क्या होती हैं खाप? कैसे करती हैं फैसले?

कृषि कानूनों के खिलाफ 31 जनवरी को बड़ौत में हुई देशखाप की पंचायत खापों में एकता कराने में कामयाब रही. सभी ने एक स्वर से भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत को समर्थन देने का निर्णय लिया. 32 साल बाद यह पहला मौका है, जब बालियान और देशखाप की दूरी मिटी हो.

प्रतीकात्मक फोटो (पीटीआइ)
प्रतीकात्मक फोटो (पीटीआइ)

रविवार, 31 जनवरी को कृषि‍ कानून के खि‍लाफ बड़ौत में हुई देशखाप की पंचायत खापों में एकता कराने में कामयाब रही. पहली बार देशखाप की पहल पर सर्वखाप जुटी और इसने बड़ौत में भीड़ के पिछले सारे रिकार्ड तोड़ दिए. सभी ने एक स्वर से भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत को समर्थन देने का निर्णय लिया. ऐतिहासिक रूप से देशखाप की पंचायत में सर्वखाप बालियान खाप के साथ आ गई. 32 साल बाद यह पहला मौका है, जब बालियान और देशखाप की दूरी मिटी हो. पंचायत में देशखाप चौधरियों ने कहा कि गाजीपुर में चल रहा धरना किसान के स्वाभिमान और पगड़ी के सम्मान का प्रतीक है. राकेश टिकैत के आंसू बर्बाद नहीं होने देंगे. 1988 में देशखाप के मुखिया चौधरी सुखबीर सिंह ने बालियान खाप के समर्थन में बड़ौत में पंचायत की थी. उस वक्त बालियान खाप के मुखिया महेंद्र सिंह टिकैत मेरठ कमिश्नरी पर आंदोलन चला रहे थे. इसके बाद कुछ कारणों से बालियान खाप और देशखाप के बीच दूरियां बढ़ती चली गईं. 32 साल बाद बड़ौत की पंचायत में सारे गिले शिकवे मिटाकर देशखाप, बालियान खाप के साथ आई है.

क्या है खाप

खाप दो शब्दों से मिलकर बना है. ये शब्द हैं 'ख' और 'आप'. ख का अर्थ है “आकाश” और आप का अर्थ है “जल” अर्थात ऐसा संगठन जो आकाश की तरह सर्वोपरि हो और पानी की तरह स्वच्छ, निर्मल और सब के लिए उपलब्ध अर्थात न्यायकारी हो. अब खाप एक ऐसा संगठन माना जाता है जिसमें कुछ गांव शामिल हों, कई गोत्र के लोग शामिल हों या एक ही गोत्र के लोग शामिल हों. इनका एक ही क्षेत्र में होना जरुरी नहीं है. एक खाप के गांव दूर-दूर भी हो सकते हैं. बड़ी खापों से निकल कर कई छोटी खापों ने भी जन्म लिया है. खाप के गांव एक खाप से दूसरी खाप में जाने को स्वतंत्र होते हैं. इसी कारण समय के साथ खाप का स्वरुप बदलता रहा है. आज जाटों की करीब 3,500 खाप अस्तित्व में हैं.

खाप या सर्वखाप एक सामाजिक प्रशासन की पद्धति है जो भारत के उत्तर पश्चिमी प्रदेशों जैसे राजस्थान, हरियाणा, पंजाब एवं उत्तर प्रदेश में अति प्राचीन काल से प्रचलित है. मुजफ्फरनगर और पश्च‍िमी यूपी में इस वक्त बलि‍यान खाप, देशवाल खाप, गठवाला खाप, लाटि‍यान खाप, चौगाला खाप, अहलावत खाप, बत्तीस खाप, कालखांडे खाप, कलस्यान (गुर्जर) खाप, राठौड़ (राठी) खाप, पछादा खाप आदि‍ सक्रिय हैं. पश्च‍िमी यूपी में बलियान खाप और देशखाप प्रमुख मानी जाती हैं. भारतीय किसान यूनियन को व्यापक क्षि‍तिज बलियान खाप से ही मिला है. महेंद्र सिंह टिकैट के नेतृत्व में बलियान खाप ने किसान आंदोलन को उत्कर्ष पर पहुंचाया था. खाप के मुखि‍या का फैसला सर्वमान्य होता है. मुजफ्फरनगर के वरिष्ठ वकील राजेंद्र सिंह बताते हैं, “सर्वखाप पंचायत जाट जाति की सर्वोच्च पंचायत व्यवस्था है. जाति, समाज, राष्ट्र अथवा जातिगत संस्कारों, परंपराओं का अस्तित्व खतरे में पड़ जाता है अथवा किसी समस्या का समाधान किसी अन्य संगठन द्वारा नहीं होता तब सर्वखाप पंचायत का आयोजन किया जाता है जिसके फैसलों का मानना और दिशा निर्देशानुसार कार्य करना जरुरी होता है.” वर्तमान में सर्वखाप का मुख्यालय मुजफ्फरनगर के सोरम गांव में है. वर्ष 1924 में सोरम में सर्वखाप की पंचायत में गांव के ही निवासी चौधरी कबूल सिंह को सर्वखाप मंत्री नियुक्त किया गया था.

रुढ़ि‍वादी हैं खाप पंचायतें

मेरठ‍ विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग में कार्यरत एक असिस्टेंट प्रोफेसर बताते हैं, “खाप पंचायतें दरअसल प्राचीन समाज का वह रूढ़िवादी हिस्सा हैं, जो आधुनिक समाज और बदलती हुई विचारधारा से सामंजस्य नहीं बैठा पा रही हैं. इसका जीता जागता प्रमाण पंचायतों के मौजूदा स्वरूप में देखा जा सकता है, जिसमें महिलाओं और युवाओं का प्रतिनिधित्व न के बराबर है.” यदि इन पंचायतों की मानसिकता और इनके सामाजिक ढांचों पर ध्यान दिया जाए, तो चौंका देने वाले आंकड़े सामने आते हैं, जो बेहद ही चिंताजनक हैं. उदाहरण के तौर पर पूरी खाप पंचायतों के एरिया (हरियाणा, दिल्ली, पंजाब और पश्चिमी उत्तर प्रदेश) में महिला-पुरूष का लिंग अनुपात सबसे खराब है, जबकि इन इलाकों में कन्या भ्रूण हत्या का औसत राष्ट्रीय औसत से काफी अधिक है. इससे साफ जाहिर होता है कि खाप पंचायतों का मूल चरित्र नारी विरोधी है. यही कारण है कि पढ़-लिख कर आत्मनिर्भर होती महिलाएं और उनकी मनमर्जी से होने वाली शादियां हमेशा से इनकी आंख का कांटा रही हैं. इसी कारण पश्च‍िमी यूपी में इज्जत के नाम पर हत्या जैसे अपराध ज्यादा घटि‍त होते हैं. खाप पंचायतें भी पारंपरिक पंचायतें ही हैं जिन्हें कोई प्रशासनिक मान्यता प्राप्त नहीं है.

काफी प्राचीन है खाप व्यवस्था

खाप व्यवस्था की शुरुआत वैसे तो राजा हर्षवर्धन के समय से मानी जाती है. सर्वखाप के वर्तमान मंत्री सुभाष बालियान सर्वखाप मंत्री की 26वीं पीढ़ी के हैं. इनके पास सम्राट हर्षवर्धन से लेकर स्वतंत्र भारत तक के सर्वखाप पंचायत के समस्त अभि‍लेख उपलब्ध हैं. इतिहासकारों के मुताबिक, महाराजा हर्षवर्धन ने सन 643 ई. में क्षत्रियों को एकजुट करने के लिए कन्नौज शहर में विशाल सम्मलेन कराया था. वह सर्वखाप पंचायत ही थी जिसका नाम ‘हरियाणा सर्वखाप पंचायत' रखा गया था. चूंकि उन दिनों विशाल हरियाणा उत्तर में सतलज नदी तक, पूर्व में देहरादून, बरेली, मैनपुरी तथा तराई एरिया तक, दक्षिण में चम्बल नदी तक और पश्चिम में गंगानगर तक फैला हुआ था. सर्वखाप के चार केंद्र थानेसर, दिल्ली, रोहतक और कन्नौज बनाये गए थे. इस सर्वखाप पंचायत में करीब 300 छोटी बड़ी खाप और संगठन शामिल थे. पंचायत ने थानेसर सम्राट हर्षवर्धन का कनौज के राजा के रूप में राज्याभिषेक किया. सम्राट हर्ष ने वैदिक विधि विधान से सर्वखाप पंचायत का गठन किया था.

स्वतंत्रता की लड़ाई में भी खाप पंचायतों ने बड़ी भूमिका निभाई थी. इतिहासकारों के मुताबिक, 23 अप्रैल 1857 को मेरठ छावनी में सैनिक विद्रोह हुआ और 10 मई 1857 को सर्वखाप पंचायत के वीरों ने अंग्रेजों को गोली से उड़ा दिया. 11 मई 1857 को चौरासी खाप तोमर के चौधरी शाहमल गांव बिजरोल (बागपत) के नेतृत्व में पंचायती सेना के 5 हजार मल्ल योद्धाओं ने दिल्ली पर आक्रमण किया. शामली के मोहर सिंह ने आस-पास के क्षेत्रों पर काबिज अंग्रेजों को ख़त्म कर दिया. सर्वखाप पंचायत ने चौधरी शाहमल और मोहर सिंह की सहायता के लिए जनता से अपील की. इस जन समर्थन से मोहर सिंह ने शामली, थाना भवन, पड़ासौली को अंग्रेजों से मुक्त करा लिया. जंगलों में पंचायती सेना और हथियारबंद अंग्रेजी सेना के बीच भयंकर युद्ध हुआ जिसमें मोहर सिंह वीर गति को प्राप्त हुए लेिकन अंग्रेज एक भी नहीं बचा. चौहानों, पंवारों और तोमरों ने रमाला छावनी का नामोनिशान मिटा दिया.

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