क्यों नहीं होती खाने के पैकटों पर साफ-साफ चेतावनी
पित्जा, बर्गर, आलू भुजिया, सूप भारत में कुछ भी नहीं सुरक्षित. स्वाद के नाम पर फूड कंपनियां उपभोक्ताओं की सेहत के साथ धड़ल्ले से कर रहीं खिलवाड़. लेकिन भारत की खाद्य नियामक संस्था बेफिक्र. इंतजार कीजिए फूड पैकिट्स में चेतावनी भी दी जाएगी. लेकिन उसे समझना हर भारतीय के बस की बात नहीं होगी. फूड कंपनियां इस खतरे को हमें स्पष्ट नहीं बताना चाहतीं. तो क्या हमारी खाद्य नियामक संस्था और फूड कंपनियों के बीच कोई सांठगांठ है?

खाद्य सुरक्षा एवं मानक (लेबलिंग ऐंड डिस्प्ले), 2019 ड्राफ्ट बनाने में भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआइ) को छह साल से भी ज्यादा समय लग गया. 2018 में एक ड्राफ्ट आया पर कुछ एतराज होने की वजह से उस पर दोबारा काम किया गया और इस साल फिर एक नया अंतिम ड्राफ्ट आ गया है. तो क्या इस ड्राफ्ट के जरिए उपभोक्ता यह जान सकेंगे कि उनका खाना डाइट के हिसाब से कितना खतरनाक या कितना नुक्सानदेह है? एफएसएसएआइ के ड्राफ्ट में फूड कंपनियों को अपने उत्पादों में जानकारी देने के दिशानिर्देश दिए गए हैं. लेकिन उपभोक्ता को इसके लिए खासा समझदार होना पड़ेगा. इसे कुछ यूं समझिए भारत का निरक्षर व्यक्ति भी खाद्य उत्पादों में बने लाल और हरे गोले को देखकर समझने लगा है कि किसमें मांसाहार है और किसमें शाकाहार?
लेकिन अगर यही बात उत्पाद पर लिखकर बताई जाती तो कितने लोग वेजिटेरियन और नॉन वेजिटेरियन समझते? जाहिर है, न केवल साक्षर बल्कि अंग्रेजी जानने वाले? लाल-हरे गोले का एफएसएसएआइ का यह प्रयोग भारत में बेहद सफल भी रहा. सेंटर फॉर साइंस ऐंड एनवायरमेंट में फूड सेफ्टी ऐंड टॉक्सिन्स के प्रोग्राम मैनेजर अमित खुराना कहते हैं, '' फिर सवाल उठता है कि एफएसएसएआइ अपने इस सफल प्रयोग को मॉडल क्यों नहीं बनाना चाहती? भारत की आबादी के एक बड़ा हिस्सा आज भी निरक्षर और अंग्रेजी भाषा से कोसों दूर है. चित्रों और रंगों के जरिए दी गई चेतावनी का असर भारत के एक बड़े हिस्से पर होने की पूरी संभावना है. फिर यह हिचकिचाहट क्यों?'' खुराना पूछते हैं, कितने लोग भारत में जानते हैं सोडियम नमक होता है? एडेड शुगर, ट्रांस फैट जैसी शब्दावाली क्या सामान्य समझ के व्यक्ति को समझ में आएगी? खुराना की बात जमीनी हकीकत के बेहद नजदीक नजर आती है. वाकई कम से कम गांव में बैठा हुई एक व्यक्ति फूड कंपनियों की पहेलीनुमा चेतावनी को समझ पाएगा यह भरोसा करना मुश्किल है.
एफएसएसएआइ के ड्राफ्ट में क्या है?
खाद्य सुरक्षा एवं मानक (लेबलिंग ऐंड डिस्प्ले), 2019 के नियम बनते ही चेतावनी कुछ इस तरह की होगी? आखिर नमक लिखने से परहेज क्यों? ट्रांस और सैचुरेंट फैट को सीधी तरह से वसा क्यों नहीं लिखा जा सकता? क्यों नहीं लाल रंग से सीधे खतरा दिखाया जा सकता?
....तो उपभोक्ता सेहत के साथ हो रहे खिलवाड़ को समझ जाएंगे
सीएसएसइ की लैब में जांचे गए 33 फूड प्रोडक्ट्स में अगर चेतावनी खाद्य सुरक्षा एवं मानक (लेबलिंग ऐंड डिस्प्ले), 2019 के तहत दी जाएगी तो लोग नंबरों, अंग्रेजी और भाषा के मकड़जाल में फंस जाएंगे. ऊपर से पैकिट के पीछे चेतावनी देने से यह कहीं छिप जाएगी लेकिन सपाट तरह से पैकिट के आगे के हिस्से में अगर खतरे को लाल निशान से दिखाया जाए तो निरक्षर व्यक्ति भी चेतावनी समझ जाएगा. सीएसइ ने मशहूर कंपनियों के 33 फूड प्रोडक्ट्स में नमक, कुल वसा, ट्रांस फैट, कार्बोहाइड्रेट की जांच की. रिपोर्ट चौंकाने वाली रही. अगर इन सारे खाद्य उत्पादों के पैकिट में चेतावनी लाल निशान के जरिए दिखाई जाए तो सभी उत्पादों में नमक और वसा की मात्रा लाल गोले में आ जाएगी.
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