चीन-पाक वायु सेना युद्धाभ्यास: क्यों गायब है एफ-16 विमान
पाकिस्तान के लिए एफ-16 को इन सैन्य अभ्यासों में लाना उस समझौते का उल्लंघन होता जो उसने ये एयरक्रॉफ्ट खरीदते वक्त अमेरिका के साथ किया था.

चीन और पाकिस्तान की वायु सेनाओं ने 9 दिसंबर को अपना नौवां संयुक्त अभ्यास शुरू किया. शाहीन-नौ नामक यह अभ्यास पाकिस्तान एयरफोर्स (पीएएफ) के सबसे नए एयरबेस सिंध के भोलारी में हो रहा है जिसे दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग बढ़ाने की कड़ी में इस दशक का सबसे जटिल माना जा रहा है. यह कसरत ऐसे वक्त पर हो रही है जब भारत और चीन के बीच पूर्वी लद्दाख में सैन्य गतिरोध चल रहा है इसलिए भारतीय वायु सेना की इस पर पैनी निगाह है. इस अभ्यास में पीएएफ के जेएफ-17, मिराज-तीन और पीपुल्स लिबरेशन आर्मी एयरफोर्स (पीएलएएएफ) के जे-10 और जे-11 जैसे भारी विमान हिस्सा ले रहे हैं.
इस अभ्यास में जो शामिल नहीं वह है पाकिस्तान के हर सैन्य अभ्यास में शामिल रहने वाला एयरफोर्स का एफ-16 युद्धक विमान. यह आश्चर्यजनक इसलिए है क्योंकि 2017 में शुरू हुआ भोलारी पाकिस्तान का एफ-16 का तीसरा बेस है. अमेरिका में निर्मित सिंगल इंजन वाले इस एयरक्रॉफ्ट पर चीनी पायलट हाथ आजमाना चाहते हैं क्योंकि यह युद्धक विमान दक्षिण कोरिया और ताइवान की फौजों के पास भी है. माना जाता है कि पीएलएएएफ के जे-10 युद्धक विमान एफ-16 की ही नकल हैं.
पाकिस्तान के लिए एफ-16 को इन सैन्य अभ्यासों में लाना उस समझौते का उल्लंघन होता जो उसने ये एयरक्रॉफ्ट खरीदते वक्त अमेरिका के साथ किया था. समझौते की शर्तों का उल्लंघन करने का मतलब ये होगा कि अमेरिका एफ-16 प्रोग्राम का तकनीकी सपोर्ट रद्द कर देगा.
यह करार 2001 में 9/11 आतंकी हमले के बाद अमेरिका ने पाकिस्तान को हथियारों की बिक्री के दौरान किया था. तब पाकिस्तान पर परमाणु हथियार कार्यक्रमों के कारण अमेरिकी प्रतिबंध लगे हुए थे. 2001 में अमेरिका ने पाकिस्तान को सैन्य उपकरणों की बिक्री इस शर्त पर दोबारा शुरू की कि पाकिस्तान आतंक के खिलाफ वैश्विक लड़ाई में उसका साथ देगा. तब 10 अरब डॉलर के सैन्य उपकरण पाकिस्तान को अमेरिका ने बेचे थे जिसमें 36 एफ-16 युद्धक विमान शामिल थे और पीएएफ 32 एफ 16 विमानों को अपग्रेड करने की बात कहे थे जो उसने 1980 के दशक की शुरुआत में खरीदे थे.
ये रक्षा करार निगरानी की इस शर्त के साथ हुआ था कि इनका उपयोग कैसे होगा और इन तक किसकी पहुंच होगी. इस करार की निगरानी अमेरिकी सेना और पाकिस्तानी एयरबेस पर मौजूद प्रतिनिधि करते हैं. पिछले साल अमेरिकी विदेश विभाग ने 12.5 करोड़ डॉलर के पाकिस्तान के एफ-16 प्रोग्राम सपोर्ट कार्यक्रम में एक खास शर्त ये रखी थी कि अमेरिकी फर्म के 60 प्रतिनिधि इनके संचालन पर पर्यवेक्षण करेंगे. इनकी वजह कोई बहुत गूढ़ नहीं हैं. अमेरिका को ये आशंका है कि उसका प्रतिद्वंद्वी चीन कहीं अमेरिकी सैन्य उपकरणों के प्रदर्शन की गूढ़ बातें जैसे राडार आदि की जानकारी न हासिल कर ले क्योंकि इससे वह इनकी काट तैयार कर सकता है. उदाहरण के लिए पिछले साल अमेरिका ने तुर्की को एफ-35 विमानों की बिक्री रद्द कर दी थी क्योंकि यह देश रूस के एस-400 एयर डिफेंस सिस्टम को खरीदने पर अड़ा था. अमेरिकी सेना को फिक्र यह थी कि कहीं एस-400 के राडार उसके पांचवीं पीढ़ी के युद्धक विमानों की टोह लेने में इस्तेमाल न हो जाएं.
अमेरिकी फर्म के प्रतिनिधि पीएएफ के एफ-16 की तैनाती की भी निगरानी करते हैं. खुफिया विभाग के एक अधिकारी ने कुछ साल पहले का वाकया याद किया कि अमेरिकी कंपनी का प्रतिनिधि एयबेस इसलिए पहुंच गया क्योंकि वह यह जानना चाहता था कि पीएएफ का एफ-16 अचानक दूसरी जगह क्यों उतर गया. साफ है कि पीएएफ के पास भले ही ये एयरक्रॉफ्ट हैं लेकिन इन पर उसकी मालिकाना हैसियत शर्तों के अधीन है.
अनुवादः मनीष दीक्षित
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