नेहरू के दौर में राजनीति शुरू करने वाले अटल बिहारी वाजपेयी ने उनके किस रिकॉर्ड की बराबरी की थी!
पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की कहानी सिर्फ उनकी वाक्पटुता या नेतृत्व कौशल की नहीं है. उनकी कहानी है कई शहरों की, विदेश नीति की, दबी जुबान में धर्मनिरपेक्ष होने की और है दो नावों की सवारी की

"मैं 'अटल' भी हूं और 'बिहारी' भी..." ये कहना था कि पूरी भीड़ ठठाकर हंस पड़ी. 2004 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी बिहार में एक चुनावी रैली को सम्बोधित करने गए थे और सुनने आए लोगों को अंदाजा लग गया था कि ये वही नेता हैं जिन्होंने अपनी वाक्पटुता से संसद के अंदर कई बहसों को उनके अंजाम तक पहुंचाया है.
मगर अटल की कहानी सिर्फ उनकी वाक्पटुता या नेतृत्व कौशल की नहीं है. उनकी कहानी है कई शहरों की, विदेश नीति की, दबी जुबान में धर्मनिरपेक्ष होने की और है दो नावों की सवारी की. शहरों की कहानी शुरू होती है मध्य प्रदेश के ग्वालियर से जहां एक स्कूल टीचर थे, नाम था - पंडित कृष्ण बिहारी वाजपेयी.
आजादी के पहले ही अपनी कविता कौशल के लिए मशहूर कृष्ण बिहारी उत्तर प्रदेश के बटेश्वर से ग्वालियर आ गए थे और सिंधिया राज के दौरान स्कूल में पढ़ाते थे. 25 दिसंबर, 1924 को उनके घर एक लड़का हुआ , नाम रखा गया - अटल. अवध, प्रेम और सदा बिहारी वाजपेयी के बाद अटल सबसे छोटे बेटे थे. बीए तक की पढ़ाई-लिखाई शहर के ही विक्टोरिया कॉलेज से हुई लेकिन एमए और एलएलबी की पढ़ाई के लिए दूसरे शहर जाना पड़ा.
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दूसरा शहर था कानपुर. ग्वालियर से चली ट्रेन कानपुर पहुंची तो अटल के साथ उनके राजनीतिक विचारों की पोटली भी साथ आई. पढ़ाई के शुरुआती दिनों में ही उनकी मुलाकात आरएसएस के प्रचारक नारायण राव तर्टे से हुई और अटल भी स्वयंसेवक बन गए. कहा जाता है कि कुछ वक्त के लिए अटल बिहारी वाजपेयी ऑल इंडिया स्टूडेंट्स फेडरेशन से भी जुड़े रहे थे जिसकी नींव 1936 में जवाहरलाल नेहरू ने रखी थी. कानपुर में ही संघ के बड़े अधिकारी रहे भाऊराव देवरस ने अटल बिहारी वाजपेयी को यूपी के शांडिला क्षेत्र में संघ का प्रचारक-विस्तारक बना कर भेजा.
मजे की बात है कि अटल बिहारी वाजपेयी ने अपने पिता के साथ ही कानपुर में एलएलबी में एडमिशन लिया था. संघ के काम में ही मशगूल होने की वजह से अटल को लॉ की पढ़ाई बीच में ही छोड़नी पड़ी. उन्होंने अपने करियर की शुरुआत पत्रकारिता से की और पाञ्चजन्य, राष्ट्रधर्म, दैनिक स्वदेश और वीर अर्जुन जैसे पत्र-पत्रिकाओं को सम्पादित किया. मगर पत्रकारिता उनके करियरग्राफ में सबसे निचला बिंदु बनकर रह गया क्योंकि अटल की असली इच्छा तो राजनीति में उतरने की थी और ऐसा ही हुआ भी.
21 अक्टूबर, 1951 को अटल बिहारी बाजपेयी ने श्यामा प्रसाद मुखर्जी के साथ मिलकर जन संघ की स्थापना की. दक्षिणपंथी विचारधारा वाली इस पार्टी के बैनर तले उन्होंने अगले ही साल यानी 1952 में लोकसभा चुनाव भी लड़ा मगर जीत नहीं पाए. 1957 में अटल ने फिर से लोकसभा का चुनाव लड़ा और इस बार वो सांसद बने.
राजनीतिक जीवन की गाड़ी आगे बढ़ चुकी थी और अटल बिहारी वाजपेयी संसद में अपने हिन्दी भाषणों की वजह से लोकप्रिय भी हो रहे थे. जवाहरलाल नेहरू की सरकार के दौर का एक किस्सा उन्होंने बाद के दिनों में सुनाया था जब उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू को 'मिला-जुला व्यक्तित्व' वाला राजनेता कह दिया था. उन्होंने बताया था कि कैसे उस दिन का सत्र खत्म होने के बाद नेहरू ने इस बात को सहजता से लिया था.
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ऐसा ही एक और किस्सा है जब जवाहरलाल नेहरू ने संसद में जनसंघ की आलोचना की थी. इसपर अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा था कि आप (नेहरू) रोज शीर्षासन करते हैं जिससे मुझे कोई आपत्ति नहीं है लेकिन मेरी पार्टी की तस्वीर उलटी न देखें. इस बात पर नेहरू भी हंस दिए थे. नेहरू के दौर के ये राजनीतिक संस्कार हमेशा ही अटल के साथ रहे. उन्होंने प्रधानमंत्री बनने के बाद भी अपने भाषणों और वक्तव्यों में इस बात का खास ख्याल रखा कि आलोचना को अन्यथा न समझकर आलोचना की तरह ही लिया जाए.
1977 में जब जनता पार्टी की सरकार बनी तब अटल बिहारी वाजपेयी को विदेश मंत्रालय की कमान सौंपी गई. 1977 में एक अनोखा इतिहास बनाते हुए उन्होंने संयुक्त राष्ट्र महासभा में हिंदी में भाषण दिया. इसके अलावा अटल 1979 में दो दशक में चीन की यात्रा करने वाले पहले भारतीय कैबिनेट मंत्री बने. उनसे मुलाकात के बाद उनके चीनी समकक्ष ने प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया से बातचीत में कहा, "मिस्टर वाजपेयी ने कहा कि सीमा का मुद्दा हमारे द्विपक्षीय संबंधों के सुधार में बाधा नहीं बनना चाहिए."
भारत-चीन संबंधों के सिलसिले में सीमा के तनाव को किनारे रखकर द्विपक्षीय संबंधों की बात करने की विदेश नीति बाद की सभी सरकारों से लेकर आज की नरेंद्र मोदी सरकार तक अपना रही है. अटल बिहारी वाजपेयी की इस दौर की विदेश नीति की ही विरासत की झलक तब भी दिखी जब वो भारत के प्रधानमंत्री बने. पाकिस्तान के साथ द्विपक्षीय संबंध बेहतर करने की बात हो या कावेरी मुद्दा सुलझाना, अटल बिहार वाजपेयी की डिप्लोमेसी हमेशा उनकी राजनीति में दिखाई दी.
1980 में 'कमल' के बीज रोपने का मौका था और जनसंघ छोड़कर अटल बिहारी वाजपेयी ने लालकृष्ण आडवाणी के साथ मिलकर भारतीय जनता पार्टी की स्थापना की. भाजपा की शुरुआती विचारधारा पर अटल बिहारी वाजपेयी का पूरा प्रभाव था और उस दौर की भाजपा गांधीवादी समाजवाद की खूब बात करती थी. हालांकि जनता के ऊपर उनका कुछ खास असर नहीं था. 1984 में लोकसभा चुनाव हुए जिसमें पार्टी को महज 2 सीटें हासिल हुईं. 1977 से 1980 तक भारत के विदेश मंत्री और भाजपा के तत्कालीन अध्यक्ष अटल बिहारी वाजपेयी खुद अपनी सीट से हार गए. ग्वालियर से माधव राव सिंधिया ने उन्हें हराया था.
इसके बाद शहरों की कहानी ग्वालियर से निकलकर लखनऊ फिर गांधीनगर और फिर लखनऊ पर ठहरी. 1991 का लोकसभा चुनाव उन्होंने लखनऊ और मध्य प्रदेश की विदिशा सीट से लड़ा. वाजपेयी ने दोनों जगह से चुनाव जीता लेकिन विदिशा सीट छोड़कर लखनऊ को अपनाया. अगले एक दशक में वे प्रधानमंत्री भी बन गए. मगर इस सब के बीच पार्टी की विचारधारा गांधीवादी समाजवाद का दामन छोड़ हिन्दू राष्ट्रवाद की ओर मुड़ गई. नेहरू के बाद वो पहले ऐसे पुरुष प्रधानमंत्री बने जिन्होंने तीन बार सरकार के मुखिया की शपथ ली.
दो नावों पर पैर रखकर चलने की नीति की वजह से अक्सर अटल बिहारी वाजपेयी की आलोचना की जाती है. 1992 में बाबरी मस्जिद ढहाए जाने के बाद वो भाजपा के कुछ चुनिंदा नेताओं में से थे जिन्होंने इस कृत्य की आलोचना की थी. वहीं एक दूसरे वाजपेयी हमें तब दिखते हैं जब वो 5 दिसंबर 1992 में कारसेवकों से 'जमीन समतल' करने की बात करते दिखते हैं. ऐसे ही गुजरात में 2002 के दंगों के बाद उन्होंने मीडिया के सामने तत्कालीन गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को राजधर्म का पालन करने की नसीहत तो दी मगर उनकी सरकार बर्खास्त नहीं की. इसके लिए और दंगों पर देर से चुप्पी तोड़ने के लिए उन्हें आज भी कटघरे में खड़ा किया जाता है.
अटल बिहारी वाजपेयी का 'मिला-जुला व्यक्तित्व' तब भी नजर आता है जब एक हिन्दू राष्ट्रवादी विचारधारा वाली पार्टी के प्रधानमंत्री रहते हुए वो धर्मनिरपेक्षता के बारे में ये कहते हुए दिखते हैं कि धर्मनिरपेक्षता इस देश की घुट्टी में है. नेहरुवियन समाजवाद के दौर में राजनीति शुरू करने वाले अटल बिहारी वाजपेयी के बारे में यह कहना गलत नहीं होगा कि उन्होंने भले ही कभी नेहरू के 'मिले-जुले व्यक्तित्व' की आलोचना की हो मगर उनकी राजनीति भी हिन्दू राष्ट्रवाद और धर्मनिरपेक्षता के बीच ही कहीं रही, कभी शार्प टर्न नहीं लिया.