जिस शिखर से मेसी कभी उतरे नहीं
मिस्र ने दुनिया को विश्वास दिलाया कि चमत्कार संभव हैं. मेसी ने याद दिलाया कि महान टीमें चमत्कारों से भी बाहर निकलना जानती हैं

खेल हमें यह भ्रम देते हैं कि उनका इतिहास स्कोरबोर्ड पर लिखा जाता है. हम गोल गिनते हैं, जीत और हार दर्ज करते हैं, फिर अगले मैच की ओर बढ़ जाते हैं. लेकिन कुछ मुकाबले ऐसे होते हैं जो आंकड़ों से बाहर जाकर अपनी दूसरी जिंदगी शुरू करते हैं. वे स्मृति का हिस्सा बन जाते हैं. उन्हें याद करते हुए लोग यह नहीं बताते कि किस मिनट में कौन-सा गोल हुआ था. वे उस बेचैनी को याद करते हैं, उस उम्मीद को याद करते हैं और उस क्षण को याद करते हैं जब उन्हें लगा था कि दुनिया की सबसे बड़ी टीम भी हार सकती है.
हाल में अटलांटा में अर्जेंटीना और मिस्र के बीच खेला गया विश्व कप का यह मुकाबला मेरे लिए ऐसा ही एक अनुभव था. मैं यह मैच अपने मित्र एहेम्बा थोकचोम के साथ देख रहा था. एहेम्बा मणिपुर से हैं और बेंगलुरु की एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में काम करते हैं. लेकिन उनकी असली पहचान उनकी फुटबॉल-प्रेमी आत्मा है. मैंने बहुत कम लोगों को किसी खिलाड़ी के साथ इतना गहरा रिश्ता बनाते देखा है. उनके लिए लियोनेल मेसी केवल अर्जेंटीना के कप्तान नहीं हैं. वे उनके युवाकाल की स्मृतियों का हिस्सा हैं. उनकी असफलताओं और सफलताओं के मौन साक्षी हैं. हर विश्व कप के साथ एहेम्बा का अपना एक निजी इतिहास जुड़ा हुआ है.
मैच शुरू हुआ और कुछ ही मिनटों में यह साफ हो गया कि मिस्र केवल भाग लेने नहीं आया है. उसके खेल में वह संकोच नहीं था जो अक्सर बड़ी टीमों के सामने दिखाई देता है. उसके खिलाड़ी हर गेंद पर विश्वास के साथ खेल रहे थे. वे अर्जेंटीना की प्रतिष्ठा से प्रभावित नहीं थे. वे केवल मैच खेल रहे थे.
15वें मिनट में यासेर इब्राहिम ने हेडर से गोल किया. स्टेडियम में बैठे हजारों दर्शकों की आवाज़ अचानक बदल गई. अर्जेंटीना के समर्थकों की बेचैनी पहली बार दिखाई देने लगी. थोड़ी देर बाद मेसी को पेनाल्टी मिली. इसी क्षण लगा कि विश्व चैंपियन तुरंत वापसी कर लेंगे. लेकिन मिस्र के गोलकीपर मोस्तफ़ा शोबैर ने मेसी का शॉट रोक दिया.
मेरे बगल में बैठे एहेम्बा ने दोनों हाथों से अपना चेहरा ढक लिया.
किसी महान खिलाड़ी की असफलता उसके विरोधियों से अधिक उसके प्रशंसकों को बेचैन करती है. उन्हें लगता है कि कहीं समय सचमुच बदल तो नहीं गया. कहीं वह खिलाड़ी, जिस पर वर्षों तक भरोसा किया गया, अब अपनी अंतिम ढलान पर तो नहीं पहुंच गया.
मगर खेल का समय मनुष्य के समय से अलग होता है. वह किसी निष्कर्ष पर इतनी जल्दी नहीं पहुंचता.
मिस्र लगातार बेहतर खेल रहा था. उसकी रक्षापंक्ति संगठित थी. उसका मध्यक्रम अर्जेंटीना को खुलकर खेलने का अवसर नहीं दे रहा था. हर जवाबी हमला यह एहसास दिला रहा था कि यदि एक और गोल हो गया तो मुकाबला वहीं समाप्त हो जाएगा.
67वें मिनट में वही हुआ जिसका डर अर्जेंटीना के समर्थकों को था. मोस्तफ़ा ज़िको ने शानदार जवाबी आक्रमण को गोल में बदल दिया. स्कोर 2-0 हो गया.
उस क्षण केवल स्टेडियम ही नहीं, दुनिया भर के फुटबॉल प्रेमियों की कल्पना भी बदल गई. हर विश्व कप में करोड़ों लोग किसी एक ऐसी टीम की तलाश करते हैं जो स्थापित ताकतों को चुनौती दे सके. उन्हें लगता है कि खेल की सबसे बड़ी सुंदरता वहीं जन्म लेती है जहां साहस से इतिहास लिखा जाता है. उस शाम मिस्र ऐसी ही टीम बन गया था.
मुझे 1990 का विश्व कप याद आया. कैमरून ने डिएगो माराडोना की अर्जेंटीना को हराकर दुनिया को चौंका दिया था. फिर 2022 का विश्व कप याद आया जब सऊदी अरब ने अर्जेंटीना को पराजित किया था. फुटबॉल का इतिहास ऐसे ही क्षणों से भरा हुआ है. इन्हीं क्षणों की वजह से यह खेल दुनिया का सबसे लोकतांत्रिक खेल बना रहता है. यहां कोई भी जीत पहले से तय नहीं होती.
शायद इसी कारण दुनिया का एक बड़ा हिस्सा उस शाम मिस्र के साथ खड़ा दिखाई दे रहा था.
लेकिन खेल केवल आश्चर्य का नाम नहीं है. वह चरित्र की भी परीक्षा लेता है. महान टीमों की पहचान इस बात से नहीं होती कि वे कितनी बार जीतती हैं. उनकी पहचान इस बात से होती है कि वे हार के कितने निकट जाकर भी अपने विश्वास को बचाए रखती हैं. कुछ टीमें दो गोल से पीछे होने के बाद बिखर जाती हैं. कुछ टीमें उसी क्षण अपने भीतर छिपे हुए दूसरे चेहरे को खोज लेती हैं.
अर्जेंटीना धीरे-धीरे वही दूसरा चेहरा खोज रही थी.
फुटबॉल देखने का हमारा तरीका भी पिछले कुछ वर्षों में बदल गया है. पहले गोल होने के साथ ही पूरा स्टेडियम एक साथ खुशी में डूब जाता था. अब हर उत्सव के साथ एक संशय जुड़ गया है. खिलाड़ी जश्न मनाते हुए भी स्क्रीन की ओर देखते हैं. दर्शक तालियाँ बजाते हुए भी यह जानना चाहते हैं कि कहीं वीडियो असिस्टेंट रेफरी कोई नई रेखा खींचकर उनकी खुशी वापस तो नहीं ले लेगा.
तकनीक ने खेल को अधिक न्यायपूर्ण बनाया है. इसमें कोई संदेह नहीं है. लेकिन उसने खेल की सहजता भी कम कर दी है. अब हर बड़ा निर्णय केवल मैदान पर नहीं होता. उसका एक हिस्सा उन कमरों में भी तय होता है जहां कैमरों की दर्जनों आंखें एक ही दृश्य को अलग-अलग कोणों से देख रही होती हैं.
मिस्र की शिकायतों को इसी संदर्भ में समझना चाहिए. विवाद थे. असहमति के कारण भी थे. लेकिन किसी भी महान वापसी को केवल षड्यंत्र कह देना खेल की आत्मा के साथ अन्याय होगा. क्योंकि अंततः खेल मशीनें नहीं खेलतीं. वे मनुष्य खेलते हैं. और मनुष्य की सबसे बड़ी शक्ति यह है कि वह तब भी लड़ सकता है जब लगभग सब कुछ उसके विरुद्ध दिखाई दे.
79वें मिनट में क्रिस्टियन रोमेरो का हेडर गोल में गया तो स्कोर केवल 2-1 नहीं हुआ. उस एक गोल ने मैच की पूरी मनोवैज्ञानिक संरचना बदल दी. कुछ मिनट पहले तक जो अर्जेंटीना पराजय की ओर बढ़ती हुई दिखाई दे रही थी, वह अचानक अपने परिचित रूप में लौट आई. मिस्र के खिलाड़ियों के चेहरे पर पहली बार संशय दिखाई दिया. अर्जेंटीना के खिलाड़ियों की चाल बदल गई. गेंद अब उनके पैरों से नहीं, उनके विश्वास से चल रही थी.
फुटबॉल में कई बार ऐसा होता है कि एक गोल केवल स्कोर नहीं बदलता. वह दोनों टीमों की मानसिक स्थिति बदल देता है. उस क्षण से मैच दोबारा शुरू हो जाता है. महान खिलाड़ियों की सबसे बड़ी पहचान यही है कि वे समय को अलग तरह से जीते हैं. साधारण खिलाड़ी अपनी पिछली गलती का बोझ लेकर आगे बढ़ते हैं. महान खिलाड़ी उस गलती को वहीं छोड़ देते हैं जहां वह हुई थी.
मेसी ने भी यही किया.
पहले हाफ में पेनाल्टी चूकने वाला खिलाड़ी अब मैदान पर कहीं दिखाई नहीं दे रहा था. उसकी जगह वही पुराना मेसी लौट आया था जिसने दो दशकों तक दुनिया को यह विश्वास दिलाया कि दबाव उसके खेल को कम नहीं करता, बल्कि और स्पष्ट बना देता है.
83वें मिनट में जब गेंद उनके सामने आई तो उन्होंने किसी महान क्षण की तरह नहीं, बल्कि एक साधारण अवसर की तरह उसे गोल में बदल दिया. यही उनकी सबसे बड़ी विशेषता है. वे असाधारण को भी साधारण बना देते हैं. उनके खेल में नाटकीयता कम दिखाई देती है, लेकिन उसका असर बहुत देर तक बना रहता है.
इस गोल के बाद अटलांटा का स्टेडियम बदल चुका था. कुछ देर पहले तक जो भीड़ मिस्र की ऐतिहासिक जीत देखने के लिए तैयार थी, वही अब अर्जेंटीना की वापसी की साक्षी बन रही थी. फुटबॉल की यही सबसे बड़ी क्रूरता है. यहां इतिहास कई बार केवल दस मिनट में अपना पक्ष बदल देता है.
फिर इंजरी टाइम आया.
एन्जो फ़र्नांदेज़ ने हेडर से तीसरा गोल किया. अर्जेंटीना आगे निकल चुका था. मिस्र के खिलाड़ी मैदान पर बैठ गए. कुछ ने सिर झुका लिया. कुछ दूर खड़े रहकर स्कोरबोर्ड देखते रहे. उनके चेहरों पर गुस्से से अधिक अविश्वास था. उन्हें शायद स्वयं भी समझ नहीं आ रहा था कि यह सब इतनी जल्दी कैसे बदल गया.
यहीं से इस मैच का दूसरा अर्थ शुरू होता है.
आज का खेल केवल मैदान पर नहीं खेला जाता. हर बड़े मैच के बाद एक और मुकाबला शुरू होता है. सोशल मीडिया पर. टेलीविजन स्टूडियो में. यूट्यूब चैनलों पर. वहां लोग फुटबॉल से अधिक षड्यंत्रों पर विश्वास करने लगे हैं. हर हार के पीछे रेफरी खोज लिया जाता है. हर जीत के पीछे किसी अदृश्य शक्ति की कल्पना कर ली जाती है.
यह प्रवृत्ति केवल फुटबॉल तक सीमित नहीं है. हमारे समय का एक बड़ा संकट यह है कि हम असाधारण प्रतिभा को स्वीकार करने में कठिनाई महसूस करने लगे हैं. हमें हर बड़ी उपलब्धि के पीछे कोई गुप्त व्यवस्था दिखाई देती है. मानो मनुष्य की इच्छाशक्ति, अभ्यास और धैर्य पर्याप्त कारण नहीं रह गए हों.
मिस्र के साथ अन्याय हुआ या नहीं, इस पर बहस चलती रहेगी. शायद वर्षों तक चलेगी. लेकिन यदि हम पूरी कहानी को केवल रेफरी के फैसलों तक सीमित कर दें, तो हम उस चीज़ को नहीं देख पाएंगे जो इस मैच की सबसे बड़ी सच्चाई थी.
अर्जेंटीना ने हार मानने से इनकार कर दिया था.
यही विश्व चैंपियन और एक अच्छी टीम के बीच का अंतर होता है. अच्छी टीमें अच्छा फुटबॉल खेलती हैं. महान टीमें कठिन परिस्थितियों में अपने चरित्र का परिचय देती हैं. मुझे बार-बार लगता है है कि विश्व कप का सबसे बड़ा आकर्षण ट्रॉफी नहीं है. उसका सबसे बड़ा आकर्षण यह है कि वह मनुष्य को उसकी अंतिम सीमा तक ले जाता है. वहां, जहां शरीर थक चुका होता है, रणनीतियां विफल होने लगती हैं और केवल विश्वास बचता है.
शायद इसी कारण खेल हमें बार-बार जीवन की याद दिलाता है. जीवन भी तो ऐसा ही है.
अधिकांश लोग अपनी पहली असफलता को ही अपनी पहचान बना लेते हैं. कुछ लोग दूसरी कोशिश करते हैं. लेकिन बहुत कम लोग ऐसे होते हैं जो अपनी असफलता को स्मृति बनने का अवसर ही नहीं देते. वे अगले ही क्षण उसे पीछे छोड़ देते हैं.
मेसी उन्हीं लोगों में हैं.
उनकी महानता केवल गोलों में नहीं है. उनकी महानता उस मानसिक अनुशासन में है जो उन्हें हर असफल क्षण के बाद फिर से सामान्य बना देता है. वे अपने भीतर घबराहट को जगह नहीं देते. शायद इसलिए उम्र बढ़ने के साथ भी उनका खेल छोटा नहीं हुआ. उसका अर्थ बड़ा होता गया.
उस शाम मिस्र हार गया. लेकिन उसने दुनिया को यह याद दिलाया कि सम्मान केवल विजेताओं का अधिकार नहीं होता. कुछ पराजय ऐसी होती हैं जो आने वाले वर्षों तक लोगों के भीतर जीवित रहती हैं. 1954 की हंगरी, 1982 का ब्राज़ील, 2010 का नीदरलैंड और 2022 का मोरक्को इसी कारण याद किए जाते हैं. उन्होंने हमेशा ट्रॉफियां नहीं जीतीं, लेकिन उन्होंने खेल की कल्पना को समृद्ध किया.
मिस्र ने भी वही किया. उसने अर्जेंटीना को उसकी सीमाओं तक पहुंचा दिया. उसने दुनिया को यह विश्वास दिलाया कि चमत्कार संभव है. और फिर उसने यह भी दिखा दिया कि महान टीमें चमत्कारों से भी बाहर निकल सकती हैं. सालों बाद जब इस विश्व कप की तकनीकी रिपोर्टें धूल खा रही होंगी, जब वीडियो असिस्टेंट रेफरी की रिकॉर्डिंग शायद किसी सर्वर में खो चुकी होगी, तब भी लोग इस मैच को याद करेंगे.
काहिरा में बैठे बूढ़े लोग कहेंगे कि वे जीत के कितने निकट पहुंच गए थे. ब्यूनस आयर्स में बैठे बूढ़े लोग कहेंगे कि उन्होंने अपने जीवन की सबसे अविश्वसनीय वापसी देखी थी.
और बेंगलुरु में कहीं मैं और मेरा मित्र एहेम्बा शायद फिर कभी इस मैच की बात करेंगे. वह मेसी की उस चूकी हुई पेनाल्टी को भी याद करेगा और उसके कुछ ही मिनट बाद किए गए गोल को भी. मैं शायद उससे कहूंगा कि महान खिलाड़ी इसलिए महान नहीं होते कि वे कभी असफल नहीं होते. वे इसलिए महान होते हैं क्योंकि असफलता उन्हें बदल नहीं पाती.
उस शाम मिस्र सचमुच शिखर तक पहुंच गया था.
लेकिन शिखर पर एक आदमी पहले से खड़ा था.
वह वहां नया नहीं था.
वह वर्षों से वहीं था.