यूं कसता चला गया नीतीश पर शिकंजा
संगठन ही नहीं सरकार में भी जद (यू) का घटा कद. नीतीश कुमार के लिए फ्री-हैंड की गुंजाइश खत्म.

दो महीने के अधिक समय के बाद आखिरकार मंगलवार (9 फरवरी) को बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अपने मंत्रिमंडल का विस्तार कर सके. सरकार में पचास-पचास फीसद हिस्सेदारी का उनका फॉर्मूला, भाजपा की तरफ से खारिज होने के बाद भाजपा के 9 तथा जद (यू) के 8 विधायकों को मंत्रीपद की शपथ दिलाया गया. इस तरह नीतीश कुमार के मंत्रिमंडल में अब भाजपा कोटे के मंत्रियों की संख्या 16 तथा जद (यू) कोटे के मंत्रियों की संख्या 12 हो गई है. इस तरह मंत्रिमंडल में भी नीतीश कुमार की पार्टी पहली बार अब छोटे भाई की भूमिका में आ गई है.
बिहार भाजपा के महासचिव देवेश कुमार कहते हैं कि चुनाव नतीजों में भाजपा के 74 तो नीतीश के 43 विधायक जीत कर आए थे, इस लिहाज से मंत्रीमंडल में भाजपा को अधिक कोटा मिलना स्वभाविक है, इसको बड़े या छोटे भाई की भूमिका से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए. लेकिन देवेश इस बात पर चुप्पी साध जाते हैं कि जब 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद नीतीश कुमार ने केंद्रीय मंत्रिमंडल में बराबर की संख्या में मंत्रियों को शामिल करने की मांग की थी तो भाजपा ने उसे ठुकरा दिया था और नीतीश इस बात पर नाराज भी हुए थे.
भाजपा ने नीतीश पर शिकंजा सिर्फ मंत्रियों की संख्या के लिहाज से ही नहीं कसा है. बिहार विधानसभा चुनाव के समय से ही भाजपा ने नीतीश को कमजोर करना शुरू कर दिया था. इसकी पूरी पटकथा लिखी गई थी. चुनाव की तिथि घोषित होने से पहले ही नीतीश के नेतृत्व में चुनाव लड़ने को लेकर प्रदेश भाजपा के नेताओं ने आपत्ति जाहिर करते हुए बयान जारी किए थे. लेकिन पार्टी के तत्कालीन अध्यक्ष और गृहमंत्री अमित शाह ने नीतीश के नेतृत्व में ही चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया था. भाजपा नेताओं का कहना है कि ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि नीतीश-राजद की तरफ नहीं चले जाए, इससे बचने के लिए उनके नेतृत्व में चुनाव लड़ने का ऐलान किया गया. बाद में चुनाव के दौरान जब लोजपा नेता चिराग पासवान ने जद (यू) के खिलाफ अपने प्रत्याशी उतारने का ऐलान किया तो नीतीश चाहते थे कि भाजपा यह ऐलान कर दे कि लोजपा के साथ भाजपा का कोई नेता नहीं है. लेकिन भाजपा ने ऐसा नहीं किया, अलबत्ता भाजपा के बागी प्रत्याशी तक जद (यू) के खिलाफ लोजपा की टिकट पर चुनाव लड़े. असहाय स्थिति में नीतीश सब देखते रहे.
चुनाव नतीजा आने के बाद जब जद (यू) सिर्फ 43 सीटों पर सिमट गई और भाजपा ने 74 सीटें जीती तो, भाजपा ने यह कह कर नीतीश पर दबाव बनाना शुरू किया कि चूंकि भाजपा की सीटे अधिक हैं, इसलिए सीएम भाजपा का बनना चाहिए. नीतीश एक बार फिर भाजपा की रहमोकरम पर आश्रित हुए. लेकिन गृहमंत्री अमित शाह और पार्टी अध्यक्ष जे.पी. नड्डा की तरफ से नैतिक रूप से नीतीश पर दबाव बनाते हुए यह कहा गया कि भले भाजपा विधायकों की संख्या अधिक है लेकिन सीएम नीतीश ही बनेंगे. खैर, नीतीश सीएम बने, लेकिन भाजपा ने उन्हें झटका देते हुए उनके खास माने जाने वाले उप-मुख्यमंत्री रहे सुशील मोदी को बिहार से हटा कर दिल्ली बुलाने का ऐलान कर दिया. नीतीश पर आगे शिकंजा कसते हुए एक की जगह दो उप-मुख्यमंत्री भाजपा ने बनवाए. तारकेश्वर प्रसाद और रेणु देवी के रूप में नीतीश की बराबरी में दो उप-मुख्यमंत्री बनाकर नीतीश पर नकेल कसने की भाजपा की सफल कोशिश सामने आई. बात यहीं नहीं रुकी. भाजपा ने अपने कद्दावर नेता और केंद्र में मंत्री रह चुके शाहनवाज हुसैन को मंत्रिमंडल में इस बार शामिल करा दिया है. शाहनवाज, नीतीश के विरोधी माने जाते हैं. ऊपर से मुस्लिम वोटों को साधने की कोशिश में लगे नीतीश के लिए भाजपा की तरफ से मुस्लिम नेता को मंत्री बनवाना सियासी रूप से फिट नहीं बैठता है. बहरहाल, नीतीश कुमार की मुश्किल कम होती नहीं दिख रही है. कैबिनेट में मंत्रियों की संख्या के लिहाज से कमतर नीतीश, भाजपा कोटे के कद्दावर मंत्रियों से पार पा सकेंगे, इसकी संभावना कम दिखती है.
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