महज 33 मिनट की यह बेहद शानदार डॉक्यूमेंट्री क्यों है इस बार ऑस्कर की सबसे मज़बूत दावेदार!

स्कूली हिंसा का शिकार हुए बच्चों पर बनी यह डॉक्यूमेंट्री All The Empty rooms इस दशक का सबसे शानदार ऑडियो-विजुअल काम है

All The Empty Rooms का एक सीन

आपने ख़ाली कमरा देखा है? भला यह भी कोई सवाल हुआ. ऐसा वाहियात सवाल कि जिसे सुनकर ही आप खीझ उठें. किसने ख़ाली कमरा नहीं देखा होगा! अगर आप एकाधिक कमरों के मकान में ना भी रहते हों तो भी, कमरे से निकलते हुए और वापस भीतर जाते हुए जो अनायास ही दिख पड़ता है, वो ख़ाली कमरा ही तो है. 

लेकिन आप थोड़ी जल्दबाज़ी में हैं. सवाल को उसके हिस्से का थोड़ा-सा वक़्त और दीजिए. ख़ाली कमरा, जिसमें आपका बच्चा रहता था. जिसने अभी अपने भविष्य को चिट्ठियां लिखनी शुरू ही की थीं. और, जो अब उस कमरे में नहीं है...न कभी आएगा. एक बच्चे के जा चुकने के बाद का ख़ाली कमरा. उदासी ओढ़कर उसी मकान में चुपचाप मौजूद ख़ाली कमरा. पूरा दिन दफ्तर से थक के आने के बाद जब पिता अपनी बच्ची के बिस्तर पर बैठता है और भरे हुए बादल की तरह बरसता रहता है, रोज़. आधी रात को मां उस कमरे का दरवाज़ा आदतन हौले से खोलती है. वो अब तक अपनी बच्ची के चौंककर उठ जाने को भूल नहीं पाई है. पता नहीं उस ख़ाली कमरे में उस बच्ची की आत्मा है या नहीं, लेकिन मां की आत्मा अब इसी कमरे में बसती है. Netflix पर आई डॉक्यूमेंट्री All the Empty Rooms इन्हीं ख़ाली कमरों की बात करती है. उन बच्चों के ख़ाली कमरे जो अमेरिका भर में हुई स्कूली गोलीबारी में मारे गए.

अपने पॉजिटिव नज़रिए और ख़ुशपसंदगी के लिए मशहूर अमरीकी पत्रकार स्टीव हार्टमैन का अनोखा प्रोजेक्ट. फोटोग्राफर लू बौप के साथ स्टीव अमरीका भर के उन बच्चों के घर पहुंचे जो किसी न किसी स्कूली गोलीबारी में मारे गए. उनके खाली कमरों की तस्वीरें लेने का प्रोजेक्ट. देश भर में फैले कमरे, जिनसे बच्चे रोज की तरह निकले, लेकिन कभी लौटे नहीं. हथियारों की खुली बिक्री से उपजी सनक जब बच्चों के शिकार पर निकलती है, तो उसकी कीमत कौन चुकाता है, बताती है ये डॉक्यूमेंट्री.

इन बच्चों को समर्पित की गई है All The Empty Rooms

ओपन गन कल्चर पर अमेरिका में पिछले एक दशक से लगातार विमर्श हो रहा है. पक्ष-विपक्ष के धड़े अपनी-अपनी बात समझाने में लगे हुए हैं. लेकिन इन सबके ठीक बीच सीबीसी न्यूज़ के पत्रकार स्टीव अपने साथी फोटोग्राफर लू बौप के साथ एक ऐसा प्रोजेक्ट शुरू करते हैं जो शुरुआत में न्यूजरूम में भी चर्चा करने लायक नहीं समझा गया. सात साल, जी हां आपने ठीक पढ़ा, क़रीब ढाई हज़ार दिन स्टीव चुपचाप अपने काम से इतर इस काम पर लगे रहे. जब आख़िरी तीन बच्चों के कमरे बाक़ी थे तब Netflix ने इसे डॉक्युमेंट करने का फैसला किया. और इसके बाद ऑडियो विजुअल की दुनिया में महज 33 मिनट का जो शाहकार काम आया वह इस बार के ऑस्कर तक पहुंच गया है.

बहुत मुमकिन था कि स्कूली बच्चों तक घातक हथियारों की पहुंच पर तीखे सवाल जवाबों से इस प्रोजेक्ट को भर दिया जाता. लेकिन स्टीव ने जो रास्ता लिया वह सिनेमा की दुनिया में बहुत बहुत कम लोग ले पाते हैं. सन्नाटे का रास्ता. 33 मिनट की इस डॉक्यूमेंट्री में सन्नाटा इस क़दर चीखता है कि बेताल की तरह आपकी पीठ पर सवार हो जाता है. 

किसी मां ने अपने बच्चे के कपड़े आज तक नहीं धुले, क्योंकि अब इन कपड़ों की गंध ही स्मृति का जीवित अस्तित्व है. तो, किसी पिता ने उस कमरे की लाइट्स नहीं बुझाई जिन्हें उनकी बच्ची जलता छोड़कर निकली थी. 

दुनिया के किसी भी कोने में किसी भी तरह के एक्सट्रीमिज्म के बीच खड़े किसी भी शख्स को ये ख़ाली कमरे देखने चाहिए. चुपचाप अंधेरे में बैठे माताओं पिताओं की सिसिकियां सुननी चाहिए. अचानक किसी सुबह ज़िन्दा रहने का सहारा छीन लिए जाने के बाद किसी का क्या हाल होता है, ये बिना इन कमरों को देखे नहीं समझा जा सकता. टूथपेस्ट के खुले ढक्कन, कुर्सी से आधा लटका तौलिया, खुला बिखरा पेंसिल बॉक्स, आधा होमवर्क की गई कॉपी...ये सब ये बच्चे ठीक करने वाले थे...वापस आकर. लेकिन वे लौट नहीं पाए...किसी की सनक का शिकार हो गए.

यह कम से कम इस दशक की सबसे शानदार डॉक्यूमेंट्री है. मदहोश कर देने वाले दुख का अप्रतिम दस्तावेज. ऑस्कर की इससे दमदार दावेदारी इससे पहले शायद ही कभी देखी गई हो. एक दृश्य में स्टीव कहते हैं कि अमेरिका के हर शख्स को इन कमरों में एक बार ज़रूर आना चाहिए, ताकि चुकाई गई कीमत का सही अंदाज़ा हो सके. लेकिन असल में अमेरिका ही नहीं, देश-धर्म-जाति से परे अति के निशाने पर खड़े हर व्यक्ति के लिए सांस की तरह जरूरी डॉक्युमेंट्री. अगर हालात आपका दम घोंट रहे हैं तो ये ख़ाली कमरे आपके इंतज़ार में हैं. एकबारगी विश्वास नहीं होता कि महज़ 33 मिनट का यह काम कैसे आपको भीतर बाहर से बदल देने की ताक़त और संभावनाओं से लबरेज हो सकता है, लेकिन स्टीव हार्टमैन का शुक्रिया, उनकी उस जिजीविषा को हज़ार सलाम जिसने हज़ारों दिनों तक एक काम में चुपचाप लगाए रखा. जब तक सन्नाटा पढ़ने की क़ूवत रखने वाले स्टीव जैसे पत्रकार हैं, सबका सब पर भरोसा बना रहेगा.

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