ऑस्कर का नया नियम भारतीय फिल्मों और निर्देशकों के लिए बन सकता है वरदान

पहले कई बेहतरीन फिल्मों को ऑस्कर में मौका ही नहीं मिलता था क्योंकि उन्हें भारत की आधिकारिक एंट्री के तौर पर चुना ही नहीं गया. लेकिन अब AMPAS के नए नियम ने इस कमी को ठीक कर दिया है

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ब तक सिर्फ तीन भारतीय फिल्में ही ऑस्कर की अंतिम पांच फिल्मों तक पहुंच पाई हैं

रितेश बत्रा की 'द लंचबॉक्स', पायल कपाड़िया की 'ऑल वी इमेजिन एज लाइट' , मीरा नायर की 'मॉनसून वेडिंग'. यहां तक कि एस.एस. राजामौली की 'RRR'. इन सभी फिल्मों को कभी भारत की तरफ से ऑस्कर में बेस्ट इंटरनेशनल फीचर फिल्म कैटेगरी जीतने की सबसे मजबूत दावेदार फिल्मों में गिना गया.

लेकिन दिक्कत यह रही कि कई लोकप्रिय और सराही गई फिल्मों को पहले कभी मौका ही नहीं मिला क्योंकि उन्हें भारत की आधिकारिक एंट्री के तौर पर चुना ही नहीं गया. अब मोशन पिक्चर आर्ट्स एंड साइंसेज अकादमी यानी AMPAS के एक नए और जरूरी बदलाव ने इस कमी को काफी हद तक ठीक कर दिया है. अब एक ही देश की कई फिल्मों पर ऑस्कर नॉमिनेशन के लिए विचार किया जा सकता है.

अब तक होता यह था कि बेस्ट इंटरनेशनल फिल्म कैटेगरी के लिए भारत की ओर से कौन-सी फिल्म जाएगी, इसका फैसला फिल्म फेडरेशन ऑफ इंडिया (FFI) करता था. यह संस्था फिल्म प्रोड्यूसर्स, डिस्ट्रीब्यूटर्स, एग्जीबिटर्स और स्टूडियो मालिकों की सबसे बड़ी संस्था मानी जाती है. FFI एक कमेटी बनाता है, जिसके सदस्य फिल्मों को देखते हैं और फिर फैसला लेते हैं कि किस फिल्म को भेजना है.

लेकिन कई बार इनके फैसलों पर सवाल उठे. वजह यह रही कि ऐसी फिल्मों को नजरअंदाज कर दिया गया जिन्हें अंतरराष्ट्रीय दर्शकों और ज्यूरी के बीच ज्यादा पहचान मिल चुकी थी और जिनके पास ऑस्कर में बेहतर मौका था. इसका नुकसान रितेश बत्रा और पायल कपाड़िया जैसे निर्देशकों की फिल्मों को हुआ, जिन्होंने बड़े अंतरराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल्स में काफी पहचान बनाई थी. फिर भी उनकी फिल्में उस कैटेगरी तक पहुंच ही नहीं पाईं जहां उनके नॉमिनेट होने की अच्छी संभावना थी.

अब AMPAS के नए नियम के मुताबिक, अगर कोई गैर-अंग्रेजी भाषा की फिल्म किसी बड़े अंतरराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल में तय पुरस्कार जीत लेती है, तो वो सीधे ऑस्कर के लिए विचार में आ सकती है. इन फेस्टिवल्स में बर्लिन फिल्म फेस्टिवल का गोल्डन बेयर, बुसान इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल का बेस्ट फिल्म अवॉर्ड, कान्स फिल्म फेस्टिवल का पाल्मे डी'ऑर, संडांस फिल्म फेस्टिवल का वर्ल्ड सिनेमा ग्रैंड ज्यूरी प्राइज, टोरंटो इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल का प्लेटफॉर्म अवॉर्ड और वेनिस इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल का गोल्डन लायन शामिल हैं.

एक और बड़ा बदलाव यह है कि अब इस कैटेगरी में पहचान देश के बजाय फिल्म को मिलेगी. अकादमी ने कहा है कि फिल्म के नाम के साथ निर्देशक का नाम भी ट्रॉफी पर लिखा जाएगा. जरूरत पड़ने पर देश या क्षेत्र का नाम भी शामिल किया जाएगा.

हालांकि इन बड़े फिल्म फेस्टिवल्स में टॉप पुरस्कार जीतना अपने आप में बेहद मुश्किल काम है. लेकिन अब भारतीय फिल्ममेकरों, खासकर छोटे और स्वतंत्र निर्देशकों को ये उम्मीद जरूर मिलेगी कि ऑस्कर की रेस में आने के लिए उनके पास सिर्फ FFI की पसंद बनने का ही रास्ता नहीं है.

ऐसा भी नहीं है कि FFI के सारे फैसले गलत या विवादित रहे हों. चैतन्य तम्हाणे की शानदार पहली फिल्म 'कोर्ट' और आमिर खान प्रोड्यूस्ड 'लगान' को चुनना काफी साहसी और सही फैसला माना गया था. पिछले छह सालों में FFI ने नीरज घायवान की 'होमबाउंट', किरण राव की 'लापता लेडीज', मलयालम फिल्म '2018: एवरीवन इज ए हीरो', पैन नलिन की गुजराती फिल्म 'छेल्लो शो', तमिल फिल्म 'कूंझांगल' और लीजो जोस पेलिसरी की 'जल्लीकट्टू' जैसी फिल्मों को चुना है.

ये सभी बेहतरीन फिल्में हैं और भारत की भाषाई विविधता भी दिखाती हैं. लेकिन ऑस्कर की अंतिम पांच फिल्मों में जगह बनाना सिर्फ अच्छी फिल्म होने से नहीं होता. इसे एक रणनीतिक मार्केटिंग रेस भी माना जाता है. प्रोड्यूसर्स को ये सुनिश्चित करना पड़ता है कि ज्यादा से ज्यादा अकादमी सदस्य उनकी फिल्म देखें. साथ ही कुछ प्रभावशाली अकादमी सदस्यों का समर्थन मिलना भी काफी अहम माना जाता है.

फिर भी सफलता की गारंटी नहीं होती. उदाहरण के तौर पर 'होमबाउंट' को लें. मशहूर निर्देशक मार्टिन स्कोर्सीज इसके एग्जीक्यूटिव प्रोड्यूसर थे. उन्होंने फिल्म के प्रमोशन के लिए नीरज घायवान के साथ सवाल-जवाब सेशन भी किया. फिल्म आखिरी 15 फिल्मों की शॉर्टलिस्ट तक पहुंची, लेकिन अंतिम पांच में जगह नहीं बना पाई.

भारत दुनिया की सबसे बड़ी फिल्म इंडस्ट्रीज में से एक है. भारतीय सिनेमा का इतिहास 113 साल पुराना है. इसके बावजूद अब तक सिर्फ तीन भारतीय फिल्में ही ऑस्कर की अंतिम पांच फिल्मों तक पहुंच पाई हैं. यह भारत की फिल्म मेकिंग क्षमता का सही आकलन नहीं माना जा सकता. उम्मीद है कि नया नियम ज्यादा रचनात्मक और अलग सोच वाले फिल्ममेकर्स को बड़े सपने देखने का मौका देगा और इस कमी को कुछ हद तक दूर करेगा.

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