दिल्ली सरकार के अपने शिक्षा बोर्ड के विद्यार्थियों के लिए मायने
अंतरराष्ट्रीय स्तर का दिल्ली बोर्ड ऑफ स्कूल एजुकेशन बनाने के फैसले को विशेषज्ञों ने सही दिशा में उठाया गया कदम बताया है.

शैली आनंद
विद्यार्थी केंद्रित पढ़ाई शिक्षा की रीढ़ है. दुनिया भर में तेजी से होते बदलाव और बढ़ती जटिलताएं रोज नई चुनौतियां पेश कर रही हैं और इसी से जुड़ी मांगें भी शैक्षिक तंत्र से अपेक्षित रहती हैं. विद्यार्थियों में बदलाव और सुधार की जरूरत अब पहले से कहीं ज्यादा महसूस हो रही है ताकि वे वैश्विक वर्कफोर्स का हिस्सा बन सकें. दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का राष्ट्रीय राजधानी के लिए अलग स्कूल शिक्षा बोर्ड बनाने के फैसले को बदलती दुनिया के संदर्भ में देखा जाना चाहिए.
6 मार्च को केजरीवाल ने घोषणा की कि शुरुआत में दिल्ली सरकार के 20 से 25 स्कूल 2021-22 के शैक्षिक सत्र में दिल्ली बोर्ड ऑफ स्कूल एजुकेशन (डीबीएसइ) से संबद्ध रहेंगे. इसका मतलब यह हुआ कि ये स्कूल सेंट्रल बोर्ड ऑफ सेकेंडरी एजुकेशन (सीबीएसई) से अलग होंगे. डीबीएसइ के गठन का प्रस्ताव कैबिनेट बैठक में पास किया गया.
तो इससे क्या बदलाव आएगा? शिक्षकों में यह सर्वमान्य है कि बच्चों को विद्यार्थी केंद्रित शिक्षा की जरूरत होती है और इसमें बोर्ड का उतना महत्व नहीं होता है. ओडिशा आदर्श विद्यालय संगठन के सलाहकार सह कार्यकारी अध्यक्ष और साई इंटरनेशनल एजुकेशन ग्रुप के संस्थापक बिजय कुमार साहू स्पष्ट करते हैं, “केवल बोर्ड नहीं बल्कि शिक्षण और विषयवस्तु से बदलाव आता है. विद्यार्थियों की क्षमता में बढ़ोतरी के साथ उन्हें बहुआयामी नजरिये से परिचित कराना उनके भविष्य के लिए उत्प्रेरक की तरह काम करता है.”
अंतरराष्ट्रीय स्तर का डीबीएसई बनाने के फैसले को विशेषज्ञों ने सही दिशा में उठाया गया कदम बताया. इसका मतलब यह भी है कि विद्यार्थियों को अब बेहतर विकल्प और अवसर मिल सकेंगे. इसे एक व्यवहारिक नजरिया करार देते हुए एसोसिएशन ऑफ इंडियन स्कूल्स की सलाहकार परिषद की सदस्य रीता सोनावत कहती हैं, “यह सोचकर कि भविष्य में विद्यार्थियों को नौकरी लायक कौशल हासिल करने की जरूरत होगी, लिहाजा शिक्षा तंत्र को इस तरह डिजाइन करने की जरूरत है जो 21वीं सदी की मांग और चुनौतियों के लिहाज से फिट हो.”
यहां यह बताने की जरूरत है कि डीबीएसइ कोई सीबीएसई का स्थान नहीं ले रहा है बल्कि यह केवल नए दौर के मुताबिक लाया जा रहा है जो नई शिक्षा नीति (एनइपी) 2020 में फिट है. यह एक स्वागतयोग्य बदलाव और जैसा कि दिल्ली सरकार ने स्पष्ट किया है कि यह बोर्ड अंतरराष्ट्रीय कार्यविधियों और तकनीकों का स्कूली शिक्षा में समावेश करेगा. सोनावत कहती हैं, “दिल्ली के विद्यार्थियों को अन्य राष्ट्रीय बोर्डों के साथ प्रतिस्पर्धा के जिस अस्वस्थ दबाव को झेलना पड़ता है उसमें काफी कमी आएगी.”
ज्ञान के प्रसार और हर क्षेत्र में आ रहे नए बदलावों के बीच एक विद्यार्थी को आत्म निर्देशित शिक्षा और आत्म वृद्धि के लायक तैयार करना जटिल हो गया है. सीखने के तरीके और पसंद का विद्यार्थी के किसी लक्ष्य को हासिल करने के नजरिये और सीखने के माहौल में उनके क्रियाकलापों पर असर पड़ता है. साहू को मुताबिक, “यह शिक्षा की गुणवत्ता, शिक्षण, सीखने की प्रक्रिया और शिक्षक की क्षमता पर बहुत ज्यादा निर्भर है. इसका आकलन करने वाले किसी भी बोर्ड पर बहुत असर पड़ता है.”
दिल्ली सरकार के मुताबिक, डीबीएसइ शिक्षा देने और आकलन की प्रक्रिया में अत्याधुनिक तकनीक का इस्तेमाल करेगा. शिक्षा तंत्र में हरेक विद्यार्थी की अभिरुचि, जरूरत और विशेषज्ञता पर ध्यान दिया जाएगा ताकि ये पता चल सके कि उन्हें किस तरह के करियर का विकल्प चुनना है.
अगर डीबीएसइ कामयाब रहा तो अन्य राज्य भी अपना अलग बोर्ड बनाने की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं. सोनावत के मुताबिक, “यह चिंता बनी रहेगी कि विचार की प्रक्रिया दीर्घकालिक बदलावों के लिए होनी चाहिए और इन्हें किसी राज्य के राजनीतिक बदलावों से बेअसर होना चाहिए.” नए बोर्ड में मान्यता के लिए स्कूलों के चयन में पारदर्शिता के साथ बोर्ड के सिलेबस की स्पष्ट गाइलाइंस होनी चाहिए. तब ही बोर्ड लंबे समय के हिसाब से कामयाब हो सकेगा.
अनुवादः मनीष दीक्षित
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