की प्रिंसिपल सकीना कासिम जैदी मानती हैं, ''बच्चे इन दिनों स्क्रीन पर वीडियो गेम और अन्य गतिविधियों में बहुत सारा समय बिता रहे हैं.’’
बर्मिंघम यूनिवर्सिटी के 2020 के एक अध्ययन ने छह साल तक गेम खेलने वालों का अनुसरण किया और पाया कि उनमें 90 फीसद इस तरह गेम खेलते थे जो उनके लिए नुक्सानदायक नहीं था. मुंबई की नेहा राय कहती हैं कि इस अध्ययन पर भरोसा करते हुए उन्होंने अपनी नौ साल की बेटी को उसके मोबाइल फोन पर कार्दाशियान डिजिटल गेम्स खेलने दिए. राय की नजर से यह बात चूक गई कि इसी अध्ययन में यह भी कहा गया था कि निचले स्तर के सामाजिक व्यवहार से यह गेम खेलने वालों में इसकी लत लगने का जोखिम बढ़ गया था. राय और उनकी बेटी दोनों अब काउंसिलिंग ले रही हैं.
गेमिंग की लत हालांकि केवल बच्चों को ही नहीं है. सॉफ्टवेयर कंपनी नॉर्टनलाइफलॉक की डिजिटल वेलनेस रिपोर्ट 2022 ने शहरों में रह रहे 1,572 वयस्कों का सर्वे करके पाया कि 60 फीसद माता-पिता भी मोबाइल गेम्स खेलते हुए उतना ही वक्त बिता रहे हैं जितना उनके बच्चे बिता रहे हैं. माता-पिता में डिजिटल साक्षरता का कम होना भी ऑनलाइन लत की आग को हवा दे रहा है.
बॉम्बे स्कॉटिश स्कूल की प्रिंसिपल सुनीता जॉर्ज कहती हैं, ''कई माता-पिता में डिजिटल जागरूकता का अभाव है और बच्चे इतने स्मार्ट हैं कि उन्हें भरोसा दिला देते हैं कि वे देख-रेख और पाबंदियों के बिना फोन का इस्तेमाल कर सकते हैं.’’ नतीजा? 857 पोर्न साइटों पर भारत में पाबंदी के बावजूद इंडिया चाइल्ड प्रोटेक्शन फंड के 2020 के अध्ययन से पोर्न देखने में 95 फीसद बढ़ोतरी का पता चला.
आप पर यह कैसे असर डालता है?
लगातार बढ़ते प्रमाणों से सिद्ध होता जा रहा है कि डिजिटल उपकरणों का अत्यधिक इस्तेमाल हमारी भावनात्मक, शारीरिक और सामाजिक सेहत पर असर डालता है. सबसे खौफनाक दावा यह है कि ऑनलाइन रहने से हमारा दिमाग ही बदल सकता है.
हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में चल रहे अनुसंधान बताते हैं कि बच्चे फोन का इस्तेमाल करने के कारण समय से पहले परिपक्व हो रहे हैं, क्योंकि उनके दिमाग की सबसे बाहरी परत, कॉर्टेक्स या बाह्य झिल्ली, जो मानव शरीर की पांचों इंद्रियों से प्राप्त जानकारी को संसाधित करती है, समय से पहले मोटी हो रही है.
चिकित्सा विशेषज्ञ इस परिघटना को न्यूरोप्लास्टिसिटी कहते हंय और यह सोशल मीडिया का बहुत ज्यादा इस्तेमाल करने वालों में घटती बताई गई है. 'ऑनलाइन ब्रेन’ पर पबमेड पर प्रकाशित 2019 का जो अध्ययन यह बताता है, वह यह भी कहता है कि सोशल मीडिया का अत्यधिक इस्तेमाल करने से ट्रांजेक्टिव मेमोरी या आदान-प्रदान की स्मृति घट जाती है, जो तय करती है कि किस जानकारी को रखना है और किसे भूल जाना है.
चिंताजनक बात यह है कि संज्ञान से जुड़े ऐसे मुद्दे शैशवावस्था में ही आने लगे हैं. विकास और व्यवहार से जुड़ी बाल रोग विशेषज्ञ और दिल्ली में बाल विकास केंद्र्र कंटीन्यूओ किड्स की डायरेक्टर और सह-संस्थापक डॉ. हिमानी नरूला कहती हैं, ''डिजिटल एक्स्पोजर से शिशुओं में बोलने और भाषा और यहां तक कि सामाजिक हुनर भी देर से विकसित होते दिखाई दिए हैं.’’
डिजिटल के अत्यधिक इस्तेमाल से लोगों के रूप में हमारा विकसित होना भी प्रभावित हो सकता है. एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स के यूपी चैप्टर की प्रेसिडेंट डॉ. पियाली भट्टाचार्य कहती हैं, ''स्क्रीन का दिमाग की तंत्रिकाओं पर सीधा असर पड़ता है. स्क्रीन देखते वक्त ऑनलाइन अनुभव की गई तमाम जानकारियों और स्थितियों के कारण हमारे तंत्रिका सर्किट के तार फिर जुड़ जाते हैं.’’ बढ़ते स्क्रीन समय को अब आंख और गर्दन की परेशानियों, मोटापे और दिल के मसलों से भी जोड़ा जा रहा है.
शारीरिक परेशानियां पैदा करने के अलावा ऑनलाइन व्यसन लोगों के सामाजिक और भावनात्मक हुनर को भी खतरे में डाल रहा है. दिल्ली के सर गंगाराम अस्पताल के बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. पंकज कहते हैं, ''आज बच्चों को सारा मनोरंजन स्क्रीन पर मिल जाता है. उन्हें परिवार या दोस्तों की जरूरत महसूस नहीं होती. मीडिया उनके लिए एकतरफा संवाद है, यह सवाल नहीं पूछता, बस जवाब देता है.
इसीलिए छोटे बच्चे ऑफलाइन बात या संवाद करने की जरूरत महसूस नहीं करते. हमें दो और तीन साल के कई बच्चे मिलते हैं, जो बोलते नहीं, बस इशारे करते हैं. उन्हें कुछ भी पढ़ने या सीखने का मन नहीं करता, कार्टून और फोन का आराम ही काफी है.’’ जैदी यह चीज स्कूल जाने वाले बच्चों में भी देखती हैं. वे कहती हैं, ''बच्चे परिवार के साथ वक्त गुजारने या अपनी भावनाएं साझा करने से बचते हैं, जो भावनारहित एकांत जिंदगी की तरफ ले जाता है और उन्हें यथार्थ से दूर रखता है.’’
सोशल मीडिया की वजह से मनोबल भी कम हो रहा है. डिजिटल दुनिया में लाखों लोगों की जिंदगियों के किस्से बखाने जाते हैं, जिससे कई लोग उन चीजों के लिए लालायित हो उठते हैं जो उन्हें लगता है कि दूसरों के पास हैं. इस परिघटना को एफओएमओ या फोमो के जरिए बयान किया जाता है, जो फियर ऑफ मिसिंग आउट या चूक जाने के डर का संक्षिप्त रूप है.
न्यूयॉर्क के यूनियन कॉलेज के शोधकर्ताओं ने 2015 में शहर के करीब 600 लोगों के दो सर्वे किए और पाया कि जिन लोगों को लगातार ऑनलाइन फीडबैक की जरूरत थी, उनमें आत्मसंशय और उससे जुड़ी दुश्चिंाता का स्तर ज्यादा था. मुंबई के मनोचिकित्सक डॉ. हरीश शेट्टी कहते हैं, ''बहुत ज्यादा आत्मसंशय से घिरे लोग ऑनलाइन विशाल सोशल मंडली बनाकर उसकी भरपाई करते हैं. इनका ऑनलाइन बर्ताव बिल्कुल अलग होगा.’’
यह ट्रोलिंग के बारे में भी सच है. बहुत छोटे-छोटे ऑफलाइन व्यवहार, जिनकी वजह से हमारा दिमाग भावनात्मक सूत्र पकड़ता है, ऑनलाइन नदारद हैं. डॉ. शर्मा कहते हैं, ''साइबरस्पेस में आप देख नहीं सकते कि आपके शब्द दूसरों पर कैसा असर डाल रहे हैं, क्योंकि वहां ज्यादातर टेक्स्ट संदेशों का आदान-प्रदान होता है. वर्चुअल दुनिया में किसी का दिल दुखाने वाली बात कहना उस शख्स के मुंह पर कहने के मुकाबले आसान है.’’
डूमस्क्रॉलिंग यानी युद्ध, अपराध, कोविड, आर्थिक तबाही सरीखी नकारात्मक खबरों के लगातार संपर्क में आना ऑनलाइन खब्त का एक और नतीजा है. बेंगलूरू के कपूर कहते हैं, ''मैं डूमस्क्रॉल करता हूं. मेरी पत्नी भी करती हैं. हम मोबाइल पर खबरें पढ़े बगैर सो नहीं पाते, और खबरें ज्यादातर हमेशा ही नकारात्मक होती हैं.’’ वेकफिट के अध्ययन ने पाया कि 57 फीसद लोग हर रात डूमस्क्रॉलिंग करते थे. ऐसी दुश्चिंमता महामारी के दौरान चरम पर पहुंच गई जब जानकारियों और गलत जानकारियों की बाढ़ ने घरों में कैद लोगों की मानसिक सेहत कर कहर बरपा दिया.
मगर डिजिटल डिवाइस का प्रलोभन इतना तगड़ा था कि नॉर्टनलाइफलॉक की डिजिटल वेलनेस रिपोर्ट से पता चला कि जेन एक्स के 65 फीसद लोग ऑनलाइन रहने की खातिर अपनी नींद और खाना कुर्बान करने को खुशी-खुशी तैयार थे. डॉ. पाटील कहते हैं, ''असली खतरा इस व्यवहार को अनियंत्रित चलते रहने देने में है.’’ मदद सामने है, बशर्ते आप लेने को तैयार हों.
डिजिटली डिटॉक्स कैसे हों
डिजिटल के अत्यधिक इस्तेमाल से पैदा चिंताओं के जवाब में भारत में बीते एकाध साल में कई डिजिटल व्यसन मुक्ति केंद्र खुल गए हैं. दिसंबर 2021 में तमिलनाडु सभी सरकारी मेडिकल कॉलेजों और अस्पतालों में इंटरनेट व्यसन मुक्ति केंद्र शुरू करने वाला पहला राज्य बन गया. उसके नक्शेकदम पर चलते हुए केरल सरकार ने भी राज्य में बच्चों के लिए डिजिटल व्यसन मुक्तिक केंद्र की योजना का ऐलान किया.
अक्तूबर में कोझिकोड डिस्ट्रिक्ट लीगल सर्विसेज सोसाइटी ने जिले के स्वास्थ्य विभाग के साथ मिलकर इंटरनेट एडिक्शन की पहचान में के लिए क्लिनिक ई-मोचन शुरू किया ताकि रोग का जल्द पता लगाकर असरदार इलाज किया जा सके. बेंगलूरू के साकरा वर्ल्ड हॉस्पिटल, चंडीगढ़ के आर्या अस्पताल, पुणे के आनंदवन एडिक्शन लिबरेशन ऐंड रिहैबिलिटेशन सेंटर और वडोदरा, गुजरात के अल्फा हीलिंग सेंटर सरीखे कई निजी केंद्रों ने भी गेमिंग, डिजिटल और इंटरनेट के लिए कार्यक्रम शुरू किए हैं.
इस बीच एम्स और निमहांस के बिहेवियर क्लिनिक ने बीते दो साल में डिजिटल लत का इलाज करवाने के इच्छुक मरीजों की तादाद में बढ़ोतरी बताई. डॉ. शर्मा कहते हैं, ''इसे जल्द से जल्द पहचानकर काउंसलिंग लेना जरूरी है. लोग अक्सर उलझन में होते हैं और इनकार करते हैं क्योंकि डिजिटल यंत्रों का इस्तेमाल आज सामान्य हो गया है. लेकिन आपको लगता है कि डिवाइस के बगैर नहीं रह सकते या इंटरनेट का इस्तेमाल करते वक्त गुस्सा, तनाव या अवसाद महसूस होता हो, तो विशेषज्ञ की सलाह लेने का यही समय है.’’
गुरुग्राम के 19 वर्षीय ईशान सक्सेना (बदला हुआ नाम) के मामले में गेमिंग की लत माता-पिता के प्रति हिंसक व्यवहार में सामने आई. उसके कारोबारी पिता कहते हैं, ''महामारी की वजह से हमने उसे स्कूल और कॉलेज के बीच एक साल का गैप लेने दिया. वह वर्ल्ड ऑफ वारक्राफ्ट खेलकर वक्त गुजारता. रोज 15-15 घंटे खेलने लगा और हमें पता भी नहीं चला.’’
मुश्किल तब शुरू हुई जब ईशान का चार बरस का छोटा भाई भी उससे गेम सीखने लगा. पिता कहते हैं, ''हमने दोनों भाइयों को अलग कर दिया. बड़ा बेटा हमारे ऊपर चीजें फेंकने लगा. वह अपनी कुंठाओं को भीतर दबाए रखता और गेम में उन्हें बाहर आने देता. उस हिंसा का रुख हमारी तरफ भी हो जाता.’’
एम्स में ईशान के मौजूदा इलाज में ऐसी व्यवहारगत तरकीबों पर जोर दिया जा रहा है जिनसे वह अपनी भावनाओं को दबाने के बजाए मन की बात कहे. मसलन, रात को जब उसे फोन पर दोस्तों से बात नहीं करने दिया जाता, तो उसके डॉक्टर अब उसे अपना गुस्सा और हताशा हिंसक डिजिटल गेमों में खर्च करने के बजाए जाहिर करने को प्रोत्साहित करते हैं. सक्सेना परिवार अब इतवार को 'डिवाइस मुक्त’ लंच का आयोजन करता है, जिसमें परिवार के चारों सदस्य डाइनिंग मेज पर साथ बैठकर खाना खाते हैं, जिससे उनके दोनों बच्चों को ऑफलाइन बातचीत से जुड़ने और समझने का मौका मिलता है.
डिजिटल लत से छुटकारा पाने में कई लोगों की मदद कर चुके डॉ. शर्मा कहते हैं कि 'डिजिटल उपवास’ ऑफलाइन की दिशा में पहला बेहद असरदार कदम है. वे 'छोटी-छोटी शुरुआत’ की सलाह देते हैं, जिसमें हर हफ्ते, फर्ज कीजिए, कुछ घंटे अनिवार्यत: डिजिटल परहेज का पालन करें और धीरे-धीरे समय बढ़ाते जाएं.
ज्यादातर डॉक्टर मानते हैं कि बल प्रयोग व्यसन से निबटने का सबसे खराब तरीका है. डॉ. पटेल कहते हैं, ''बच्चे का फोन जब्त कर लेने या उन पर टीका-टिप्पणी करने या मीन-मेख निकालने से मदद नहीं मिलती. इससे वे रक्षात्मक और हल खोजने के अनिच्छुक हो जाते हैं.’’
एसएचयूटी या शट क्लिनिक में एक युवा मरीज ने शुरू में ही अपने काउंसलर से खास तौर पर कहा कि मेरे माता-पिता से कहो कि टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल में संतुलन खोजें, फोन का इस्तेमाल नहीं करना व्यावहारिक समाधान नहीं है. यह किशोर हफ्तों से अपने दोस्तों से बात नहीं कर पाया था, क्योंकि स्कूल बंद थे और वे दूर रहते थे. सामाजिक अलगाव के चलते वह अवसाद का शिकार हो गया और ऑनलाइन रहने के तरीके खोजने को बेताब हो उठा. डॉ. चड्ढा कहते हैं, ''फोन बुरा नहीं है. बात उसके संतुलित इस्तेमाल की है.’’
डिवाइस नहीं होने पर कइयों के लिए अपने दोस्तों और परिवार के साथ संवाद करना मुश्किल हो जाता है. 17 वर्षीय शुभा नंदा को उस वक्त समझ नहीं आया कि वह क्या करे, जब उसके माता-पिता ने 'रात में फोन नहीं’ का नियम लागू कर दिया, क्योंकि उसका आठ बरस का भाई गेमिंग के जाल में फंस रहा था. उधर आगे की पढ़ाई के बारे में मन बनाने के लिए स्कूल और कॉलेज के बीच एक साल का गैप ले रही शुभा व्हाट्सऐप पर रात को ही अपने दोस्तों से बात कर पाती थी.
पाबंदी का असर इतना तीव्र था कि शुभा में सामाजिक दुश्चिंता और तीव्र फोमो के लक्षण विकसित होने लगे. अंतत: उसे इलाज करवाना पड़ा. वह कहती है, ''अब मुझे लगता है कि रोज दोस्तों से बात नहीं करने में कोई हर्ज नहीं है. मैं उनसे बाहर मिलने की कोशिश करती हूं ताकि अलग-थलग महसूस न करूं.’’ कई मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि फोमो व्यसन मुक्ति के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गया है. विभिन्न ऐप डिलीट करना, डायरी रखना, ऑफलाइन नए शौक और सामाजिक मंडलियां खोजना, और प्रेरणा तथा प्रोत्साहन के लिए सहारे की व्यवस्था रखना इसे दूर भगाने के कुछ तरीके हैं. हेल्थ काउंसिलिंग, व्यवहार और ध्यान की थेरेपी अन्य तरीके हैं जिनसे लोग इंटरनेट के इस्तेमाल में संतुलन ला सकते हैं.
डॉक्टरों का कहना है कि डिजिटल रिहैब में आने के बाद वे पहले कुछ सत्र तो उस व्यक्ति और उसकी लत की फितरत को जानने-समझने में लगाते हैं. गंभीर मामलों में हफ्ते भी लग सकते हैं. डॉ. शर्मा कहते हैं, ''सभी पर फिट बैठने वाला कोई एक समाधान नहीं है. हर व्यक्तिम अलग-अलग वजहों से ऑनलाइन खिंचा चला जाता है.
कुछ लोग अकेलेपन से लड़ने के लिए, तो दूसरे लोकप्रिय होने और कुछ अन्य ऑफलाइन दुनिया से बचने के लिए ऐसा करते हैं.’’ लत की वजहें पहचान लेने के बाद डॉक्टर उस तीव्र इच्छा से लड़ने के तरीके खोजने में उनकी मदद करते हैं. डॉ. शर्मा कहते हैं, ''ऑफलाइन शौक खोजना कई मरीजों के लिए मददगार साबित हुआ.’’
पेशेवर काउंसलर का मार्गदर्शन बेहद जरूरी है. मुंबई के डॉ. केदार तिल्वे कहते हैं, ''थेरेपिस्ट के पास जाने का मतलब यह नहीं कि आप कमजोर या मानसिक रूप से अस्वस्थ हैं. कई बार लोगों को अपना व्यवहार समझने और बदलने के लिए मदद की जरूरत होती है.’’ अमृता महज ऑनलाइन पोस्ट करने के लिए कंटेंट तैयार करने की खातिर जबरन ज्यादा काम कर रही थी, लिहाजा उसका इलाज करते वक्त अपने भीतर से ही वैधता और स्वीकृति खोजने में उसकी मदद करने पर ध्यान देना पड़ा.
कुछ काउंसलरों ने तो डिजिटल विशेषज्ञों के साथ हाथ मिलाया है ताकि डिजिटल निशान मिटाने और लुभावने नोटिफिकेशन कम करने में मरीजों की मदद कर सकें. चेन्नै के काउंसलर डॉ. अशोक भास्कर कहते हैं, ''मेरे पास एक ऐसी मरीज आईं जो तलाक से गुजरते वक्त डाली गई अपनी तमाम पोस्ट हटाना चाहती थीं.
तो हमने सोशल मीडिया विशेषज्ञ के साथ मिलकर यह समझने में उनकी मदद की कि कितना वह असल में डिलीट कर सकती हैं. इससे उन्हें साइबरस्पेस में डाली जाने वाली चीजों के बारे में ज्यादा सतर्क होने में भी मदद मिली.’’
इस तरह ऑफलाइन हो जाना इच्छाशक्तिक का ही नहीं, बल्कि टेक्नोलॉजी में निपुण होने का सवाल भी है. मुंबई के काउंसलर डॉ. हीरक पटेल कहते हैं, ''रोज कुछ घंटे अपने नोटिफिकेशन टर्न ऑफ कर दें, फोन को साइलेंट पर रख दें, अपनी प्राइवेसी सेटिंग बदल दें... ये कुछ तकनीकी सुझाव हैं जो रोजमर्रा की जिंदगी में डिजिटल डिवाइसों की मौजूदगी कम करने में मदद कर सकते हैं.’’
अपने से अनुशासित होना एक और विकल्प है. बेंगलूरू की 41 वर्षीया गृहिणी कणिका कालरा कहती हैं, ''मैं और मेरे दो बच्चे हफ्ते में दो घंटे फोन का बिल्कुल इस्तेमाल नहीं करते. मैं स्क्रीन से बाहर की दुनिया देखने में उनकी मदद कर रही हूं.’’
वाकई माता-पिता और बच्चों दोनों को डिवाइसों के स्वस्थ इस्तेमाल के बारे में शिक्षित करना आज पहले से ज्यादा जरूरी है. जॉर्ज कहती हैं, ''बच्चे भी माता-पिता और पारिवारिक सदस्यों से ही व्यवहार सीखते हैं.’’
कई माता-पिता डिजिटल की निगरानी और अभीष्ट इस्तेमाल के तरीके निकाल रहे हैं. जैदी कहती हैं, ''बच्चों के व्यवहार, बातचीत और ऑनलाइन बिताए समय की प्रभावी निगरानी करने की चुनौती अब माता-पिता के सामने खड़ी है. टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल का मुकाबला करने के लिए कई लोग अब टेक्नोलॉजी का ही इस्तेमाल कर रहे हैं.’’
इनमें नेटनैनी और कास्पर्स्की जैसे ऐप भी शामिल हैं जो बच्चों की ऑनलाइन गतिविधियों पर नजर रखने में माता-पिता की मदद करते हैं. जैदी यह भी कहती हैं, ''सबसे अच्छा यह है कि बच्चों के साथ अच्छा वक्त गुजारा जाए ताकि डिवाइसों से उनका ध्यान हटे.’’ कुछ बच्चे खुद ही 20-20-20 के नियम का पालन करने लगे हैं, जिसमें वे हर 20 मिनट बाद 20 सेकंड का ब्रेक लेकर 20 फुट दूर देखते हैं.
दिल्ली का नौ वर्षीय छात्र शेखर साहू कहता है, ''महामारी ने मुझे एहसास दिलाया कि मैं अपने फोन और लैपटॉप का कितना ज्यादा इस्तेमाल करता हूं. स्कूल में उन्होंने 20-20-20 का नियम सिखाया और मैं इसका पालन इसलिए करता हूं क्योंकि मुझे अपनी सेहत की परवाह है.’’
विशेषज्ञों का कहना है कि अगर घर में कोई लती व्यवहार नहीं है, तब भी माता-पिता शुरुआत से ही बुनियादी नियम लागू करके भविष्य में लत की आशंका को जड़ से मिटा सकते हैं. डॉ. भट्टाचार्य कहती हैं, ''बच्चे को मोबाइल फोन देते वक्त उसके फायदे और नुक्सान अच्छी तरह समझा देने चाहिए.’’ नियम होने से ही कालरा और उनके दो बच्चों को ऑफलाइन खेलों, ऑफलाइन खेल के मैदानों और ऑफलाइन मुलाकातों का आनंद खोजने में मदद मिली.
वे कहती हैं, ''2019 के बाद हम भूल गए थे कि मिट्टी को छूकर, सूखी पत्तियों पर टहलकर, हवा का झोंका महसूस करके कैसा लगता था.’’ ऐसे वक्त जब डिजिटल दुनिया आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, वर्चुअल रियलिटी और ऑग्मेंटेड रियलिटी से और ज्यादा लुभावनी हो रही है, लोगों और समाज को ज्यादा से संतुलन की जरूरत है. अपनी आत्मा की हिफाजत करना हमारे हाथ में है.
- सोनाली आचार्जी साथ में शैली आनंद, दयाशंकर शुक्ल और अदिति पै