...और बड़ा हो जाएगा राजकोषीय घाटा

बजट में मौजूदा वित्त वर्ष में राजकोषीय घाटा 9.5 फीसद रहने का अनुमान है. अगर देश की जीडीपी मौजूदा वित्त वर्ष में 194.8 लाख करोड़ रुपए रहेगी तो इस हिसाब से राजकोषीय घाटा 18.5 लाख करोड़ रुपए का बैठेगा.

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 1 फरवरी को केंद्रीय बजट पेश किया (फोटोः चंद्रदीप कुमार)
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 1 फरवरी को केंद्रीय बजट पेश किया (फोटोः चंद्रदीप कुमार)

बजट में मौजूदा वित्त वर्ष में राजकोषीय घाटा 9.5 फीसद रहने का अनुमान है. 9.5 फीसद जीडीपी का. अगर देश की जीडीपी मौजूदा वित्त वर्ष में 194.8 लाख करोड़ रुपए रहेगी तो इस हिसाब से राजकोषीय घाटा 18.5 लाख करोड़ का बैठेगा. वहीं वित्त वर्ष 2022 में इसके 6.8 फीसद रहने का अनुमान है.

राजकोषीय घाटा मतलब सरकार की कुल कमाई और खर्च के बीच का अंतर या कह लीजिए सरकार खर्च पूरा करने के लिए कितना पैसा उधार लेगी वह राशि ही राजकोषीय घाटा है.  

राजकोषीय घाटा ही दरअसल देश की आर्थिक स्थिति की सही तस्वीर दिखाता है और यह वह नंबर होता है जिसपर शेयर बाजार के निवेशकों से लेकर रेटिंग एजेंसियों तक की पैनी नजर होती है.

रेटिंग एजेंसी फिच के मुताबिक, निकट अवधि में भारत का राजकोषीय घाटा सरकार के अनुमान से अधिक है और मध्यम अवधि में अर्थव्यवस्था में सुधार की गति उम्मीद से धीमी है. फिच रेटिंग्स की एशिया-प्रशांत सावरेन दल के निदेशक जेरेमी जुक ने कहा, ‘‘हमने वृद्धि संभावनाओं और भारी सार्वजनिक ऋण की चुनौतियों तथा महामारी के प्रकोप के मद्देनजर जून 2020 में नकारात्मक दृष्टिकोण के साथ भारत की रेटिंग को ‘बीबीबी-’ पर रखा था.’’ गौरतलब है कि फिच जैसी ही रेटिंग एजेंसियों के आकलन पर आर्थिक समीक्षा में टिप्पणी करते हुए कहा गया है कि उनकी रेटिंग अर्थव्यवस्था की सही तस्वीर को प्रतिबिंबित नहीं करती है. 

सारे कर्ज जोड़े तो बड़ा है घाटा 

एसबीआई रिसर्च की रिपोर्ट के अनुसार, बजट के इतर जुटाए जाने वाले 30,000 करोड़ रुपए के कर्जों को भी जोड़ दें तो अगले वित्त वर्ष राजकोषीय घाटा 0.10 फीसद बढ़कर 6.9 फीसद हो जाएगा, जबकि मौजूदा वित्त वर्ष में इसके 10.2 फीसद तक जाने की आशंका है.  

रिपोर्ट के मुताबिक, बजट अनुमानों में दोनों वित्त वर्ष के लिए बजट से इतर उधारी को शामिल नहीं किया गया है. चालू वित्त वर्ष में इस तरह का कर्ज करीब 1.3 लाख करोड़ रुपए का रहेगा जबकि अगले वर्ष यह 30,000 करोड़ रुपए के बराबर होने की संभावना है. अब अगर इस उधारी को जोड़ा जाए तो 2020-21 में राजकोषीय घाटा जीडीपी का 10.2 फीसद और 2021-22 में 6.9 फीसद बैठता है. 

केंद्र के 6.9 फीसद और राज्यों के 4 फीसद राजकोषीय घाटे के आधार पर अगले वित्त वर्ष में संयुक्त रूप से बाजार ऋण 23.3 लाख करोड़ रुपए के बैठेंगे. इसमें केंद्र का शुद्ध कर्ज 8.9 लाख करोड़ रुपए और सकल कर्ज 12.05 लाख करोड़ रुपए होगा. कुल मिलाकर केंद्र और राज्यों की सकल उधारी 2021-22 में 23.3 लाख करोड़ रुपए होगी. जबकि शुद्ध उधारी 18.1 लाख करोड़ रुपए होगी जो 2020-21 के बराबर है.

रिपोर्ट में कहा गया है कि सरकार सार्वजनिक क्षेत्र की एजेंसियों के जरिये बड़े स्तर पर बजट से इतर कर्ज ले रही है. इसका उद्देश्य  इस प्रकार के ऋणों को अपने बही-खाते में दिखाने से बचना है. हालांकि राज्यों की ओर से संचालित इकाइयों के बजट के अतिरिक्त संसाधनों (ईबीआर) में कमी दिखायी गयी है. वित्त वर्ष 2021-22 में इन इकाइयों के लिए अनुमानित ईबीआर 3.47 लाख करोड़ रुपए दिखाया गया है जो चालू  वित्त वर्ष 2020-21 में 3.88 लाख करोड़ रुपए है. 

आपको बता दें कि वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 2021-22 के बजट में बड़े पैमाने पर खर्च का ऐलान किया, जिसका एक बड़ा हिस्सा उधारी के जरिए पूरा किया जाएगा.

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