'कॉकटेल 2' में कितना है प्यार का नशा?
शाहिद कपूर, कृति सेनन और रश्मिका मंदाना स्टारर यह फिल्म रिश्तों को लेकर सही सवाल उठाती है लेकिन उनके असरदार जवाब तलाशने के लिए जरूरी गहराई तक नहीं पहुंचती

व्यावहारिक बनें (यानी बोरिंग और सेफ) या फिर खुले दिल से जिंदगी जीने वाले (यानी फन लविंग और अनप्रिडिक्टेबल)? होमी अदजानिया की ढाई घंटे लंबी फिल्म कॉकटेल 2 के अंत तक कुणाल (शाहिद कपूर) को यही फैसला करना होता है.
फिल्म दर्शकों को नीरस दिल्ली से धूप, रेत और खूबसूरत नजारों वाली सिसिली ले जाती है और फिर वापस उसी नीरस दिल्ली में लौटा देती है. इस दौरान कॉस्ट्यूम डिजाइनर अनाइता श्रॉफ अदजानिया के कपड़ों का भरपूर प्रदर्शन देखने को मिलता है.
वहीं एली (कृति सेनन), दिया (रश्मिका मंदाना) और कुणाल की जिंदगी इतनी बेफिक्र और ठहाकों से भरी दिखती है कि उनकी हंसी देखते-देखते आपके गाल भी थक जाएं.
निर्माता दिनेश विजान 14 साल बाद उस फिल्म की दुनिया में लौटे हैं जिसने उनके करियर की दिशा बदल दी थी. इसी फिल्म ने अभिनेत्री दीपिका पादुकोण के करियर में भी अहम मोड़ दिया था. मजेदार बात यह है कि तब से अब तक बहुत कुछ बदला नहीं है. सुपरहिट गाना बंधु फिर सुनाई देता है. अदजानिया परिवार की वापसी हुई है. होमी फिर निर्देशक हैं और प्रीतम फिर संगीतकार. इस पुरानी बोतल में नई चीज सिर्फ लेखक हैं. लव रंजन और तरुण जैन. लेकिन वे भी पहली फिल्म की तरह उसी नैतिक सोच पर चलते हैं कि घरेलू जीवन ही सबसे बड़ा सुख है और परंपराएं सर्वोपरि हैं.
कृति की एली, दीपिका के वेरोनिका किरदार की याद दिलाती है. वह बेफिक्र और बिंदास लड़की है जो कॉलेज के दिनों से साथ रहे कुणाल और दिया के रिश्ते की परीक्षा लेती है. वहीं दिया, डायना पेंटी की मीरा की तरह सख्त स्वभाव वाली लेकिन नेकदिल लड़की है. वह पार्टी की जान नहीं है, लेकिन भोली, सिद्धांतों पर चलने वाली ऐसी महिला है जिसे लड़कों के माता-पिता अपनी बहू बनाना चाहेंगे. कुणाल और दिया लिव-इन रिलेशनशिप में हैं. उनके रिश्ते को 10 साल हो चुके हैं. एक दोस्त का रिश्ता टूटने के बाद दिया अपने भविष्य को लेकर असुरक्षित महसूस करने लगती है. दूसरी ओर शादी के मुद्दे पर दोनों लगातार टालमटोल करते रहे हैं.
फिल्म के भावनात्मक पहलू जाने-पहचाने लगते हैं और यह जानबूझकर किया गया है. लेकिन कॉकटेल 2 की सबसे बड़ी समस्या यह है कि इसमें न तो टकराव विश्वसनीय लगता है, न ड्रामा और न ही प्यार का जुनून. फिल्म इंस्टाग्राम फिल्टर जैसे खूबसूरत दृश्यों में इतनी उलझी रहती है कि गाने किसी ट्रैवल इन्फ्लुएंसर की रील जैसे लगते हैं. ऐसे में तीनों किरदारों की खुद पैदा की गई परेशानियां दर्शकों को छू नहीं पातीं. वैसे भी इस प्रेम त्रिकोण का अंत शुरुआत से ही साफ नजर आने लगता है. पहली कॉकटेल ने यही सिखाया था कि ज्यादा स्क्रीन टाइम, छोटे कपड़े, लंबे बाल और डीप नेकलाइन प्यार की जंग नहीं जिताते.
अगर कॉकटेल 2 का सीधा-सादा नाम रखा जाए तो वह होगा- लेट्स प्ले अराउंड विद कुणाल. एली और दिया इस खेल की प्लानर हैं. दोनों अपने फैसले के नतीजों से वाकिफ हैं. दिया चाहती है कि एली कुणाल को रिझाने का खेल खेले ताकि उसकी वफादारी की परीक्षा हो सके. कुणाल एली के साथ खूब मस्ती करता नजर आता है लेकिन उसे दोनों महिलाओं को प्लान का कोई अंदाजा नहीं होता.
समस्या तब शुरू होती है जब सिर्फ तीन दिनों में एली कुणाल के प्यार में पूरी तरह डूब जाती है. इसे साबित करने के लिए तीन गाने हैं, ड्राइव, शराब और पार्टियों के बीच चोरी-चोरी नजरें मिलाने वाले कई दृश्य हैं. एली को पूरा यकीन हो जाता है कि दोनों मेफो (MFEO) यानी मेड फॉर ईच अदर हैं. ऐसे में जब दिया कुणाल को शादी के लिए प्रपोज करने का फैसला करती है, तो एली माहौल बिगाड़ने वाली यानी पार्टी पूपर बन जाती है और उनके रिश्ते को चुनौती देने लगती है.
एक बार फिर एली का किरदार सबसे मजबूत लिखा गया है. उसे नरभक्षी भी कहा जाता है. कृति पूरे उत्साह के साथ इस भूमिका को निभाती हैं. जब फिल्म अपनी दिशा और उद्देश्य खोती हुई लगती है तब भी वह एली को जीवंत बनाए रखती हैं. वह हर जगह मौजूद है और किसी दूसरे के साथ रिश्ते में होने के बावजूद उस पुरुष को पाने के अपने मिशन में थोड़ी आक्रामक भी नजर आती है. लगातार शक के बीज बोने वाली एली कहानी का सबसे सक्रिय किरदार है. हां, यह बात पूरी तरह अप्रासंगिक है कि वह आखिर करती क्या है जिससे उसके पास इतने महंगे और शानदार कपड़ों का कलेक्शन है.
शाहिद यहां एक ऐसे शख्स की भूमिका में हैं, जिसे पहले फंसाया जाता है और फिर वही खुद को ठगा हुआ महसूस करता है. लव रंजन की फिल्मों की तरह आखिर में उन्हें ही प्यार का असली मतलब और रिश्ते की बुनियाद पर अंतिम बात कहने का मौका मिलता है. रश्मिका प्रभाव नहीं छोड़ पातीं. इसकी वजह उतनी ही उनके किरदार का उबाऊ और घिसे-पिटे ढांचे में सीमित होना है जितनी उस किरदार में जान न फूंक पाने की उनकी अपनी कमजोरी.
कॉकटेल 2 ऐसे सवाल उठाती है, जिन्हें पूछा जाना चाहिए. क्या प्यार समय की कसौटी पर टिक सकता है? क्या घर बसाने के बाद रिश्ते में चाहत कम हो जाती है? क्या अचानक बना गहरा जुड़ाव पहले प्यार पर भारी पड़ सकता है? लेकिन फिल्म इन सवालों की गहराई में जाकर परिपक्व और समझदारी भरे जवाब तलाशना नहीं चाहती. आमतौर पर किसी ड्रिंक का दूसरा दौर अच्छे समय को लंबा करने और नशा बढ़ाने के लिए होता है. लेकिन कॉकटेल 2 में इतना असर नहीं है कि वह इन सभी मोर्चों पर खरी उतर सके.