अस्पतालों में बड़े बदलाव का दौर; अब AI नया जूनियर डॉक्टर बनेगा?

भारत की अस्पतालों में मरीजों का बोझ लगातार बढ़ रहा है ऐसे में AI काफी मददगार साबित हो रहा है, लेकिन इससे जूनियर डॉक्टरों की ट्रेनिंग पर भी असर पड़ सकता है

AI शुरुआती जांच के नतीजों को पढ़ने से लेकर दवा के नुस्खे तक लिख सकता है (सांकेतिक फोटो)

नई दिल्ली के एक बड़े निजी अस्पताल के भीतर बदलाव को पहचानना तब तक मुश्किल है, जब तक आप यह न जानते हों कि देखना कहां है. वार्डों में कोई रोबोट नहीं हैं और मरीजों की देखभाल में कोई सीधी बाधा नहीं दिखती. लेकिन पर्दे के पीछे, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) धीरे-धीरे उस काम की जगह ले रहा है, जो कभी शुरुआती चिकित्सा प्रशिक्षण का हिस्सा हुआ करता था.

अस्पताल के सीनियर डॉक्टरों ने, जो अपना नाम नहीं बताना चाहते थे, कहा कि AI उपकरण अब सभी विभागों में शामिल हो चुके हैं. यह रेडियोलॉजी और पैथोलॉजी से लेकर ओपीडी तक फैले हैं. पिछले 20 वर्षों से युवा डॉक्टरों को पढ़ा रहे एक डॉक्टर कहते हैं, "शुरुआती जांच अब तेजी से सॉफ्टवेयर कर रहे हैं. हालांकि उसका रिव्यू कोई डॉक्टर करे, यह अभी भी अनिवार्य है, लेकिन शुरुआती बिंदु बदल गया है."

रेडियोलॉजी में, स्कैन अपलोड होने के कुछ ही सेकंड के भीतर AI सिस्टम असामान्यताओं की पहचान कर लेते हैं. इसमें फेफड़ों की छोटी गांठें (nodules), बारीक फ्रैक्चर और शुरुआती रक्तस्राव या ब्लीडिंग शामिल हैं. कंसल्टेंट अंतिम मंजूरी देते हैं, लेकिन प्रारंभिक स्क्रीनिंग, जो पारंपरिक रूप से जूनियर डॉक्टर करते थे, अब अक्सर ऑटोमेटिक होती है. पैथोलॉजी में, डिजिटल प्लेटफॉर्म स्लाइड की पहले ही जांच कर लेते हैं और संदिग्ध क्षेत्रों को चिह्नित कर देते हैं. इससे घंटों की मैन्युअल रिव्यू का समय बच जाता है.

यह बदलाव ओपीडी में भी उतना ही स्पष्ट है. AI उपकरण अब बातचीत को रिकॉर्ड करते हैं, मरीज के इतिहास को व्यवस्थित करते हैं और रियल टाइम में नुस्खे का ड्राफ्ट तैयार करते हैं. मरीज के जाने तक दस्तावेज तैयार हो जाते हैं. डॉक्टर कहते हैं, "इससे कार्यक्षमता बढ़ती है. लेकिन यह उस काम को भी हटा देता है जो जूनियर डॉक्टरों को किसी मामले पर गहराई से सोचना सिखाता था."

रफ्तार बनाम प्रशिक्षण का यह संतुलन एक बढ़ती चिंता बन रहा है. दशकों से जूनियर डॉक्टरों ने काम की अधिकता से सीखा है. वे स्कैन पढ़ते थे, नोट्स लिखते थे और देखरेख में शुरुआती जांच करते थे और बीमारी समझते थे. ये दोहराव वाले काम समय लेने वाले थे, लेकिन क्लिनिकल निर्णय लेने की क्षमता विकसित करने के लिए महत्वपूर्ण थे. अब AI द्वारा जमीनी काम संभालने से, यह अनुभव कम हो रहा है.

हालांकि, अस्पताल प्रशासक इस बदलाव को जरूरी मानते हैं. भारत की स्वास्थ्य सेवा प्रणाली पेशेवरों की कमी का सामना कर रही है और मरीजों का बोझ लगातार बढ़ रहा है. इस संदर्भ में, AI एक व्यवधान के बजाय तालमेल बिठाने का एक जरिया हो सकता है. डॉक्टर तर्क देते हैं, "हम डॉक्टरों की जगह नहीं ले रहे हैं. हम काम के बड़े पैमाने को संभाल रहे हैं. इन उपकरणों के बिना, सिस्टम धीमा हो जाएगा."

अब देखभाल का एक बहुस्तरीय मॉडल उभर रहा है. AI बड़ी संख्या में किए जाने वाले और नियमित काम, जैसे मरीजों की छंटनी और डॉक्यूमेंटेशन को संभालता है. डॉक्टर व्याख्या, निर्णय लेने और मरीजों के साथ संवाद पर ध्यान केंद्रित करते हैं. वरिष्ठ विशेषज्ञ की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण हो गई है, जबकि जूनियर डॉक्टर की भूमिका को नया रूप दिया जा रहा है.

इसे लेकर दीर्घकालिक सवाल भी हैं. कुछ डॉक्टरों को चिंता है कि व्यावहारिक अनुभव में कमी से भविष्य के डॉक्टरों के प्रशिक्षण पर असर पड़ सकता है. दूसरों का तर्क है कि चिकित्सा शिक्षा खुद को बदल लेगी. यह दोहराव वाले कार्यों के बजाय उच्च-स्तरीय तर्क पर ध्यान देगी. अस्पताल के एक अन्य वरिष्ठ विशेषज्ञ कहते हैं, "हर पीढ़ी अलग तरह से प्रशिक्षण लेती है. यह भी कोई अपवाद नहीं होगा."

मरीजों के लिए यह बदलाव काफी हद तक अदृश्य है. परामर्श अभी भी आमने-सामने होता है और डायग्नोसिस अभी भी डॉक्टर ही करते हैं. लेकिन अस्पतालों के भीतर एक ट्रांजिशन चल रहा है. AI जूनियर डॉक्टरों की जगह नहीं ले रहा है. यह उनके सीखने के तरीके और उनकी जरूरत वाली जगहों को फिर से परिभाषित कर रहा है.

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